मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
गरुड़ पुराण के श्लोक में तीसरा नाम **"माया"** है — और वही आज का हरिद्वार है। यह उन दो पुरियों में से एक है जहाँ श्लोक का नाम आधुनिक नाम से भिन्न है; दूसरी अवन्तिका यानी उज्जैन। नगर मायापुरी नाम से भी जाना जाता रहा।
वर्तमान नाम के दो पाठ हैं। **हरि-द्वार** यानी विष्णु का द्वार, और **हर-द्वार** यानी शिव का द्वार। दोनों प्रचलित हैं, और यह द्वैत अपने आप में इस नगर की स्थिति बताता है — यह वैष्णव और शैव दोनों के लिए प्रवेश-द्वार है। प्राचीन नाम **गंगाद्वार** इस बात की ओर संकेत करता है कि गंगा यहीं मैदान में प्रवेश करती है।
यही इस नगर का मूल तथ्य है। गंगोत्री से लगभग **253 किलोमीटर** बहकर आने के बाद, गंगा हरिद्वार में पहली बार गंगा के मैदान में उतरती है। पहाड़ यहाँ समाप्त होते हैं।
**हर की पौड़ी** नगर का प्रमुख घाट है, जिसका निर्माण परंपरा के अनुसार पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य ने कराया। उसी घाट पर **ब्रह्मकुंड** है — वह स्थान जहाँ समुद्र-मंथन के समय अमृत की बूँदें गिरी मानी जाती हैं। यही कारण है कि यहाँ हर बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है।
संध्या की गंगा आरती के बाद श्रद्धालु दीप प्रवाहित करते हैं — यह दृश्य नगर की सबसे जानी-पहचानी छवि है।
- सप्त पुरी की तीसरी पुरी; श्लोक में नाम "माया" है, जो आधुनिक नाम से भिन्न है।
- वह स्थान जहाँ गंगा पहाड़ छोड़कर पहली बार मैदान में उतरती है — गंगोत्री से लगभग 253 किमी बाद।
- नाम के दो पाठ — हरि-द्वार (विष्णु का द्वार) और हर-द्वार (शिव का द्वार); दोनों प्रचलित।
- ब्रह्मकुंड — वह स्थान जहाँ समुद्र-मंथन के अमृत की बूँदें गिरी मानी जाती हैं।
- हर बारह वर्ष में कुंभ मेला; चार कुंभ स्थलों में एक।
- पंच तीर्थ — गंगाद्वार (हर की पौड़ी), कुशावर्त, बिल्व तीर्थ (मनसा देवी) व नील पर्वत (चंडी देवी)।
पौराणिक कथा
हरिद्वार की सबसे बड़ी कथा समुद्र-मंथन से जुड़ी है, और उसी से यहाँ का कुंभ आता है।
अमृत की बूँदें
समुद्र-मंथन से जब अमृत निकला, तो उसे लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ। कथा कहती है कि उस खींचतान में अमृत-कलश से कुछ बूँदें छलक पड़ीं और चार स्थानों पर गिरीं — हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक।
इन्हीं चार स्थानों पर कुंभ मेला लगता है, और हरिद्वार में ब्रह्मकुंड वही स्थान माना जाता है जहाँ बूँद गिरी।
ध्यान देने योग्य है कि यह छलकन दुर्घटना थी — किसी ने जानबूझकर नहीं गिराई। जो सबसे मूल्यवान था, वह संघर्ष में छलका, और छलकने से ही चार तीर्थ बन गए।
द्वार होने का अर्थ
यह नगर द्वार कहलाता है, और भूगोल इसे सचमुच द्वार बनाता है। एक ओर पहाड़ हैं, दूसरी ओर मैदान। गंगा यहीं से उतरती है, और बद्रीनाथ-केदारनाथ जाने वाला यात्री भी यहीं से ऊपर चढ़ता है।
द्वार अपने आप में गंतव्य नहीं होता — वह कहीं और जाने का रास्ता होता है। पर परंपरा ने इस द्वार को स्वयं तीर्थ मान लिया, और सप्त पुरी में गिन लिया।
शायद इसीलिए कि कुछ स्थान इसलिए महत्वपूर्ण होते हैं कि वहाँ से कुछ शुरू होता है।
स्रोत: समुद्र-मंथन की प्रचलित परंपरा; तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Haridwar से
इतिहास
हरिद्वार का सबसे पुराना दर्ज निर्माण उसका मुख्य घाट ही है।
हर की पौड़ी
परंपरा के अनुसार हर की पौड़ी का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की स्मृति में कराया।
घाट पर आज भी एक पद-चिह्न दिखाया जाता है, जिसे परंपरा विष्णु का मानती है — और नाम "हरि की पौड़ी" यानी हरि की सीढ़ी वहीं से आया।
चंडी देवी मंदिर
नील पर्वत पर स्थित चंडी देवी मंदिर का वर्तमान ढाँचा सन् 1929 में कश्मीर के सुचत सिंह ने बनवाया।
बिल्व पर्वत पर मनसा देवी का मंदिर है, जहाँ देवी की दो प्रतिमाएँ हैं — एक तीन मुख व पाँच भुजाओं वाली, दूसरी आठ भुजाओं वाली।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Haridwar — 2026-08-04 को देखा गया
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून
हरिद्वार से लगभग एक घंटे की दूरी पर।
रेल मार्ग
हरिद्वार जंक्शन
देश के लगभग हर बड़े नगर से सीधी गाड़ियाँ आती हैं; दिल्ली से कई विकल्प हैं।
सड़क मार्ग
हरिद्वार
दिल्ली, देहरादून व ऋषिकेश से नियमित बस सेवा। चार धाम यात्रा का एक प्रमुख प्रवेश-बिंदु।
अंतिम चरण: हर की पौड़ी तक पैदल अथवा ई-रिक्शा से पहुँचा जाता है; घाट के पास वाहन नहीं जाते। मनसा देवी व चंडी देवी के लिए रोपवे उपलब्ध है।
सुगमता: नगर समतल है और घूमने में सुगम। मनसा देवी और चंडी देवी दोनों पहाड़ी पर हैं, पर वहाँ रोपवे की सुविधा है — इसलिए वृद्ध यात्री भी दर्शन कर सकते हैं। घाटों पर सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब मौसम अनुकूल रहता है। कुंभ व अर्धकुंभ के वर्षों में नगर की पूरी व्यवस्था बदल जाती है और भीड़ बहुत बढ़ जाती है। गंगा का जल वर्षा-काल में तेज़ बहता है — तब स्नान करते समय विशेष सावधानी आवश्यक है।
प्रमुख त्योहार
- कुंभ मेला (हर 12 वर्ष)
- कांवड़ मेला
- गंगा दशहरा
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- हर की पौड़ी (ब्रह्मकुंड) — नगर का प्रमुख घाट; संध्या की गंगा आरती यहीं होती है। ब्रह्मकुंड वह स्थान माना जाता है जहाँ अमृत की बूँद गिरी।
- मनसा देवी मंदिर — बिल्व पर्वत पर; रोपवे से पहुँचा जा सकता है। यहाँ देवी की दो प्रतिमाएँ हैं।
- चंडी देवी मंदिर — नील पर्वत पर; वर्तमान ढाँचा 1929 का। रोपवे उपलब्ध है।
- कुशावर्त घाट — पंच तीर्थ में गिना जाने वाला घाट; पितृ-कर्म के लिए प्रयुक्त।
- ऋषिकेश — कुछ ही दूरी पर; चार धाम यात्रा का मुख्य आरंभ-स्थल।
