वक्रेश्वर शक्ति पीठ

vakreśvara

इक्यावन में अकेला पीठ जहाँ जो गिरा वह शरीर का कोई अंग नहीं था — मन था।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
मनस्
शक्ति
महिषमर्दिनी
भैरव
वक्रनाथ

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन पीठों की सूची पढ़ते हुए एक क्रम बनता चला जाता है — कहीं नेत्र, कहीं जिह्वा, कहीं नाभि, कहीं उँगलियाँ। हर बार शरीर का कोई हिस्सा। फिर वक्रेश्वर आता है, और पीठनिर्णय लिखता है: मनस्।

मन। कोई हड्डी नहीं, कोई अंग नहीं।

यह चूक नहीं है। प्रचलित परंपरा भी यही कहती है — कि यहाँ देवी का मन गिरा, या भ्रूमध्य, दोनों भौंहों के बीच का वह बिंदु जिसे मन का स्थान माना जाता रहा है।

और इस बात पर रुकना बनता है। जिस देह के बिखरने से ये इक्यावन तीर्थ बने, उसमें एक स्थान ऐसा भी है जहाँ जो गिरा उसे छुआ नहीं जा सकता, तौला नहीं जा सकता, दिखाया नहीं जा सकता। परंपरा ने मन को भी उतना ही वास्तविक माना जितना हाथ या पाँव को।

यहाँ देवी महिषमर्दिनी हैं और भैरव वक्रनाथ। स्थान अपनी उष्ण जलधाराओं के लिए भी जाना जाता है — आठ कुंड, अलग-अलग तापमान के, जिनमें अग्निकुंड सबसे गर्म है।

  • इक्यावन में अकेला पीठ जहाँ अंग नहीं, मनस् — मन — गिरा माना जाता है।
  • प्रचलित परंपरा इसे भ्रूमध्य भी कहती है, दोनों भौंहों के बीच का बिंदु।
  • आठ उष्ण कुंड, अलग-अलग तापमान के; अग्निकुंड सबसे गर्म बताया जाता है।
  • शिवचरित यहाँ दक्षिण-बाहु लिखता है और देवी का नाम वक्रेश्वरी — पीठनिर्णय से भिन्न।

कथा

इस पीठ की कथा उतनी ही है जितनी सबकी — पर उसका अंत सबसे अलग है।

जो गिरा वह छुआ नहीं जा सकता

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि वक्रेश्वर में मनस् गिरा। देवी महिषमर्दिनी हुईं, भैरव वक्रनाथ।

प्रचलित परंपरा इसे कभी "मन" कहती है और कभी "भ्रूमध्य" — दोनों भौंहों के बीच का वह स्थान जिसे भारतीय परंपरा में मन और चेतना का केंद्र माना जाता रहा है। दोनों कहने का अर्थ एक ही है।

इसका अर्थ क्या है

बाक़ी पचास स्थानों पर जो गिरा उसे नाम दिया जा सकता है, दिखाया जा सकता है — हाथ, पाँव, कान, नाभि। यहाँ वह संभव नहीं।

फिर भी परंपरा ने इसे उतना ही वास्तविक माना। शरीर के टुकड़ों की सूची में मन को रख देना यह स्वीकार करना है कि जो दिखता नहीं, वह भी उतना ही है।

जो लोग मन के भार से थके होते हैं, उनके लिए यह स्थान अपने आप में एक उत्तर है — यहाँ जो पूजित है, वह भी कभी बिखरा था।

एक अंतर, जो दर्ज होना चाहिए

सब स्रोत एक बात नहीं कहते। शिवचरित यहाँ दक्षिण-बाहु — दाहिनी भुजा — लिखता है और देवी का नाम वक्रेश्वरी देता है।

यह पीठनिर्णय से मेल नहीं खाता, और इसे छिपाया नहीं गया है। इस संग्रह में canonical वही है जो पीठनिर्णय कहता है, पर जहाँ दूसरे पाठ कुछ और कहें वहाँ वह भी बताया जाता है।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); शिवचरित का पाठभेद D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

महिषमर्दिनी मंदिर, वक्रेश्वर, दुबराजपुर के निकट, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "near Dubrajpur in the Birbhum District, Bengal"

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • वक्रेश्वर के उष्ण कुंड — मंदिर परिसर के पास आठ उष्ण जलधाराएँ हैं, हर एक अलग तापमान की। इनमें अग्निकुंड सबसे गर्म बताया जाता है — द्वितीयक विवरणों के अनुसार लगभग 93 डिग्री सेल्सियस। जल को औषधीय गुणों वाला माना जाता है।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि

वक्रेश्वर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न