तिरुक्कुरुंगुडि

Nindra Nambi Perumal Temple, Thirukkurungudi

वह दिव्य देशम जहाँ एक नहीं, पाँच नंबि हैं — और जहाँ दो अन्य दिव्य देशम स्वयं सन्निधि बनकर बैठे हैं।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
निंद्र नंबि — तथा इरुंद, किडंद, तिरुप्पारकडल व तिरुमलै नंबि
थायार
कुरुंगुडि वल्लि थायार

मंगलाशासनम्: पासुरम् — नम्माळ्वार तथा अन्य आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुक्कुरुंगुडि तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले में है — तिरुनेलवेली से लगभग पैंतालीस किलोमीटर, नांगुनेरि (वानमामलै) से पंद्रह और वळ्ळियूर से दस। यहाँ विष्णु निंद्र नंबि रूप में विराजते हैं।

यहाँ की सबसे असाधारण बात संख्या है — यहाँ पाँच नंबि हैं।

- निंद्र नंबि — जो खड़े हैं - इरुंद नंबि — जो बैठे हैं - किडंद नंबि — जो लेटे हैं - तिरुप्पारकडल नंबि - तिरुमलै नंबि

यह इस पूरी सूची में मुद्राओं की सबसे बड़ी संख्या है।

हमने यह विषय बार-बार देखा — तिरु नागै में तीन मुद्राएँ एक परिसर में, तिरुक्कूडल में तलों में बँटी हुई, तिरुनीर्मलै में चार (चलती हुई सहित)।

यहाँ पाँच हैं।

पर अंतिम दो मुद्राएँ नहीं हैं — वे स्थान हैं।

तिरुप्पारकडल क्षीरसागर है, और तिरुमलै तिरुपति। दोनों स्वयं दिव्य देशम हैं।

यानी यहाँ दो अन्य दिव्य देशम सन्निधि बनकर बैठे हैं — और उनमें से एक, तिरुप्पारकडल, तो पार्थिव भी नहीं है। वह 108 का वह स्थान है जहाँ कोई यात्रा नहीं कर सकता।

यहाँ उसकी सन्निधि है।

मंदिर के दो और नाम हैं — वामन क्षेत्रम् और दक्षिण बद्री।

"दक्षिण बद्री" इसे उत्तराखंड के बद्रीनाथ से जोड़ता है — वही बद्रीनाथ जो चार धाम, छोटा चार धाम, पंच बद्री और दिव्य देशम, चारों में है।

कथा शिव की है — और वह इस काम में चौथी बार आ रही है।

परंपरा कहती है कि जब शिव को ब्रह्मा का शीश काटने से ब्रह्महत्या-दोष लगा, तो वे यहाँ आए। निंद्र नंबि ने उन्हें सलाह दी कि वे कुरुंगुडि वल्लि थायार से भिक्षा माँगें — और उसी से उन्हें मुक्ति मिली।

  • यहाँ पाँच नंबि हैं — 108 में मुद्राओं/रूपों की सबसे बड़ी संख्या।
  • निंद्र (खड़े), इरुंद (बैठे), किडंद (लेटे), तिरुप्पारकडल व तिरुमलै नंबि।
  • अंतिम दो मुद्राएँ नहीं, स्थान हैं — दो अन्य दिव्य देशम यहाँ सन्निधि हैं।
  • तिरुप्पारकडल स्वयं पार्थिव नहीं है, पर यहाँ उसकी सन्निधि है।
  • मंदिर के दो और नाम — वामन क्षेत्रम् व दक्षिण बद्री।
  • शिव को ब्रह्महत्या-दोष से मुक्ति — कुरुंगुडि वल्लि थायार से भिक्षा माँगकर।

पौराणिक कथा

यहाँ दो बातें हैं — पाँच नंबि, और शिव की एक भिक्षा।

पाँच नंबि

इस मंदिर में पाँच नंबि हैं, और यह इस पूरी सूची में सबसे बड़ी संख्या है।

तीन तो मुद्राएँ हैं — निंद्र (खड़े), इरुंद (बैठे), किडंद (लेटे)।

यह क्रम अब परिचित है। तिरु नागै में तीनों एक परिसर में थीं। तिरुक्कूडल में वे तलों में बँटी थीं। तिरुनीर्मलै में चार थीं — क्योंकि वहाँ एक चलती हुई मुद्रा भी है।

