दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — तिरुमंगै आळ्वार (पेरिय तिरुमोऴि)
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरु सिरुपुलियूर कोळ्ळुमंगुडि के पास है — मयिलाडुतुरै से लगभग **17 किलोमीटर** और कारैक्काल से **10 किलोमीटर**। यहाँ विष्णु **स्थल शयन पेरुमाल** रूप में विराजते हैं और देवी **तिरुमामगळ् नाच्चियार** उनके साथ हैं। मंदिर को **अरुळ्माकडल् पेरुमाल मंदिर** भी कहा जाता है।
**मूर्ति यहाँ की सबसे विशिष्ट बात है।**
भगवान **शयन कोलम्** में हैं — लेटे हुए, **दक्षिण** की ओर मुख किए। और यह शयन-मूर्ति छोटी है — इसे **बाल शयनम्** कहा जाता है, यानी *शिशु की शय्या*।
स्रोत कहते हैं कि दक्षिणाभिमुख शयन-मुद्रा वाले दिव्य देशम **केवल दो** हैं, और यह उनमें से एक है।
**नाम की व्युत्पत्ति भी उतनी ही सटीक है।** तमिल में **"सिरु" यानी छोटा**, **"पुलि" यानी व्याघ्र**, और **"ऊर" यानी स्थान**।
दोनों अर्थ एक साथ सच हैं। मूर्ति छोटी है — और परंपरा कहती है कि यहाँ ऋषि **व्याघ्रपाद** ने, **पतंजलि** के साथ, मोक्ष की कामना से तप किया था। "व्याघ्रपाद" का अर्थ ही है *बाघ के पैरों वाला*।
⚠️ **एक भ्रम टाल लें:** महाबलिपुरम् के **तिरु कडल्मलै** के भगवान भी **स्थल शयन पेरुमाल** कहलाते हैं। दोनों अलग दिव्य देशम हैं — और भेद केवल स्थान का नहीं। वहाँ भगवान **शेषनाग के बिना, सीधे भूमि पर** लेटे हैं, और वही उस नाम का शाब्दिक अर्थ है। यहाँ विशेषता मूर्ति का **छोटा आकार** और **दक्षिणाभिमुख** होना है।
गर्भगृह के ऊपर **नंद वर्धन विमान** है, मंदिर में **चार तल का राजगोपुरम्**, और पास ही **आदिशेष** की अलग सन्निधि।
तिरुमंगै आळ्वार ने **पेरिय तिरुमोऴि** में इसका मंगलाशासनम् किया।
- बाल शयनम् — भगवान शिशु के आकार की छोटी शयन-मूर्ति में।
- दक्षिणाभिमुख शयन-मुद्रा; स्रोतों के अनुसार ऐसे दिव्य देशम केवल दो हैं।
- नाम की व्युत्पत्ति — सिरु (छोटा) + पुलि (व्याघ्र) + ऊर (स्थान); दोनों अर्थ सच।
- परंपरा: व्याघ्रपाद व पतंजलि ने यहाँ मोक्ष हेतु तप किया।
- नंद वर्धन विमान; चार तल का राजगोपुरम्; आदिशेष की अलग सन्निधि।
पौराणिक कथा
यहाँ का नाम दो अर्थ एक साथ रखता है, और दोनों सच हैं।
छोटा व्याघ्र, छोटा भगवान
तमिल में **"सिरु" यानी छोटा**, **"पुलि" यानी व्याघ्र**, **"ऊर" यानी स्थान**।
परंपरा कहती है कि यहाँ ऋषि **व्याघ्रपाद** ने, **पतंजलि** के साथ, मोक्ष की कामना से तप किया। "व्याघ्रपाद" का अर्थ ही है *बाघ के पैरों वाला* — और उनकी कथा शैव परंपरा में भी बहुत प्रचलित है, विशेषकर चिदंबरम् से जुड़ी हुई।
पर नाम का दूसरा अर्थ मूर्ति में है।
भगवान यहाँ **छोटे** हैं — शिशु के आकार की शयन-मूर्ति, जिसे **बाल शयनम्** कहा जाता है।
यानी नाम एक साथ ऋषि की भी बात कह रहा है और भगवान की भी।
दक्षिण की ओर मुख
भगवान यहाँ **दक्षिण** की ओर मुख किए लेटे हैं।
दक्षिण दिशा भारतीय परंपरा में सहज नहीं मानी जाती — वह यम की दिशा है, और मंदिरों में मूर्तियाँ प्रायः पूर्व या पश्चिम की ओर मुख किए होती हैं।
स्रोत कहते हैं कि दक्षिणाभिमुख शयन-मुद्रा वाले दिव्य देशम **केवल दो** हैं, और यह उनमें से एक है।
जिस दिशा को लोग टालते हैं, उसी ओर मुख किए भगवान लेटे हैं — और वह भी शिशु के रूप में।
दो बातें जो अलग-अलग असहज लगतीं, यहाँ एक साथ रख दी गई हैं।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Sthalasayana_Perumal_Temple,_Tirusirupuliyur से, 2026-08-05.
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर मयिलाडुतुरै व कारैक्काल दोनों से पहुँच में है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।
रेल मार्ग
मयिलाडुतुरै रेलवे स्टेशन — लगभग 17 किमी
वहाँ से लगभग 17 किमी।
सड़क मार्ग
कोळ्ळुमंगुडि
कारैक्काल से लगभग 10 किमी; स्थानीय बस उपलब्ध।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। वैकासि (मई–जून) में ब्रह्मोत्सवम् होता है।
प्रमुख त्योहार
- ब्रह्मोत्सवम् (वैकासि, मई–जून)
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरु इंदळूर — मयिलाडुतुरै, तमिलनाडु
- तिरुक्कुडंतै — कुंभकोणम्, तमिलनाडु
- कारैक्काल (लगभग 10 किमी)
- मयिलाडुतुरै के दिव्य देशम (लगभग 17 किमी)
