वृंदावन शक्ति पीठ

vṛndāvana

कृष्ण की भूमि पर वह पीठ, जिसके नाम पर विद्वान स्वयं संदेह दर्ज करते हैं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
केश
शक्ति
उमा
भैरव
भूतेश

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

वृंदावन का नाम सुनते ही कृष्ण याद आते हैं। उसी भूमि पर एक शक्ति पीठ का होना पहली बार सुनने में असामान्य लगता है — पर परंपरा में वैष्णव और शाक्त इतने अलग कभी नहीं रहे जितने आज लगते हैं।

पीठनिर्णय यहाँ केश बताता है — बाल। देवी उमा कहलाईं, भैरव भूतेश। कुछ प्रतियों में देवी कात्यायनी और भैरव कृष्णनाथ भी लिखे मिलते हैं।

कात्यायनी नाम वृंदावन में विशेष अर्थ रखता है। भागवत की कथा में गोपियाँ कात्यायनी का व्रत करती हैं ताकि कृष्ण उन्हें मिलें। यानी इस भूमि पर देवी-उपासना कोई बाहरी बात नहीं — वह कथा के भीतर ही मौजूद है।

पर एक बात ईमानदारी से कहनी होगी। विद्वान डी. सी. सरकार इस पीठ के नाम पर ही संदेह दर्ज करते हैं। पीठनिर्णय की प्रतियों में "केशजाल" और "वृंदावन" दोनों पाठ मिलते हैं, और उनका मत है कि यह नाम संभवतः किसी पाठ-दोष से बना है।

इसका अर्थ यह नहीं कि वृंदावन में देवी-पूजा नहीं होती — होती है, और सदियों से। अर्थ केवल इतना है कि यह निश्चित नहीं कि मूल सूची में यही नाम था।

  • सरकार इस नाम पर ही संदेह दर्ज करते हैं — "संभवतः किसी पाठ-दोष से बना"।
  • प्रतियों में दो पाठ मिलते हैं — केशजाल और वृंदावन।
  • देवी का पाठभेद कात्यायनी है, और भागवत में गोपियाँ कात्यायनी का ही व्रत करती हैं।
  • भैरव के पाठभेद में कृष्णनाथ नाम भी मिलता है।

कथा

यहाँ दो बातें अलग रखनी होंगी — भूमि की परंपरा, और पाठ का प्रश्न।

सती के केश

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि वृंदावन में केश गिरे — बाल। देवी उमा हुईं, भैरव भूतेश। कुछ प्रतियों में देवी कात्यायनी और भैरव कृष्णनाथ भी मिलते हैं।

कात्यायनी का व्रत

कात्यायनी नाम इस भूमि पर विशेष अर्थ रखता है।

भागवत की कथा में गोपियाँ कात्यायनी का व्रत करती हैं — यमुना तट पर, इसी कामना से कि कृष्ण उन्हें मिलें। यानी इस भूमि पर देवी-उपासना कोई बाहर से आई बात नहीं है। वह कृष्ण-कथा के भीतर ही मौजूद है।

वैष्णव और शाक्त परंपराएँ आज जितनी अलग दिखती हैं, उतनी अलग कभी नहीं थीं। यह पीठ उसी की एक याद है।

पर नाम पर संदेह है

अब वह बात जो कहनी ज़रूरी है।

विद्वान डी. सी. सरकार इस पीठ के नाम पर ही संदेह दर्ज करते हैं। पीठनिर्णय की प्रतियों में दो पाठ मिलते हैं — "केशजाल" और "वृंदावन" — और वे लिखते हैं कि यह नाम संभवतः किसी पाठ-दोष से बना है।

यानी यह निश्चित नहीं कि मूल सूची में यही नाम था। संभव है कि किसी नक़ल करने वाले ने "केशजाल" को "वृंदावन" पढ़ लिया हो, या इसका उलटा हुआ हो।

इससे वृंदावन की देवी-परंपरा कम नहीं होती — वह सदियों पुरानी है और अपने पैरों पर खड़ी है। पर सूची में यह नाम कैसे आया, यह प्रश्न खुला रहता है। इस संग्रह में ऐसे प्रश्न छिपाए नहीं जाते।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पाठ-दोष की टिप्पणी D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

वृंदावन, उत्तर प्रदेश, भारत

  • वृंदावन, उत्तर प्रदेशपीठनिर्णय की कुछ प्रतियों में नाम वृंदावन है, और आज वहाँ कात्यायनी पीठ के नाम से एक मंदिर है — जो पीठनिर्णय के देवी-पाठभेद कात्यायनी से मेल खाता है। (पीठनिर्णय का पाठभेद; प्रचलित परंपरा)
  • नाम स्वयं संदिग्ध हैसरकार लिखते हैं कि "केशजाल" और "वृंदावन" दोनों पाठ मिलते हैं और यह नाम संभवतः किसी पाठ-दोष से बना है। यानी यह निश्चित नहीं कि मूल पाठ में वृंदावन ही था। (D. C. Sircar, The Śākta Pīṭhas (1948))

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "Kesajala — Pitha (v.l. Vrndavana) … The name is apparently due to a textual confusion"

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि

वृंदावन शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न