दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — पेरियाळ्वार व आंडाळ — दोनों इसी स्थान से
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरुविल्लिपुत्तूर — आज **श्रीविल्लिपुत्तूर** — तमिलनाडु के विरुदुनगर ज़िले में है, मदुरै से लगभग **अस्सी किलोमीटर** दूर। यहाँ विष्णु **वटपत्रशायी** रूप में विराजते हैं।
**पर यह मंदिर भगवान से अधिक एक स्त्री के लिए जाना जाता है।**
**यह आंडाळ की जन्मभूमि है।**
आंडाळ **बारह आळ्वारों में अकेली स्त्री** हैं। परंपरा कहती है कि **पेरियाळ्वार** को वे मंदिर के उद्यान में **तुलसी के पौधे के नीचे** शिशु रूप में मिलीं, और उन्होंने उन्हें अपनी पुत्री की तरह पाला।
आगे चलकर वे श्रीरंगम् के **रंगनाथ** में समा गईं।
**दो परंपराएँ आज भी चलती हैं, और वे इस मंदिर को दो अन्य दिव्य देशम से जोड़ती हैं।**
आंडाळ की **पहनी हुई माला** भेजी जाती है —
- **चित्रा पौर्णमी** पर → **अऴगर कोविल** (तिरुमालिरुंचोलै), मदुरै - **पुरट्टासि** मास में → **तिरुमला** (तिरुपति)
दोनों 108 में हैं। यानी यह जोड़ किसी पुरानी कथा का नहीं — **हर वर्ष सचमुच होता है**, वैसे ही जैसे रंगनाथ श्रीरंगम् से उरैयूर तक चलकर जाते हैं।
मंदिर का **राजगोपुरम् 192 फ़ुट (59 मीटर)** ऊँचा है।
⚠️ **यहाँ एक व्यापक दावे को सुधार लेना चाहिए।** बहुत से स्रोत कहते हैं कि **तमिलनाडु के राज-चिह्न** में यही गोपुरम् है। पर **चिह्न के रचयिता कृष्ण राव ने स्वयं इसका खंडन किया** — उनके अनुसार वह **मीनाक्षी मंदिर का पश्चिमी गोपुरम्** है।
ऊँचाई का आँकड़ा सत्यापित है; राज-चिह्न वाला दावा विवादित है, और हम उसे उसी रूप में दर्ज कर रहे हैं।
मंदिर में **तीन जलाशय** हैं, और यह दो भागों में बँटा है — एक आंडाळ का, एक वटपत्रशायी का।
सबसे बड़ा उत्सव **आडि पूरम्** है (जुलाई–अगस्त), जिसे **आंडाळ का जन्मदिन** माना जाता है।
- आंडाळ की जन्मभूमि — बारह आळ्वारों में अकेली स्त्री।
- पेरियाळ्वार को वे मंदिर के उद्यान में तुलसी के नीचे शिशु रूप में मिलीं।
- आंडाळ की पहनी हुई माला आज भी अऴगर कोविल व तिरुमला भेजी जाती है।
- 192 फ़ुट (59 मीटर) ऊँचा राजगोपुरम्।
- ⚠️ "तमिलनाडु के राज-चिह्न का गोपुरम्" वाला प्रचलित दावा विवादित है।
- आडि पूरम् (जुलाई–अगस्त) — आंडाळ का जन्मदिन, सबसे बड़ा उत्सव।
पौराणिक कथा
यह कथा किसी देवता के प्राकट्य की नहीं है। यह एक बच्ची की है, जो उद्यान में मिली थी।
तुलसी के नीचे
परंपरा कहती है कि **पेरियाळ्वार** को मंदिर के उद्यान में, **तुलसी के पौधे के नीचे**, एक शिशु मिली।
उन्होंने उसे अपनी पुत्री की तरह पाला। वही **आंडाळ** हुईं।
यह प्रसंग इस सूची में तीसरी बार आ रहा है, और तीनों बार वह किसी ऋषि के घर हुआ है। **तिरु विण्णगर** में मार्कंडेय को तुलसी के नीचे भूदेवी मिलीं। **तिरुनारायूर** में मेधावि को वृक्ष के नीचे वंचुलवल्लि मिलीं।
पर आंडाळ का आगे जो हुआ, वह अलग है।
वे केवल किसी की पुत्री या किसी की पत्नी नहीं रहीं। **वे स्वयं कवि बनीं** — और बारह आळ्वारों में **अकेली स्त्री**।
जिन पदों से 108 दिव्य देशम की यह पूरी सूची बनी है, उनमें उनके भी पद हैं। इसी सूची में **तिरुक्कण्णपुरम्** उन थोड़े मंदिरों में है जिनका उन्होंने गान किया।
अंत में वे श्रीरंगम् के **रंगनाथ** में समा गईं — जिन्हें वे बचपन से अपना वर मानती आई थीं।
वह माला जो आज भी जाती है
आंडाळ की सबसे प्रसिद्ध कथा माला की है — कि वे भगवान को चढ़ाने से पहले स्वयं वह माला पहन लेती थीं।
पेरियाळ्वार ने जब यह देखा तो वे व्याकुल हुए। पर परंपरा कहती है कि भगवान ने कहा कि उन्हें वही माला चाहिए जो आंडाळ पहन चुकी हों।
**और यह आज भी चलता है।**
आंडाळ की पहनी हुई माला भेजी जाती है — **चित्रा पौर्णमी** पर मदुरै के **अऴगर कोविल**, और **पुरट्टासि** मास में **तिरुमला**।
दोनों 108 दिव्य देशम में हैं।
यानी यह मंदिर हर वर्ष दो अन्य दिव्य देशम से जुड़ता है — और वह जोड़ किसी कथा का नहीं, एक भेजी जाने वाली वस्तु का है।
इस सूची में ऐसा दूसरा उदाहरण **उरैयूर** है, जहाँ रंगनाथ स्वयं श्रीरंगम् से चलकर आते हैं।
दोनों जगह परंपरा कागज़ पर नहीं है। वह हर साल चलती है।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Srivilliputhur_Andal_Temple से, 2026-08-05.
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। ⚠️ आडि पूरम् (जुलाई–अगस्त) पर भीड़ बहुत अधिक होती है, क्योंकि वह आंडाळ का जन्मदिन माना जाता है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
मदुरै हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।
रेल मार्ग
श्रीविल्लिपुत्तूर रेलवे स्टेशन
मदुरै–तेनकासी मार्ग पर।
सड़क मार्ग
श्रीविल्लिपुत्तूर — लगभग 80 किमी
मदुरै से लगभग 80 किमी; नियमित बस उपलब्ध।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी मौसम की दृष्टि से अनुकूल है। पर आडि पूरम् (जुलाई–अगस्त) आंडाळ का जन्मदिन है और यहाँ का सबसे बड़ा अवसर — तब भीड़ भी सबसे अधिक रहती है।
प्रमुख त्योहार
- आडि पूरम् (जुलाई–अगस्त) — आंडाळ का जन्मदिन
- तिरुवाडिपूरम्
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरुमालिरुंचोलै — मदुरै के निकट, अऴगर पहाड़ियों में, तमिलनाडु
- तिरुक्कण्णपुरम् — नागपट्टिनम् के बाहरी क्षेत्र में, तमिलनाडु
- मदुरै (लगभग 80 किमी) — मीनाक्षी मंदिर व अऴगर कोविल।
