कालीपीठ शक्ति पीठ

kālīpīṭha

कोलकाता का प्रसिद्ध कालीघाट — और वह उल्लेख जिससे विद्वानों ने पूरी सूची की उम्र आँकी।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
दक्षिण-पादांगुलि
शक्ति
काली
भैरव
नकुलेश

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

कालीघाट आज बंगाल का सबसे जाना-पहचाना देवी-स्थान है। पीठनिर्णय में यह कालीपीठ के नाम से आता है, और वहाँ अंग बताया गया है दक्षिण-पादांगुलि — दाहिने पैर की उँगलियाँ। देवी काली हैं, भैरव नकुलेश।

पर इस पीठ की सबसे रोचक बात पूजा की नहीं, पाठ की है।

विद्वान डी. सी. सरकार ने पूरे पीठनिर्णय की तिथि आँकने के लिए इसी उल्लेख का सहारा लिया। उनका तर्क यह था कि कालीघाट की प्रसिद्धि कलकत्ता की स्थापना (1690) के बाद की लगती है — सोलहवीं शताब्दी के चंडीमंगल में कालीघाट का पीठ के रूप में उल्लेख नहीं है, और उसी सदी के लेखक वंशीदास भी उसे पीठ नहीं मानते।

इसी आधार पर वे पीठनिर्णय को लगभग 1690 से 1720 के बीच का मानते हैं।

यह बात परंपरा को छोटा नहीं करती। देवी की पूजा और सूची का संकलन दो अलग चीज़ें हैं। पर यह बताती है कि जिस सूची को हम आज इक्यावन के नाम से जानते हैं, वह किसी न किसी काल में, किसी न किसी हाथ से लिखी गई — और उस काल की छाप उसमें रह गई।

  • पीठनिर्णय में यह "कालीपीठ" नाम से आता है, "कालीघाट" नाम से नहीं — वह #45 है, जो एक अलग गाँव है।
  • इसी उल्लेख के आधार पर विद्वानों ने पूरे पीठनिर्णय की तिथि लगभग 1690–1720 आँकी।
  • सोलहवीं शताब्दी के चंडीमंगल में कालीघाट का पीठ के रूप में उल्लेख नहीं है।
  • अंग — दाहिने पैर की उँगलियाँ; देवी काली, भैरव नकुलेश।

कथा

यहाँ दो बातें अलग-अलग रखनी होंगी — कथा क्या कहती है, और पाठ क्या बताता है।

सती की पादांगुलि

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि यहाँ दक्षिण-पादांगुलि गिरी — दाहिने पैर की उँगलियाँ। देवी काली हुईं, भैरव नकुलेश।

नाम की उलझन, जो सुलझी हुई है

एक बात स्पष्ट कर देनी चाहिए, क्योंकि यह भ्रम आम है।

पीठनिर्णय में कोलकाता का यह प्रसिद्ध स्थान **कालीपीठ** नाम से आता है। सूची में "कालीघाट" नाम से जो पीठ है, वह अलग है — विद्वानों के अनुसार वह जुरनपुर, कटवा के पास का एक स्थान है।

नाम उलटे-से लगते हैं, पर पाठ यही कहता है। सरकार स्वयं लिखते हैं कि मूल भाग में कालीघाट को कालीपीठ कहा गया है।

एक उल्लेख जिसने पूरी सूची की उम्र बताई

इस पीठ की सबसे असाधारण बात यह है कि इसी के कारण विद्वान पूरी सूची की तिथि आँक सके।

कालीघाट की प्रसिद्धि कलकत्ता की स्थापना — 1690 — के बाद की लगती है। उससे पहले के ग्रंथ इसे पीठ नहीं मानते: सोलहवीं शताब्दी के चंडीमंगल में इसका पीठ के रूप में उल्लेख नहीं है, और उसी सदी के वंशीदास भी इसे पीठ नहीं गिनते।

तो जिस सूची में कालीघाट आता है, वह सूची 1690 के बाद की ही होगी। इसी तर्क से सरकार पीठनिर्णय को लगभग 1690–1720 के बीच रखते हैं।

यह सोचने लायक है। एक तीर्थ का नाम किसी सूची में आ जाना, और उसी नाम से तीन सौ साल बाद उस सूची की उम्र पता चल जाना — पाठ इसी तरह अपने बारे में बोलते हैं।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); तिथि-निर्धारण D. C. Sircar, The Śākta Pīṭhas (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

कालीघाट काली मंदिर, कालीघाट, दक्षिण कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "In the original part of Pitha, Kalighat is referred to as Kalipitha"; तथा "the more important Kalighat in the southern suburb of Calcutta"

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कालीपीठ शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न