श्रीपर्वत शक्ति पीठ

śrīparvata

नल्लमला की पहाड़ियों पर वह दुर्लभ स्थान जहाँ शक्ति पीठ और ज्योतिर्लिंग एक ही परिसर में हैं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
दक्षिण-कर्ण
शक्ति
सुंदरी
भैरव
सुंदरानंद

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

श्रीशैलम् की एक बात इसे शेष सब तीर्थों से अलग कर देती है — यहाँ शक्ति पीठ और ज्योतिर्लिंग एक ही परिसर में हैं। भ्रमराम्बा और मल्लिकार्जुन, देवी और शिव, कुछ ही क़दमों की दूरी पर। भारत में ऐसा दूसरा स्थान नहीं है।

भक्त के लिए इसका अर्थ व्यावहारिक भी है और भावनात्मक भी। जो लोग जीवन भर दो अलग यात्राओं की योजना बनाते रहते हैं, उन्हें यहाँ दोनों एक साथ मिल जाते हैं। पर बात केवल सुविधा की नहीं है — शिव और शक्ति को अलग-अलग पूजने की आदत यहाँ अपने आप टूटती है।

मंदिर कृष्णा नदी के ऊपर नल्लमला की पहाड़ियों पर है। नदी यहाँ पाताल गंगा कहलाती है, और उस तक उतरने के लिए आठ सौ बावन सीढ़ियाँ हैं। जो उतरता है उसे लौटते समय वही सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं — और यह श्रम स्वयं यात्रा का हिस्सा माना जाता रहा है।

देवी का नाम भी असाधारण है। भ्रमराम्बा अर्थात् भौंरों की माता। किसी देवी का नाम किसी छोटे-से जीव पर रखा जाना अपने आप में एक संकेत है — कि शक्ति सदा विशाल रूप में नहीं आती।

  • भारत का एकमात्र स्थान जहाँ शक्ति पीठ और ज्योतिर्लिंग एक ही परिसर में हैं।
  • देवी का नाम भ्रमराम्बा — "भौंरों की माता", अरुणासुर वध की कथा से।
  • अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में "श्रीशैले भ्रमराम्बिका" के रूप में गिना गया।
  • कृष्णा नदी यहाँ पाताल गंगा कहलाती है; तट तक 852 सीढ़ियाँ उतरती हैं।

कथा

भ्रमराम्बा की कथा एक ऐसे वरदान की है जिसमें असुर ने हर बड़ी चीज़ से अपनी रक्षा माँग ली — और भूल गया कि छोटी चीज़ें भी होती हैं।

अरुणासुर का वरदान

अरुणासुर नामक असुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और वर माँगा कि दो पैर या चार पैर वाला कोई प्राणी उसका वध न कर सके।

वर मिलते ही वह निर्भय हो गया। देवता, ऋषि, मनुष्य — सब उसके अत्याचार से त्रस्त हो उठे। उसने गिनकर सोचा था: मनुष्य दो पैरों वाले, पशु चार पैरों वाले। इन दोनों से बच गया तो और कौन बचा?

भौंरों का झुंड

पीड़ित प्राणी देवी की शरण में गए। देवी ने उत्तर में कोई अस्त्र नहीं उठाया। उन्होंने अपने शरीर से भौंरों के हज़ारों झुंड छोड़ दिए — और भौंरे के छह पैर होते हैं।

वरदान की दीवार वहीं ढह गई। अरुणासुर उन्हीं भौंरों के डंक से मारा गया।

इस कथा का मर्म गिनती में है। असुर ने बड़े शत्रुओं से रक्षा माँगी थी और छोटों को गिना ही नहीं। जो अपने को अजेय मान लेता है, वह प्रायः बड़े ख़तरों की सूची बनाता है और छोटी चीज़ों को अनदेखा कर देता है — और चोट वहीं से आती है।

भ्रमराम्बा नाम

भ्रमर अर्थात् भौंरा, और अम्बा अर्थात् माता। इसी से भ्रमराम्बा — भौंरों की माता। परंपरा कहती है कि देवी उसी रूप में यहाँ श्रीशैल पर स्थित हो गईं।

