दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: 7 पासुरम् — तिरुमंगै आळ्वार (4), भूतत्ताळ्वार (2), पेयाळ्वार (1)
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरुक्कच्चि कांचीपुरम् के 15 दिव्य देशम में सबसे बड़ा है और नगर के पूर्वी भाग — छिन्न कांचीपुरम् — में स्थित है। यहाँ विष्णु **वरदराज पेरुमाल** रूप में और देवी **पेरुंदेवी थायार** रूप में विराजते हैं।
परिसर **9.5 हेक्टेयर (23.5 एकड़)** में फैला है, जिसमें **32 सन्निधियाँ, 19 विमान और 389 स्तंभ-मंडप** हैं। सौ-स्तंभों वाला मंडप — जिसमें वास्तव में **96 तराशे हुए स्तंभ** हैं — विजयनगर स्थापत्य की उत्कृष्ट कृति माना जाता है; उन पर रामायण और महाभारत के प्रसंग उकेरे हैं।
**पर इस मंदिर की सबसे असामान्य बात एक ऐसी प्रतिमा है जो प्रायः दिखती ही नहीं।**
**अत्ति वरदर** — अंजीर (अत्ति) की लकड़ी से बनी वह प्रतिमा — मंदिर के अनंत तीर्थम् सरोवर में जलमग्न रहती है। उसे **हर चालीस वर्ष में एक बार, 48 दिनों के लिए** बाहर निकालकर दर्शन हेतु रखा जाता है।
वह सन् 1709 में संयोगवश फिर से मिली थी, और उसके बाद 1854, 1892, 1939 और 1979 में दर्शन हेतु निकाली गई। **अगला अवसर सन् 2059 में है।**
यानी अधिकांश लोगों के जीवन में यह अवसर एक या दो बार ही आता है — और कुछ के जीवन में एक बार भी नहीं। यह जानकर यहाँ जाना चाहिए, वरना कोई यह मानकर पहुँच सकता है कि वह प्रतिमा प्रतिदिन दर्शनीय है।
- कांचीपुरम् के 15 दिव्य देशम में सबसे बड़ा; परिसर 9.5 हेक्टेयर (23.5 एकड़)।
- अत्ति वरदर — अंजीर की लकड़ी की प्रतिमा, जो सरोवर में जलमग्न रहती है।
- वह हर 40 वर्ष में एक बार, 48 दिनों के लिए दर्शन हेतु निकाली जाती है — **अगली बार 2059 में**।
- 32 सन्निधियाँ, 19 विमान, 389 स्तंभ-मंडप।
- सौ-स्तंभों वाला मंडप — वास्तव में 96 तराशे हुए स्तंभ; विजयनगर स्थापत्य की उत्कृष्ट कृति।
- तीन आळ्वारों ने सात पासुरम् गाए — तिरुमंगै (4), भूतत्ताळ्वार (2), पेयाळ्वार (1)।
पौराणिक कथा
अत्ति वरदर की कथा उस प्रतिमा की है जो सदियों तक जल में रही — और जिसे किसी ने खोजा नहीं, संयोग से पाया।
जल में रखी हुई
परंपरा कहती है कि आक्रमणों के समय मूल प्रतिमा को बचाने के लिए उसे मंदिर के सरोवर में डाल दिया गया था। वह लकड़ी की थी — अंजीर की — और जल उसे नष्ट नहीं करता।
समय बीता और वह वहीं रह गई। सन् **1709** में वह संयोगवश फिर से मिली।
उसके बाद परंपरा बनी कि उसे हर चालीस वर्ष में एक बार, अड़तालीस दिनों के लिए बाहर निकालकर दर्शन हेतु रखा जाए — और फिर वापस जल में।
चालीस वर्ष का अर्थ
चालीस वर्ष एक असामान्य अंतराल है। वह न इतना छोटा है कि रोज़ का हो जाए, न इतना बड़ा कि परंपरा टूट जाए।
जो व्यक्ति एक बार यह दर्शन करता है, वह दूसरी बार वृद्ध होकर ही कर पाएगा — और बहुत से नहीं कर पाएँगे।
परंपरा ने शायद यही चाहा भी। जो चीज़ हर दिन उपलब्ध हो, उसे हम देखना बंद कर देते हैं। यह प्रतिमा इसीलिए याद रहती है कि वह प्रायः नहीं दिखती — और जब दिखती है तब लाखों लोग आते हैं।
स्रोत: स्थल-परंपरा; तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Varadharaja_Perumal_Temple,_Kanchipuram से
इतिहास
यह मंदिर चोल काल से विजयनगर काल तक लगातार बनता रहा।
चोल व विजयनगर
सन् **1053** में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। आगे कुलोत्तुंग चोल प्रथम और विक्रम चोल के शासन-काल में इसका विस्तार हुआ, और चौदहवीं शताब्दी में और निर्माण हुआ।
96 स्तंभों वाला मंडप विजयनगर काल की देन है।
1688 से 1710
सन् **1688** में देवताओं को यहाँ से हटाया गया और **1710** में वापस लाया गया — यानी बाईस वर्ष तक वे यहाँ नहीं थे।
यह अवधि अत्ति वरदर के 1709 में मिलने के ठीक आसपास की है, और दोनों घटनाएँ उसी उथल-पुथल के काल की हैं।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Varadharaja_Perumal_Temple,_Kanchipuram — 2026-08-05 को देखा गया
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं, बीच में विराम रहता है। परिसर बड़ा है, इसलिए दर्शन के लिए समय लेकर जाएँ। ⚠️ **अत्ति वरदर के दर्शन प्रतिदिन नहीं होते** — वह प्रतिमा सरोवर में जलमग्न रहती है और हर चालीस वर्ष में एक बार 48 दिनों के लिए निकाली जाती है। अगला अवसर 2059 में है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
चेन्नै से कांचीपुरम् लगभग 72 किमी; सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।
रेल मार्ग
कांचीपुरम् रेलवे स्टेशन
चेन्नै से नियमित गाड़ियाँ; चेंगलपट्टू जंक्शन भी विकल्प है।
सड़क मार्ग
कांचीपुरम्
मंदिर नगर के पूर्वी भाग (छिन्न कांचीपुरम्) में है।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; परिसर के भीतर काफ़ी पैदल चलना पड़ता है।
सुगमता: मंदिर तक पहुँच सुगम है, पर परिसर 23 एकड़ से अधिक का है और भीतर काफ़ी चलना होता है।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब तमिलनाडु में मौसम सबसे अनुकूल रहता है। मार्च से जून तक यहाँ अत्यधिक गर्मी पड़ती है।
प्रमुख त्योहार
- अत्ति वरदर दर्शन (हर 40 वर्ष)
- ब्रह्मोत्सवम्
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- कांचीपुरम् — कांचीपुरम्, तमिलनाडु
- तिरु वेक्का — कांचीपुरम्, तमिलनाडु
- अनंत तीर्थम् — मंदिर का सरोवर, जिसमें अत्ति वरदर की प्रतिमा जलमग्न रहती है।
- कामाक्षी अम्मन मंदिर — नगर का प्रमुख शाक्त मंदिर; काञ्ची शक्ति पीठ से जुड़ा।
- एकाम्बरेश्वर मंदिर — नगर का प्रमुख शिव मंदिर।
