जनस्थान शक्ति पीठ

janasthāna

रामायण के जनस्थान की भूमि का वह पीठ, जहाँ सती की ठुड्डी गिरी।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
चिबुक
शक्ति
भ्रामरी
भैरव
विकृत

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

जनस्थान वह नाम है जो रामायण से आता है। दंडकारण्य का वही भाग जहाँ पंचवटी थी, जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के दिनों में रहे, और जहाँ से सीता का हरण हुआ।

पीठनिर्णय इसी क्षेत्र को इक्यावन में गिनता है। यहाँ चिबुक गिरा — ठुड्डी। देवी भ्रामरी कहलाईं, भैरव विकृत, जिन्हें विकृताक्ष भी कहा जाता है।

विद्वान डी. सी. सरकार इसे नासिक क्षेत्र में गोदावरी के तट पर रखते हैं। वे किसी एक मंदिर का नाम नहीं देते — क्षेत्र बताते हैं।

देवी का नाम यहाँ भी भ्रामरी है, वही नाम जो त्रिस्रोता पीठ पर आता है। भ्रमर यानी भौंरा; भ्रामरी वह जो भौंरों से जुड़ी हैं। श्रीशैलम् की भ्रमराम्बा की कथा भी इसी नाम पर टिकी है — अरुणासुर का वध भौंरों से हुआ था।

एक ही नाम तीन जगह आना बताता है कि यह कोई स्थानीय नाम नहीं था। भौंरों वाली शक्ति की कल्पना दूर-दूर तक फैली हुई थी।

  • नाम रामायण के जनस्थान से — दंडकारण्य का वही भाग जहाँ पंचवटी थी।
  • देवी भ्रामरी — वही नाम त्रिस्रोता पीठ पर भी आता है, और श्रीशैलम् की भ्रमराम्बा भी इसी मूल से।
  • सरकार किसी मंदिर का नाम नहीं देते, केवल क्षेत्र — "नासिक क्षेत्र में गोदावरी पर"।
  • S0 के पहले पास में अंग गलत पढ़ा गया था; अनुक्रमणिका ने उसे सुधारा।

कथा

इस भूमि पर दो कथाएँ मिलती हैं — एक रामायण की, और एक इस सूची की।

सती का चिबुक

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि जनस्थान में चिबुक गिरा — ठुड्डी। देवी भ्रामरी हुईं, भैरव विकृत।

रामायण की भूमि

जनस्थान कोई नया नाम नहीं है। रामायण में यह दंडकारण्य का वही भाग है जहाँ पंचवटी थी — जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के दिनों में रहे, और जहाँ से सीता का हरण हुआ।

विद्वान इस क्षेत्र को नासिक के आसपास, गोदावरी के तट पर रखते हैं।

तो इस एक भूमि पर दो अलग परंपराएँ आ मिलती हैं — एक जो राम की यात्रा से जुड़ी है, और एक जो सती के बिखराव से। दोनों में एक स्त्री का खो जाना है।

भ्रामरी — एक नाम, तीन जगह

देवी का नाम यहाँ भ्रामरी है। यही नाम त्रिस्रोता पीठ पर भी आता है। और श्रीशैलम् की भ्रमराम्बा भी इसी मूल से बनी हैं — भ्रमर यानी भौंरा।

भ्रमराम्बा की कथा यही है कि देवी ने अपने शरीर से भौंरों के झुंड छोड़कर अरुणासुर का वध किया, क्योंकि उसे वर था कि दो या चार पैर वाला कोई प्राणी उसे न मार सके — और भौंरे के छह पैर होते हैं।

एक ही नाम तीन अलग जगहों पर आना बताता है कि यह कोई स्थानीय कल्पना नहीं थी। भौंरों वाली शक्ति की यह छवि दूर-दूर तक फैली हुई थी।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); जनस्थान का उल्लेख रामायण में

आज यह स्थान कहाँ है

नासिक क्षेत्र, गोदावरी के तट पर, महाराष्ट्र, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "on the Godavari in the Nasik region"

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जनस्थान शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न