दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — तिरुमंगै आळ्वार व पोइगै आळ्वार
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरु पार्थन्पळ्ळि शिरकाळि से लगभग दस किलोमीटर दूर **तिरुनांगूर** के ग्यारह दिव्य देशम में से एक है। यहाँ विष्णु **तामरैयाळ् केळ्वन्** रूप में विराजते हैं — खड़ी मुद्रा में — और देवी **तामरैनायकी** उनके साथ हैं।
"तामरैयाळ् केळ्वन्" का अर्थ है *कमल पर विराजने वाली के स्वामी*, यानी लक्ष्मीपति।
**नाम "पार्थन्" से आया है — अर्जुन का ही एक नाम।** परंपरा कहती है कि अर्जुन को यहीं नारायण के दर्शन हुए, और इसी से देवता **पार्थसारथी** भी कहलाए।
कथा के अनुसार वनवास के दिनों में अर्जुन जल की खोज में भटकते हुए यहाँ पहुँचे थे।
⚠️ **एक भ्रम टाल लेना चाहिए।** चेन्नै का प्रसिद्ध **तिरुवल्लिक्केणि पार्थसारथी मंदिर** यह नहीं है — वह अपना अलग दिव्य देशम है। दोनों का नाम एक है, स्थान अलग।
तिरुमंगै आळ्वार और पोइगै आळ्वार ने इसका मंगलाशासनम् किया।
- तिरुनांगूर के ग्यारह दिव्य देशम में से एक।
- नाम "पार्थन्" यानी अर्जुन से — परंपरा के अनुसार उन्हें यहीं दर्शन हुए।
- विष्णु यहाँ तामरैयाळ् केळ्वन् — कमलवासिनी के स्वामी; खड़ी मुद्रा में।
- देवता पार्थसारथी भी कहलाते हैं — पर यह चेन्नै का तिरुवल्लिक्केणि मंदिर नहीं है।
- तिरुमंगै आळ्वार व पोइगै आळ्वार ने मंगलाशासनम् किया।
पौराणिक कथा
तिरुनांगूर के ग्यारह की साझा कथा तिरु अरिमेय विण्णगरम् के पृष्ठ पर है। यहाँ केवल अर्जुन का प्रसंग है।
जल की खोज में
परंपरा कहती है कि वनवास के दिनों में अर्जुन प्यास से व्याकुल होकर जल की खोज में भटक रहे थे, और भटकते हुए यहाँ पहुँचे।
यहीं उन्हें नारायण के दर्शन हुए।
इसी से स्थान का नाम **पार्थन्पळ्ळि** पड़ा — "पार्थन्" अर्जुन का नाम है — और देवता पार्थसारथी कहलाए।
खोज कुछ और की, मिला कुछ और
कथा में अर्जुन जल खोज रहे थे, कोई दर्शन नहीं माँग रहे थे।
यह भाव तिरुनांगूर की कई कथाओं से मेल खाता है, और भक्ति-परंपरा में यह बार-बार लौटता है — जो मिलता है वह प्रायः वह नहीं होता जो खोजा जा रहा था।
महाभारत में अर्जुन को कृष्ण से जो सबसे बड़ी बात मिली, वह भी उन्होंने माँगी नहीं थी। वे युद्ध के मैदान पर रथ रोकने को कहकर खड़े हुए थे, और उन्हें गीता मिल गई।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्रोतों से, 2026-08-05. ग्यारहों की साझा कथा हेतु देखें तिरु अरिमेय विण्णगरम्।
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। तिरुनांगूर के ग्यारह मंदिर पास-पास हैं और प्रायः एक ही दिन में किए जाते हैं।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।
रेल मार्ग
शिरकाळि रेलवे स्टेशन — लगभग 10 किमी
शिरकाळि से लगभग 10 किमी।
सड़क मार्ग
तिरुनांगूर
ग्यारह मंदिर आसपास ही हैं और एक दिन में किए जा सकते हैं।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। तै मास की गरुड सेवै में तिरुनांगूर के ग्यारहों की उत्सव-मूर्तियाँ एकत्र होती हैं।
प्रमुख त्योहार
- गरुड सेवै (तै मास)
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरु अरिमेय विण्णगरम् — शिरकाळि के निकट, तमिलनाडु
- तिरु मणिमाड कोविल — शिरकाळि के निकट, तमिलनाडु
- तिरुनांगूर के अन्य दस दिव्य देशम — ग्यारहों पास-पास हैं।
