ज्वालामुखी शक्ति पीठ

jvālāmukhī

वह पीठ जहाँ न कोई मूर्ति है, न दीपक — शिला की दरार से निकलती ज्वालाएँ ही देवी का स्वरूप हैं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
जिह्वा
शक्ति
सिद्धिदा
भैरव
उन्मत्त

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन पीठों में कामाख्या के बाद यदि कोई स्थान अपनी अनुपस्थिति से पहचाना जाता है, तो वह ज्वालामुखी है। यहाँ गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है। जो है, वह चट्टान की एक दरार है जिससे ज्वालाएँ निकलती रहती हैं — बिना किसी दीपक के, बिना किसी ईंधन के जो दिखाई दे।

पीठनिर्णय कहता है कि यहाँ सती की जिह्वा गिरी। और जो यहाँ जलता है वह भी जीभ जैसा ही दिखता है — लपटें, जो हिलती हैं, उठती हैं, बुझती नहीं। नाम, अंग और दृश्य तीनों एक ही बात कहते हैं।

भक्तों की दृष्टि में यह दरार देवी का मुख है। और परंपरा जोड़ती है कि उनका शरीर पास ही कांगड़ा के वज्रेश्वरी मंदिर में है। यानी यह अकेला स्थान नहीं, एक जोड़ा है — मुख यहाँ, देह वहाँ।

जिन लोगों ने चमत्कार को हमेशा किसी बड़े दृश्य में खोजा है, उनके लिए यहाँ कुछ खास नहीं दिखेगा। एक पत्थर, कुछ लपटें, और बहुत सारे लोग। पर जो सदियों से जल रहा हो और जिसे किसी ने जलाया न हो — उसके सामने खड़े होकर प्रश्न अपने आप शांत हो जाते हैं।

  • कोई प्रतिमा नहीं — शिला की दरार से निकलती प्राकृतिक ज्वालाएँ ही पूजित हैं।
  • परंपरा इस दरार को देवी का मुख मानती है और उनका शरीर कांगड़ा के वज्रेश्वरी मंदिर में।
  • लोकपरंपरा में इन ज्वालाओं को नौ देवियों का रूप माना जाता है।
  • सातवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं तक — चीनी, तुर्क, मुग़ल और यूरोपीय यात्रियों ने इसका उल्लेख किया।

कथा

यहाँ की कथा सबसे छोटी है, और शायद इसीलिए सबसे स्पष्ट — जो गिरा वह जिह्वा थी, और जो बचा वह अग्नि है।

सती की जिह्वा

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह उठाकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ एक पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि यहाँ जिह्वा गिरी। देवी सिद्धिदा कहलाईं, भैरव उन्मत्त।

जो जलता रहा

परंपरा कहती है कि जिह्वा के गिरने के साथ ही यहाँ ज्वालाएँ प्रकट हुईं, और तब से बुझी नहीं।

भक्त इस दरार को देवी का मुख मानते हैं। लोकपरंपरा में इन ज्वालाओं को नौ देवियों का रूप कहा जाता है — यद्यपि यह गणना विद्वानों के विवरणों में नहीं, लोकमान्यता में मिलती है।

देखने वाले के लिए यहाँ आश्चर्य की कोई भव्य रचना नहीं है। पत्थर की एक दरार, और उसमें से उठती लपटें। परंतु जो चीज़ बिना जलाए जलती रहे, उसके सामने बहुत कुछ कहने को नहीं बचता।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); ज्वालाओं की नौ-गणना लोकपरंपरा से

इतिहास

इस स्थान का इतिहास किसी एक राजा के शिलालेख से नहीं, बाहर से आए यात्रियों की आँखों से लिखा गया — और वह सूची असाधारण रूप से लंबी है।

यात्रियों के विवरण

लगभग 650 ईस्वी में एक चीनी दूत ने यहाँ की चूना-पत्थर की चट्टानों से निकलते गर्म और ठंडे जल का वर्णन किया — संभवतः यही स्थान।

चौदहवीं शताब्दी में शम्स-ए-सिराज के विवरण में सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की यहाँ यात्रा का उल्लेख है। सोलहवीं शताब्दी में अबुल फ़ज़ल ने इसे "पर्वत पर दीपों जैसी दिखती रोशनियाँ" कहकर दर्ज किया।

सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेज़ यात्री थॉमस कोरयट और फ़्रांसीसी यात्री ज़्याँ द तेवेनो ने भी इसका उल्लेख किया।

इस सूची का अर्थ

ध्यान दीजिए कि ये सब बाहर के लोग थे — चीनी, तुर्क, मुग़ल, अंग्रेज़, फ़्रांसीसी। किसी को यहाँ पूजा नहीं करनी थी, किसी की आस्था दाँव पर नहीं थी। फिर भी हर एक ने इसे देखकर लिखा।

जब चार अलग सदियों के, चार अलग देशों के लोग एक ही बात दर्ज करें, तो वह विवरण किसी एक परंपरा के दावे से अधिक भरोसेमंद हो जाता है।

  • लगभग 650 ई.एक चीनी दूत का विवरण — संभवतः यही स्थान
  • 14वीं शताब्दीशम्स-ए-सिराज के अनुसार फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की यात्रा
  • 16वीं शताब्दीअबुल फ़ज़ल का उल्लेख — "पर्वत पर दीपों जैसी रोशनियाँ"
  • 17वीं शताब्दीथॉमस कोरयट व ज़्याँ द तेवेनो के यात्रा-विवरण

आज यह स्थान कहाँ है

ज्वाला जी मंदिर, ज्वालामुखी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "in the Kangrah District, Punjab"

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • जालंधर शक्ति पीठ (वज्रेश्वरी, कांगड़ा) — परंपरा कहती है कि देवी का मुख ज्वालामुखी में है और शरीर कांगड़ा के वज्रेश्वरी मंदिर में। सरकार भी लिखते हैं कि जालंधर पीठ अब ज्वालामुखी के निकट माना जाता है — यानी ये दोनों पीठ आपस में जुड़े हुए हैं।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि

ज्वालामुखी शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न