FAQ
ज्वालामुखी शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ सती की जिह्वा गिरी थी। यहाँ की शक्ति सिद्धिदा (अम्बिका) और भैरव उन्मत्त कहलाते हैं। प्रचलित परंपरा भी यही अंग बताती है।
नहीं। यहाँ गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है। पूजा उन प्राकृतिक ज्वालाओं की होती है जो चट्टान की एक दरार से निकलती हैं। भक्त इस दरार को देवी का मुख मानते हैं।
भूवैज्ञानिक दृष्टि से चट्टान की दरार से निकलने वाली ज्वलनशील प्राकृतिक गैस इसका कारण मानी जाती है। भक्तों के लिए यह देवी का प्रत्यक्ष स्वरूप है। दोनों बातें एक-दूसरे को काटती नहीं — इतिहास बताता है कि यह ज्वाला सदियों से देखी जाती रही है।
परंपरा के अनुसार देवी का मुख ज्वालामुखी में है और उनका शरीर कांगड़ा के वज्रेश्वरी मंदिर में। इस संग्रह में वज्रेश्वरी वाला स्थान जालंधर शक्ति पीठ के रूप में आता है, और विद्वान भी लिखते हैं कि जालंधर पीठ अब ज्वालामुखी के निकट माना जाता है।
निर्माण की कोई निश्चित तिथि प्रमाणित नहीं है, पर स्थान का उल्लेख बहुत पुराना है। लगभग 650 ईस्वी में एक चीनी दूत ने संभवतः इसी स्थान का वर्णन किया। चौदहवीं शताब्दी में फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की यात्रा, सोलहवीं में अबुल फ़ज़ल का उल्लेख और सत्रहवीं में यूरोपीय यात्रियों के विवरण मिलते हैं।
यह कथा यात्रा-लेखों में बहुत प्रचलित है, पर इस पृष्ठ पर जानबूझकर नहीं दी गई — इसका कोई विश्वसनीय स्रोत नहीं मिला। जो प्रमाणित है वह इससे कहीं अधिक ठोस है: चार अलग सदियों में चीनी, तुर्क, मुग़ल और यूरोपीय यात्रियों ने इस स्थान को स्वयं देखकर दर्ज किया।
