करवीर शक्ति पीठ

karavīra

दक्षिण का वह पीठ जिसे पीठनिर्णय महिषमर्दिनी कहता है और जहाँ आज महालक्ष्मी पूजी जाती हैं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
त्रिनेत्र
शक्ति
महिषमर्दिनी
भैरव
क्रोधीश

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

कोल्हापुर की अंबाबाई महाराष्ट्र के सबसे व्यस्त तीर्थों में हैं, और यह पीठ इक्यावन की सूची में दूसरे स्थान पर आता है।

पीठनिर्णय यहाँ त्रिनेत्र बताता है — नेत्र। देवी महिषमर्दिनी कहलाईं, भैरव क्रोधीश। पर आज इस मंदिर में जिनकी पूजा होती है वे महालक्ष्मी हैं, और अष्टादश स्तोत्र भी "कोल्हापुरे महालक्ष्मी" ही कहता है। नाम बदला, स्थान वही रहा — ऐसा इक्यावन में एक से अधिक बार हुआ है।

देवी की मूर्ति काले पत्थर की है, लगभग तीन फ़ुट ऊँची, और उनके मुकुट पर पाँच फणों वाला सर्प है। हाथों में मातुलिंग फल, गदा, ढाल और पानपात्र। पीछे पत्थर का सिंह खड़ा है।

एक बात जो कोल्हापुर को अलग करती है वह यह कि महाराष्ट्र की अपनी एक परंपरा इसे "साढ़े तीन शक्तिपीठ" में गिनती है — यह न इक्यावन की सूची है, न अठारह की, बल्कि एक तीसरी क्षेत्रीय परंपरा। एक ही स्थान का तीन अलग गणनाओं में आना बताता है कि इसकी मान्यता कितनी गहरी रही है।

  • पीठनिर्णय यहाँ देवी को महिषमर्दिनी कहता है, जबकि आज पूजा महालक्ष्मी की होती है।
  • महाराष्ट्र की "साढ़े तीन शक्तिपीठ" परंपरा में भी गिना जाता है — एक तीसरी, क्षेत्रीय गणना।
  • मूर्ति के मुकुट पर पाँच फणों वाला सर्प; हाथों में मातुलिंग, गदा, ढाल व पानपात्र।
  • मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट देवी को "श्री करवीर निवासिनी" कहती है — करवीर नाम आज भी जीवित है।

कथा

शक्ति पीठ की मूल कथा वही है — पर इस पीठ का प्रश्न यह है कि करवीर आख़िर है कहाँ।

सती का त्रिनेत्र

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और संसार काँपने लगा। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ एक पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि करवीर में त्रिनेत्र गिरा। देवी महिषमर्दिनी हुईं, भैरव क्रोधीश।

दक्षिण या उत्तर

करवीर कहाँ है, इस पर दो परंपराएँ हैं और वे बहुत दूर हैं।

कालिका पुराण इसे ब्रह्मावर्त की राजधानी बताता है, दृषद्वती नदी के किनारे — यानी पूर्वी पंजाब में। पर सरकार जोड़ते हैं कि इसे प्रायः कोल्हापुर से ही जोड़ा जाता है, जिसे करवीर कहा जाता रहा है।

कोल्हापुर वाला दावा आज कहीं अधिक जीवित है। मंदिर की अपनी वेबसाइट देवी को "श्री करवीर निवासिनी अंबाबाई महालक्ष्मी" कहती है — नाम आज भी वहीं टिका हुआ है। फिर भी कालिका पुराण का पाठ अपनी जगह है, और उसे मिटाया नहीं गया।

नाम जो बदल गया

एक और अंतर ध्यान देने योग्य है। पीठनिर्णय इस पीठ की देवी को महिषमर्दिनी कहता है। पर आज यहाँ महालक्ष्मी पूजी जाती हैं, और अष्टादश स्तोत्र भी महालक्ष्मी ही कहता है।

यह विरोध नहीं है, यह समय है। सदियों में देवियों के नाम और रूप बदलते रहे हैं — कहीं स्थानीय नाम ऊपर आ गया, कहीं शास्त्रीय नाम पीछे छूट गया। इस संग्रह में शास्त्र का नाम canonical में रखा गया है और लोकप्रचलित नाम साथ दर्ज है, ताकि पाठक दोनों देख सके।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण), कालिका पुराण; पहचान पर D. C. Sircar (1948)

इतिहास

कोल्हापुर का मंदिर बहुत पुराना है, और उसके आरंभ को लेकर एक विद्वत्-चर्चा भी है जिसे छिपाना उचित नहीं।

निर्माण

उपलब्ध विवरणों के अनुसार मंदिर का निर्माण चालुक्य राजा कर्णदेव ने 634 ईस्वी में कराया। स्थापत्य हेमाडपंती शैली का है।

मंदिर आज पश्चिम महाराष्ट्र देवस्थान समिति के अधीन है।

एक विद्वत्-मत

इतिहासकार पॉल डुंडास का मत है कि यह मूलतः आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ भगवान का जैन मंदिर था, जो मध्यकाल में — लगभग बारहवीं शताब्दी में — महालक्ष्मी का मंदिर बना।

यह मत यहाँ इसलिए दिया गया है कि वह अकादमिक चर्चा में मौजूद है, न कि इसलिए कि इसे अंतिम मान लिया जाए। ऐसे प्रश्नों पर विद्वान असहमत रहते हैं, और किसी एक पक्ष को चुपचाप छोड़ देना पाठक के साथ ईमानदारी नहीं होगी।

  • 634 ई.चालुक्य राजा कर्णदेव द्वारा निर्माण (उपलब्ध विवरणों के अनुसार)
  • लगभग 12वीं शताब्दीपॉल डुंडास के मत में जैन मंदिर से महालक्ष्मी मंदिर में परिवर्तन

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर, महाराष्ट्र, भारत

  • कोल्हापुर, महाराष्ट्रसरकार लिखते हैं कि इसे प्रायः कोल्हापुर से ही जोड़ा जाता है, जिसे करवीर कहा जाता है। मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी देवी को "श्री करवीर निवासिनी अंबाबाई महालक्ष्मी" कहती है। अष्टादश स्तोत्र भी "कोल्हापुरे महालक्ष्मी" कहता है। (Sircar 1948, Index of Pithas; mahalaxmikolhapur.com; अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र)
  • पूर्वी पंजाब — दृषद्वती नदी पर, ब्रह्मावर्त की राजधानीकालिका पुराण करवीर को यहाँ रखता है, न कि दक्षिण में। सरकार यह मत भी दर्ज करते हैं। (कालिका पुराण, Sircar 1948 में उद्धृत)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "usually identified with Kolhapur (called Karvir) … but [Kalika Purana places it] in the Eastern Punjab"

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि · किरणोत्सव · रथोत्सव

करवीर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न