कन्याश्रम शक्ति पीठ

kanyāśrama

इक्यावन का सबसे बड़ा विवाद — एक ही पीठ, और दो दावे जिनके बीच दो हज़ार किलोमीटर हैं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
पृष्ठ
शक्ति
सर्वाणी
भैरव
निमिष

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इस संग्रह में पहचान के कई विवाद मिले — उज्जयिनी दो नगरों पर, जालंधर दो पर, श्रीशैल हज़ार किलोमीटर दूर। पर कन्याश्रम सबसे बड़ा है।

प्रचलित सूचियाँ इसे **कन्याकुमारी** बताती हैं — भारत का दक्षिणतम छोर, जहाँ तीन समुद्र मिलते हैं। यह मान्यता इतनी व्यापक है कि उस पर संदेह ही नहीं होता।

पर विद्वान डी. सी. सरकार अपनी अनुक्रमणिका में कुछ और लिखते हैं। वे इसे **पूर्वी भारत में** रखते हैं — चटगाँव ज़िले में, कुमीरा रेलवे स्टेशन के पास कुमारीकुंड नामक स्थान पर।

दोनों के बीच लगभग दो हज़ार किलोमीटर की दूरी है। एक देश के एक छोर से दूसरे छोर तक।

पीठनिर्णय यहाँ पृष्ठ बताता है — पीठ, यानी शरीर का पिछला भाग। देवी सर्वाणी कहलाईं, भैरव निमिष।

भ्रम का कारण शायद नामों में है। "कन्याश्रम" और "कन्याकुमारी" — दोनों में कन्या है। और सरकार जिस स्थान की बात करते हैं उसका नाम भी "कुमारीकुंड" है। तीन नाम, एक ही शब्द, और सदियों की उलझन।

इस पृष्ठ पर कोई निर्णय नहीं सुनाया गया। दोनों दावे स्रोत सहित रखे गए हैं।

  • इस संग्रह का सबसे बड़ा पहचान-विवाद — दोनों दावों के बीच लगभग दो हज़ार किलोमीटर।
  • सरकार इसे चटगाँव ज़िले (बांग्लादेश) में रखते हैं; प्रचलित सूचियाँ कन्याकुमारी बताती हैं।
  • तीनों नामों में एक ही शब्द है — कन्याश्रम, कन्याकुमारी, कुमारीकुंड।
  • अंग पृष्ठ — शरीर का पिछला भाग; कुछ प्रतियों में दृष्टि भी लिखा मिलता है।

कथा

इस पीठ की कथा वही है जो सबकी — पर इसका असली विषय यह है कि एक स्थान दो छोरों पर कैसे बँट गया।

सती का पृष्ठ

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि कन्याश्रम में पृष्ठ गिरा — शरीर का पिछला भाग। देवी सर्वाणी हुईं, भैरव निमिष। कुछ प्रतियों में अंग दृष्टि भी लिखा मिलता है।

दो छोर

अब वह प्रश्न जिसके लिए यह पृष्ठ है।

प्रचलित सूचियाँ लगभग सर्वसम्मति से इसे कन्याकुमारी बताती हैं — भारत का दक्षिणतम छोर, जहाँ तीन समुद्र मिलते हैं। यह मान्यता इतनी व्यापक है कि उस पर संदेह ही नहीं होता।

पर विद्वान डी. सी. सरकार कुछ और लिखते हैं। वे इसे स्पष्ट शब्दों में "पूर्वी भारत में" रखते हैं — चटगाँव ज़िले में, कुमीरा रेलवे स्टेशन के पास कुमारीकुंड नामक स्थान पर।

दोनों के बीच लगभग दो हज़ार किलोमीटर हैं। यह इस संग्रह में मिला सबसे बड़ा अंतर है।

तीन नाम, एक शब्द

भ्रम का कारण शायद नामों में ही है।

पीठ का नाम कन्याश्रम है। दक्षिण वाला स्थान कन्याकुमारी है। और सरकार जिस स्थान की बात करते हैं उसका नाम कुमारीकुंड है।

तीनों में एक ही शब्द है — कन्या, कुमारी। जब नक़ल करने वाले और संकलन करने वाले सदियों तक इन नामों के बीच चलते रहे, तो कहीं न कहीं एक दूसरे पर बैठ गया।

यह इस पूरी सूची की सबसे बड़ी सीख भी है। ये नाम आकाश से नहीं उतरे — इन्हें मनुष्यों ने लिखा, सुना, दोहराया और नक़ल किया। और जहाँ नाम मिलते-जुलते थे, वहाँ स्थान आपस में उलझ गए।

इसीलिए इस पृष्ठ पर कोई निर्णय नहीं सुनाया गया। दोनों दावे स्रोत सहित रखे गए हैं, और पाठक स्वयं देख सकता है कि प्रश्न कहाँ खुला है।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पहचान पर D. C. Sircar (1948) व प्रचलित परंपरा

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

  • कुमारीकुंड, कुमीरा के निकट, चटगाँव ज़िला (बांग्लादेश)विद्वान डी. सी. सरकार अपनी अनुक्रमणिका में स्पष्ट रूप से यही स्थान बताते हैं, और वे स्वयं "पूर्वी भारत में" शब्द जोड़ते हैं। (Sircar 1948, Index of Pithas)
  • कन्याकुमारी, तमिलनाडुप्रचलित सूचियाँ लगभग सर्वसम्मति से इसे भारत के दक्षिणतम छोर कन्याकुमारी से जोड़ती हैं। (प्रचलित परंपरा)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "located in eastern India at Kumarikunda near the Kumira railway station in the Chittagong District"

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कन्याश्रम शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न