पंचसागर शक्ति पीठ

pañcasāgara

वह पीठ जो शायद कोई स्थान है ही नहीं — विद्वान सुझाते हैं कि यह समुद्रों की ओर संकेत है।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
अधो-दन्त
शक्ति
वाराही
भैरव
महारुद्र

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन में तीन पीठ ऐसे हैं जिनकी कोई आधुनिक पहचान उपलब्ध नहीं। पंचसागर उनमें सबसे असामान्य है — क्योंकि यहाँ प्रश्न यह नहीं कि स्थान कौन सा है, बल्कि यह कि कोई स्थान है भी या नहीं।

पीठनिर्णय यहाँ अधो-दन्त बताता है — नीचे के दाँत। देवी वाराही कहलाईं, भैरव महारुद्र।

पर स्थान के बारे में विद्वान डी. सी. सरकार जो लिखते हैं वह चौंकाता है। वे कोई गाँव, नगर या मंदिर नहीं बताते। वे सुझाते हैं कि **संभवतः यह नाम समुद्रों की ओर संकेत करता है** — पंच सागर, यानी पाँच समुद्र।

और तुरंत एक कठिनाई भी जोड़ देते हैं: परंपरा में समुद्रों की संख्या चार या सात मानी जाती रही है, पाँच नहीं।

यानी नाम अपने आप में भी पूरी तरह नहीं बैठता।

यह पृष्ठ इसीलिए छोटा है। यहाँ कोई मंदिर नहीं बताया गया, कोई दर्शन समय नहीं, कोई यात्रा-जानकारी नहीं — क्योंकि इनमें से कुछ भी ज्ञात नहीं है। और जो ज्ञात नहीं, उसे भर देना इस संग्रह के नियम के विरुद्ध होगा।

पाठक के लिए यह जानना भी एक जानकारी है: इक्यावन की सूची में हर नाम किसी पहचाने जा सकने वाले स्थान का नहीं है।

  • सरकार सुझाते हैं कि यह कोई स्थान नहीं, संभवतः समुद्रों की ओर संकेत है।
  • वे स्वयं जोड़ते हैं कि परंपरा में समुद्र चार या सात माने जाते रहे, पाँच नहीं।
  • इक्यावन के उन तीन पीठों में जिनकी कोई आधुनिक पहचान उपलब्ध नहीं।
  • अंग अधो-दन्त — नीचे के दाँत; ऊपर के दाँत शुचि पीठ पर आते हैं।

कथा

इस पीठ के बारे में कहने को बहुत कम है — और वही सबसे महत्वपूर्ण बात है।

सती के अधो-दन्त

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि पंचसागर में अधो-दन्त गिरे — नीचे के दाँत। देवी वाराही हुईं, भैरव महारुद्र।

ऊपर के दाँत इसी सूची में शुचि पीठ पर आते हैं। दोनों की पहचान अनुपलब्ध है।

शायद कोई स्थान है ही नहीं

अब वह बात जो इस पृष्ठ का असली विषय है।

विद्वान डी. सी. सरकार इस पीठ के लिए कोई गाँव, नगर या मंदिर नहीं बताते। वे इसके बजाय सुझाते हैं कि यह नाम संभवतः समुद्रों की ओर संकेत करता है — पंच सागर, यानी पाँच समुद्र।

और उसी वाक्य में वे एक कठिनाई भी जोड़ देते हैं: परंपरा में समुद्रों की संख्या चार या सात मानी जाती रही है, पाँच नहीं।

यानी नाम अपने आप में भी पूरी तरह नहीं बैठता। यह किसी भूभाग का नाम है, कोई प्रतीक है, या नक़ल में बदल गया कोई शब्द — तीनों संभव हैं, और किसी का प्रमाण नहीं।

यह पृष्ठ छोटा क्यों है

यहाँ न मंदिर बताया गया है, न दर्शन समय, न यात्रा की कोई जानकारी।

इसका कारण सीधा है: इनमें से कुछ भी ज्ञात नहीं है। और जो ज्ञात नहीं, उसे भर देना इस संग्रह के नियम के विरुद्ध होगा। किसी भी मंदिर का नाम यहाँ जोड़ देना आसान होता — पर वह गढ़ी हुई जानकारी होती, और कोई भक्त उस पर भरोसा करके निकल पड़ता।

पाठक के लिए यह जानना भी एक जानकारी है। इक्यावन की सूची में हर नाम किसी पहचाने जा सकने वाले स्थान का नहीं है। कुछ नाम केवल पाठ में बचे हैं — और उन्हें पाठ में ही रहने देना चाहिए।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); टिप्पणी D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ की कोई निश्चित आधुनिक पहचान उपलब्ध नहीं है। इसीलिए यहाँ मंदिर, दर्शन समय या यात्रा की जानकारी नहीं दी गई है — अनुमान लगाना भ्रामक होता।

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "possibly the oceans are indicated, although their traditional number was four or seven"

आसपास के दर्शनीय स्थल

पंचसागर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न