रामगिरि शक्ति पीठ

rāmagiri

वह पीठ जिसके अंग पर ही तीन अलग पाठ मिलते हैं — और जिसका स्थान भी तय नहीं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
स्तन
शक्ति
चण्डा
भैरव
नल

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

रामगिरि उन थोड़े पीठों में है जहाँ अनिश्चितता एक नहीं, दो स्तरों पर है — स्थान पर भी, और अंग पर भी।

पीठनिर्णय की प्रतियों में यहाँ **तीन अलग अंग** मिलते हैं: स्तन, नासा और नाल। ऐसा इस सूची में कम ही होता है — प्रायः एक अंग होता है और कहीं-कहीं एक पाठभेद। यहाँ तीन।

देवी चण्डा कहलाईं, और कुछ प्रतियों में रामकिणी तथा शिवानी नाम भी मिलते हैं। भैरव नल हैं।

स्थान पर भी विद्वान डी. सी. सरकार निश्चित नहीं। वे इतना कहते हैं कि "राजगिरि" — जो इसी पीठ का पाठभेद है — संभवतः **राजगृह** का ही रूप है, यानी बिहार का राजगीर।

दूसरी ओर "रामगिरि" नाम साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है। कालिदास के मेघदूत में यक्ष जिस पर्वत पर निर्वासित था, उसका नाम रामगिरि ही है, और उसे प्रायः नागपुर के पास रामटेक से जोड़ा जाता है।

पर यह साहित्यिक पहचान है, और सरकार इस पीठ के संदर्भ में उसका उल्लेख नहीं करते। इसलिए यहाँ उसे एक दावे के रूप में रखा गया है, तथ्य के रूप में नहीं।

  • अंग पर तीन अलग पाठ — स्तन, नासा और नाल; इस सूची में ऐसा कम ही होता है।
  • सरकार स्थान के लिए केवल "संभवतः राजगृह का रूप" कहते हैं।
  • नाम कालिदास के मेघदूत के रामगिरि जैसा है, पर वह साहित्यिक पहचान इस पीठ से जोड़ी हुई नहीं।
  • देवी के तीन नाम मिलते हैं — चण्डा, रामकिणी, शिवानी।

कथा

यहाँ अनिश्चितता दो स्तरों पर है — क्या गिरा, और कहाँ गिरा।

तीन पाठ, एक पीठ

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पर यहाँ यह कहना कठिन है कि क्या गिरा। पीठनिर्णय की प्रतियों में तीन अलग अंग मिलते हैं — स्तन, नासा और नाल।

इस सूची में ऐसा कम ही होता है। प्रायः एक अंग निश्चित होता है और कहीं-कहीं एक पाठभेद जुड़ जाता है। तीन पाठ मिलना बताता है कि इस पंक्ति की नक़ल में कहीं गहरी गड़बड़ी हुई।

देवी चण्डा कहलाईं; कुछ प्रतियों में रामकिणी और शिवानी भी। भैरव नल हैं।

रामगिरि या राजगिरि

स्थान पर भी विद्वान निश्चित नहीं।

सरकार की अलग प्रविष्टि कहती है कि "राजगिरि" — जो इसी पीठ का पाठभेद है — संभवतः राजगृह का ही रूप है। राजगृह आज का राजगीर है, बिहार में।

पर वे "संभवतः" कहते हैं, और उससे आगे कुछ नहीं।

मेघदूत वाला रामगिरि

"रामगिरि" नाम साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है, और यहाँ सावधानी चाहिए।

कालिदास के मेघदूत में यक्ष जिस पर्वत पर निर्वासित था, उसका नाम रामगिरि है। उसे प्रायः नागपुर के पास रामटेक से जोड़ा जाता है, और वह पहचान साहित्य के विद्वानों में काफ़ी मानी जाती है।

पर यह साहित्यिक पहचान है। सरकार इस **पीठ** के संदर्भ में मेघदूत का उल्लेख नहीं करते।

दो अलग परंपराओं में एक ही नाम आ जाना उन्हें एक नहीं कर देता — यह बात इस पूरे संग्रह में बार-बार सिद्ध हुई है। श्रीशैल, कन्याश्रम, उज्जयिनी, जालंधर — हर जगह नाम-साम्य ने भ्रम खड़ा किया।

इसलिए यहाँ मेघदूत वाला रामगिरि एक दावे के रूप में दर्ज है, तथ्य के रूप में नहीं।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पहचान पर D. C. Sircar (1948)

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

भारत

  • राजगृह (राजगीर, बिहार)सरकार लिखते हैं कि "राजगिरि" संभवतः राजगृह का ही रूप है — और राजगिरि इसी पीठ का पाठभेद है। पर वे "संभवतः" कहते हैं। (Sircar 1948, Index of Pithas (Rajagiri))
  • रामटेक, नागपुर के पास (महाराष्ट्र)साहित्य में "रामगिरि" कालिदास के मेघदूत का वह पर्वत है जहाँ यक्ष निर्वासित था, और उसे प्रायः रामटेक से जोड़ा जाता है। पर यह साहित्यिक पहचान है — सरकार इस पीठ के संदर्भ में उसका उल्लेख नहीं करते। (साहित्यिक परंपरा (मेघदूत); इस पीठ से जोड़ना अप्रमाणित)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "Rajagiri — Pitha (v.l. Ramagiri); possibly a form of Rajagrha"

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रामगिरि शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न