FAQ
करवीर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ त्रिनेत्र गिरा था। उसके अनुसार यहाँ की शक्ति महिषमर्दिनी और भैरव क्रोधीश कहलाते हैं।
पीठनिर्णय इस पीठ की देवी को महिषमर्दिनी कहता है, पर आज यहाँ महालक्ष्मी (अंबाबाई) पूजी जाती हैं और अष्टादश स्तोत्र भी "कोल्हापुरे महालक्ष्मी" कहता है। सदियों में देवियों के नाम और रूप बदलते रहे हैं। इस संग्रह में शास्त्र का नाम अलग रखा गया है और लोकप्रचलित नाम साथ दिया गया है, ताकि दोनों दिखें।
अधिकतर परंपरा यही मानती है, और मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी देवी को "श्री करवीर निवासिनी" कहती है। पर कालिका पुराण करवीर को ब्रह्मावर्त की राजधानी बताता है, दृषद्वती नदी के किनारे — यानी पूर्वी पंजाब में। दोनों मत इस पृष्ठ पर स्रोत सहित दिए गए हैं।
यह महाराष्ट्र की अपनी एक क्षेत्रीय परंपरा है जो कुछ प्रमुख देवी-स्थानों को "साढ़े तीन शक्तिपीठ" के रूप में गिनती है, और कोल्हापुर उनमें है। ध्यान रहे कि यह न पीठनिर्णय की इक्यावन की सूची है, न अष्टादश की — यह एक तीसरी गणना है।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसका निर्माण चालुक्य राजा कर्णदेव ने 634 ईस्वी में कराया और स्थापत्य हेमाडपंती शैली का है। इतिहासकार पॉल डुंडास का मत है कि यह मूलतः जैन तीर्थंकर चंद्रप्रभ का मंदिर था जो लगभग बारहवीं शताब्दी में महालक्ष्मी मंदिर बना — यह मत अकादमिक चर्चा में है, अंतिम निर्णय नहीं।
मूर्ति काले पत्थर की है, लगभग तीन फ़ुट ऊँची। मुकुट पर पाँच फणों वाला सर्प है और हाथों में मातुलिंग फल, गदा, ढाल तथा पानपात्र। पीछे पत्थर का सिंह खड़ा है, जो देवी का वाहन है।
