FAQ
जालंधर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ स्तन गिरा था; शिवचरित इसे वाम स्तन कहता है और कालिका पुराण "स्तनद्वय" यानी दोनों स्तनों की बात करता है। यहाँ की शक्ति त्रिपुरमालिनी और भैरव भीषण कहलाते हैं।
इस पर एकमत नहीं है। प्रचलित मान्यता जालंधर (पंजाब) के देवी तालाब मंदिर को यह पीठ मानती है, और वहाँ के देवी-भैरव के नाम पीठनिर्णय से पूरी तरह मिलते हैं। दूसरी ओर डी. सी. सरकार लिखते हैं कि जालंधर पीठ अब ज्वालामुखी के निकट माना जाता है, और आईन-ए-अकबरी नागरकोट-कांगड़ा की देवी को "जालंधरी" कहती है। दोनों दावे इस पृष्ठ पर स्रोत सहित दिए गए हैं।
क्योंकि प्राचीन काल में "जालंधर" किसी एक नगर का नहीं, एक पूरे क्षेत्र का नाम था — जो कांगड़ा की पहाड़ियों से लेकर जालंधर दोआब तक फैला था। बाद में जब वह नाम एक नगर पर सिमट आया, तो पीठ की पहचान दो टुकड़ों में बँट गई।
परंपरा कहती है कि देवी का मुख ज्वालामुखी में है और उनका शरीर कांगड़ा के वज्रेश्वरी मंदिर में। यानी ये दोनों पीठ एक ही देह के दो अंगों की तरह देखे जाते रहे हैं, अलग-अलग तीर्थों की तरह नहीं।
हाँ, और असामान्य रूप से कई ग्रंथों में — हेवज्र तंत्र, कालिका पुराण, रुद्रयामल, ज्ञानार्णव और कुब्जिका तंत्र सब इसे जानते हैं। इतने स्वतंत्र स्रोतों में आना इस पीठ की प्राचीनता का संकेत है।
