FAQ
कालीपीठ शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ दक्षिण-पादांगुलि — दाहिने पैर की उँगलियाँ — गिरीं। यहाँ की शक्ति काली और भैरव नकुलेश कहलाते हैं।
सूची में कोलकाता का यह प्रसिद्ध स्थान कालीपीठ नाम से आता है। "कालीघाट" नाम से जो पीठ है वह अलग है — विद्वानों के अनुसार जुरनपुर, कटवा के पास का एक स्थान। नाम उलटे-से लगते हैं, पर डी. सी. सरकार स्वयं लिखते हैं कि मूल भाग में कालीघाट को कालीपीठ कहा गया है।
देवी की पूजा प्राचीन है, पर इस स्थान की व्यापक प्रसिद्धि अपेक्षाकृत बाद की लगती है। सोलहवीं शताब्दी के चंडीमंगल में कालीघाट का पीठ के रूप में उल्लेख नहीं है, और उसी सदी के लेखक वंशीदास भी इसे पीठ नहीं मानते। विद्वानों का अनुमान है कि इसकी प्रसिद्धि कलकत्ता की स्थापना (1690) के बाद बढ़ी।
डी. सी. सरकार इसे लगभग 1690 से 1720 के बीच का मानते हैं, और उनका एक मुख्य तर्क यही कालीघाट वाला उल्लेख है। इसका अर्थ यह नहीं कि पीठों की परंपरा नई है — वह बहुत पुरानी है। अर्थ केवल इतना है कि इक्यावन की यह विशेष सूची अपेक्षाकृत बाद में संकलित हुई।
इस मंदिर का कोई आधिकारिक स्रोत नहीं मिला जिससे दर्शन समय सत्यापित किए जा सकें, और बिना पुष्टि के समय छापना इस संग्रह के नियम के विरुद्ध है।