यह ध्यान देने योग्य है कि इस पीठ की देवी का नाम किसी विशाल या भयंकर रूप पर नहीं, एक छोटे-से जीव पर पड़ा। शक्ति की परंपरा में यह अकेला ऐसा नाम नहीं है, पर सबसे स्पष्ट अवश्य है।

स्रोत: देवी भागवत पुराण तथा स्कंद पुराण; पीठ की गणना पीठनिर्णय से

इतिहास

श्रीशैल का इतिहास दक्षिण भारत के कई राजवंशों से होकर गुज़रता है, और उनमें से हर एक ने यहाँ कुछ न कुछ जोड़ा।

सबसे पुराने अभिलेख

यहाँ की सबसे पुरानी गवाही सातवाहन काल के अभिलेखों से आती है, जो इसे दूसरी शताब्दी तक ले जाते हैं। मल्लिकार्जुन का मंदिर सातवीं शताब्दी का माना जाता है।

इसका अर्थ यह है कि यह पर्वत तब भी तीर्थ था जब आज दिखने वाला कोई भी ढाँचा खड़ा नहीं हुआ था।

रेड्डि और विजयनगर

बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में रेड्डि राजाओं ने वीरशिरोमंडपम् बनवाया और पाताल गंगा तक उतरने वाली सीढ़ियाँ भी उन्हीं के काल की मानी जाती हैं।

चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में विजयनगर काल में मुख मंडप जुड़ा। यानी जो परिसर आज दिखता है वह किसी एक राजा की देन नहीं है — वह कई शताब्दियों के जुड़ाव का जोड़ है।

  • 2री शताब्दीसातवाहन कालीन अभिलेखों में उल्लेख
  • 7वीं शताब्दीमल्लिकार्जुन मंदिर का काल
  • 12वीं–13वीं शताब्दीरेड्डि राजाओं द्वारा वीरशिरोमंडपम् व पाताल गंगा की सीढ़ियाँ
  • 14वीं–15वीं शताब्दीविजयनगर काल में मुख मंडप

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

श्री भ्रमराम्बा देवी मंदिर, श्रीशैलम्, नंद्याल, आंध्र प्रदेश, भारत

  • श्रीशैलम्, आंध्र प्रदेश — भ्रमराम्बाप्रचलित परंपरा तथा अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र यहाँ भ्रमराम्बिका को मानते हैं, और कहा जाता है कि सती की ग्रीवा यहाँ गिरी। (अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र; en.wikipedia.org/wiki/Mallikarjuna_Jyotirlinga)
  • पीठनिर्णय का पाठपीठनिर्णय श्रीपर्वत पर दक्षिण-कर्ण, देवी सुंदरी व भैरव सुंदरानंद बताता है। ग्रीवा और महालक्ष्मी उसकी सूची में श्रीहट्ट (#27) पर आते हैं, जिसे सरकार सिलहट में रखते हैं — और "श्रीशैल" वहीं का पाठभेद है। (D. C. Sircar, The Śākta Pīṭhas (1948))

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "Sriparvata … See Srisaila"

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (उसी परिसर में) — द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक, इसी परिसर में। दर्शन समय, आरती व यात्रा की जानकारी उसी पृष्ठ पर दी गई है — श्रद्धालु प्रायः दोनों के दर्शन एक साथ करते हैं।
  • श्रीहट्ट शक्ति पीठ (सिलहट, बांग्लादेश) — नाम की उलझन का दूसरा सिरा। पीठनिर्णय में श्रीहट्ट का एक पाठभेद "श्रीशैल" है, और जो अंग व देवी प्रचलित परंपरा श्रीशैलम् पर बताती है — ग्रीवा व महालक्ष्मी — वे वहीं की हैं। दोनों पृष्ठ साथ पढ़ने पर पूरी बात साफ़ होती है।
  • पाताल गंगा (कृष्णा नदी) — मंदिर से नदी तट तक 852 सीढ़ियाँ उतरती हैं; स्नान को पवित्र माना जाता है।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि · नवरात्रि · उगादि

श्रीपर्वत शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न