पर यहाँ अंतिम दो नंबि मुद्राएँ नहीं हैं।

तिरुप्पारकडल नंबि और तिरुमलै नंबि — ये दोनों नाम स्थानों के हैं।

तिरुमलै यानी तिरुपति। और तिरुप्पारकडल यानी क्षीरसागर — वह दिव्य देशम जो 108 में गिना तो जाता है, पर पार्थिव नहीं है। वहाँ न कोई जा सकता है, न दर्शन-समय होते हैं।

यहाँ उसकी सन्निधि है।

यानी यह मंदिर केवल भगवान के रूप नहीं रखता — वह अन्य तीर्थों को भी अपने भीतर बिठा लेता है, और उनमें वह भी जिस तक पहुँचा नहीं जा सकता।

यह भाव इस सूची में पहले भी दिखा है। तिरुवल्लिक्केणि में पाँच रूप एक परिसर में हैं; तिरु नागै में तीनों मुद्राएँ। जहाँ भक्त सब जगह नहीं जा सकता, वहाँ मंदिर स्वयं कई तीर्थ अपने भीतर समेट लेता है।

यहाँ उसने वह तीर्थ भी समेट लिया जो पृथ्वी पर है ही नहीं।

शिव की भिक्षा

परंपरा कहती है कि जब शिव को ब्रह्मा का शीश काटने से ब्रह्महत्या-दोष लगा, तो वे भटकते हुए यहाँ पहुँचे।

निंद्र नंबि ने उन्हें सलाह दी — कि वे कुरुंगुडि वल्लि थायार से भिक्षा माँगें।

और उसी से उन्हें मुक्ति मिली।

यह ब्रह्महत्या-दोष की चौथी कथा है जो इस काम में आई है, और हर बार रूप अलग रहा।

तिरु सेंपोन् सेइ कोविल में दोष राम पर था, रावण-वध के बाद — और प्रायश्चित्त एक स्वर्ण-गौ के दान से हुआ।

तिरुक्कंडियूर में दोष शिव पर था, और मुक्ति कपाल तीर्थ में स्नान से मिली।

और यहाँ भी दोष शिव पर है — पर मुक्ति स्नान से नहीं, भिक्षा से मिलती है। और भिक्षा देवी से माँगनी पड़ती है, भगवान से नहीं।

यह अंतर छोटा नहीं है। जिसने काटा था, उसे यहाँ माँगना पड़ा — और माँगना उससे पड़ा जो अन्न देती है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

⚠️ यहाँ पाँच नंबि की सन्निधियाँ हैं और सबके दर्शन करने में समय लगता है — दिन जल्दी शुरू करना उचित है। सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तूतुक्कुडि / तिरुवनंतपुरम् हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: तिरुनेलवेली रेलवे स्टेशन · 45 किमी

हवाई मार्ग

तूतुक्कुडि / तिरुवनंतपुरम् हवाई अड्डा

तिरुनेलवेली क्षेत्र से जुड़ा हुआ।

रेल मार्ग

तिरुनेलवेली रेलवे स्टेशन — लगभग 45 किमी

वहाँ से लगभग 45 किमी।

सड़क मार्ग

वळ्ळियूर — लगभग 10 किमी

वळ्ळियूर से 10 किमी; नांगुनेरि से 15 किमी।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब मौसम सबसे अनुकूल रहता है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • वानमामलै (नांगुनेरि) (लगभग 15 किमी) — एक और दिव्य देशम।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प तिरुनेलवेली व नांगुनेरि में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री निंद्र नंबि पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुक्कुरुंगुडि, तिरुनेलवेली से लगभग 45 किमी
ज़िलातिरुनेलवेली
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुक्कुरुंगुडि — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न