FAQ
श्रीपर्वत शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हाँ। भ्रमराम्बा देवी का शक्ति पीठ और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग एक ही परिसर में हैं। भारत में ऐसा दूसरा स्थान नहीं है, और यही इस तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
भ्रमर अर्थात् भौंरा। कथा के अनुसार अरुणासुर ने वर पाया था कि दो या चार पैर वाला कोई प्राणी उसका वध न कर सके; देवी ने अपने शरीर से भौंरों के झुंड छोड़े, जिनके छह पैर होते हैं, और उन्हीं के डंक से उसका अंत हुआ। इसी से देवी भ्रमराम्बा — भौंरों की माता — कहलाईं।
इस पर दो मत हैं और दोनों बताना उचित है। प्रचलित परंपरा तथा अष्टादश स्तोत्र यहाँ ग्रीवा और देवी भ्रमराम्बा मानते हैं। पीठनिर्णय (जो इस संग्रह का आधार है) श्रीपर्वत पर दक्षिण-कर्ण, देवी सुंदरी और भैरव सुंदरानंद बताता है — उसकी सूची में ग्रीवा व महालक्ष्मी श्रीहट्ट पर आते हैं, जिसे विद्वान सिलहट (बांग्लादेश) में रखते हैं। यह अंतर नामों की समानता से उपजा है और आज तक बना हुआ है।
सबसे पुराने प्रमाण सातवाहन काल के अभिलेख हैं, जो इसे दूसरी शताब्दी तक ले जाते हैं। मल्लिकार्जुन का मंदिर सातवीं शताब्दी का माना जाता है, और आगे रेड्डि तथा विजयनगर राजाओं ने परिसर में निर्माण जोड़े।
श्रीशैलम् के नीचे बहने वाली कृष्णा नदी को यहाँ पाताल गंगा कहा जाता है। मंदिर से नदी तट तक उतरने के लिए 852 सीढ़ियाँ हैं और वहाँ स्नान को पवित्र माना जाता है।
देवस्थानम् की आधिकारिक वेबसाइट ऐसी तकनीक से बनी है जिससे उसका विवरण सीधे पढ़ा नहीं जा सका, और बिना आधिकारिक पुष्टि के समय छापना इस संग्रह के नियम के विरुद्ध है। इसी परिसर के मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग पृष्ठ पर उपलब्ध जानकारी अपनी सीमाओं के उल्लेख के साथ दी गई है। यात्रा से पूर्व देवस्थानम् की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि अवश्य करें।
