कुरुक्षेत्र शक्ति पीठ

kurukṣetra

महाभारत की रणभूमि का वह पीठ, जहाँ भैरव का नाम स्थाणु है — जो अचल है।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
दक्षिण-गुल्फ
शक्ति
सावित्री
भैरव
स्थाणु

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

कुरुक्षेत्र का नाम सुनते ही जो चित्र बनता है वह युद्ध का है — अठारह दिन, दो पक्ष, और एक ऐसा विनाश जिसके बाद कुछ पहले जैसा नहीं रहा।

पीठनिर्णय इसी भूमि को इक्यावन में गिनता है। यहाँ दक्षिण-गुल्फ गिरा — दाहिना टखना। देवी सावित्री कहलाईं, भैरव स्थाणु।

भैरव का नाम ध्यान खींचता है। स्थाणु का अर्थ है जो अचल है, जो हिलता नहीं — ठूँठ की तरह स्थिर। जिस भूमि पर सब कुछ हिल गया था, वहाँ के देवता का नाम अचलता पर पड़ा।

और देवी का नाम सावित्री है। सावित्री वह हैं जिन्होंने मृत्यु से अपने पति को वापस माँगा और पा लिया। एक रणभूमि पर, जहाँ हज़ारों मृत्यु में गए, उस स्त्री का नाम जो मृत्यु से लौटा लाई — यह मेल किसी ने बनाया नहीं लगता।

गुल्फ वह जोड़ है जिस पर खड़े रहने का भार आता है। तीनों बातें — अचल भैरव, मृत्यु से लौटाने वाली देवी, और खड़े रहने वाला अंग — एक ही दिशा में जाती हैं।

  • भैरव का नाम स्थाणु — जो अचल है, जो हिलता नहीं।
  • देवी सावित्री — वही नाम, जो मृत्यु से लौटा लाने की कथा से जुड़ा है।
  • अंग दक्षिण-गुल्फ, जिस पर खड़े रहने का भार आता है।
  • शिवचरित में देवी सांवरी/विमला और भैरव संवर्त — पाठभेद दर्ज है।

कथा

इस भूमि पर तीन नाम मिलते हैं, और तीनों एक ही बात कहते हैं — टिके रहने की।

सती का दक्षिण गुल्फ

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि कुरुक्षेत्र में दक्षिण-गुल्फ गिरा — दाहिना टखना। देवी सावित्री हुईं, भैरव स्थाणु।

जो अचल है

भैरव का नाम स्थाणु है। स्थाणु का अर्थ है जो हिलता नहीं — ठूँठ की तरह स्थिर, जड़ जमाए हुए।

यह नाम इस भूमि पर विशेष अर्थ रखता है। कुरुक्षेत्र वह जगह है जहाँ अठारह दिनों में एक पूरा युग हिल गया था। वहाँ के देवता का नाम अचलता पर पड़ना — यह संयोग हो या न हो, पढ़ने में ठहर जाता है।

और गुल्फ वह जोड़ है जिस पर खड़े रहने का पूरा भार आता है। जो टिका रहता है, वही खड़ा रह पाता है।

सावित्री का नाम

देवी यहाँ सावित्री कहलाती हैं।

सावित्री वह हैं जो यम के पीछे-पीछे चलती रहीं और अपने पति को मृत्यु से वापस माँग लाईं। भारतीय परंपरा में यह नाम हार न मानने का पर्याय है।

एक रणभूमि पर, जहाँ हज़ारों मृत्यु में चले गए, उस स्त्री का नाम जो मृत्यु से लौटा लाई — यह मेल किसी ने बनाया नहीं लगता।

तीनों बातें एक ही दिशा में जाती हैं: अचल भैरव, लौटा लाने वाली देवी, और खड़े रहने वाला अंग। जिस भूमि की पहचान विनाश से है, उसकी पीठ-परंपरा टिके रहने की बात करती है।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण)

आज यह स्थान कहाँ है

थानेसर के निकट, हरियाणा, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "near Thanesar in the eastern Punjab"

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि · सोमवती अमावस्या

कुरुक्षेत्र शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न