तिरुत्तंगाल्

Ninra Narayana Perumal Temple, Thiruthangal

वह दिव्य देशम जो एक रात के ठहराव पर बना — जब रंगनाथ आंडाळ से विवाह माँगने जाते हुए यहीं रुक गए।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
निंद्र नारायण पेरुमाल
थायार
अरुणकमल महादेवी

मंगलाशासनम्: पासुरम् — नम्माळ्वार तथा अन्य आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुत्तंगाल् तमिलनाडु के विरुदुनगर ज़िले में है — शिवकाशी से लगभग चार किलोमीटर, और विरुदुनगर तथा श्रीविल्लिपुत्तूर दोनों से लगभग बीस-बीस। यहाँ विष्णु निंद्र नारायण रूप में विराजते हैं और देवी अरुणकमल महादेवी।

मंदिर एक सौ फ़ुट ऊँची ग्रेनाइट पहाड़ी पर बना है, जिसे तलगिरि कहा जाता है, और चारों ओर ग्रेनाइट की प्राकार-भित्ति है।

नाम एक रात के ठहराव पर पड़ा है।

तमिल में "तंगल्" यानी ठहरना।

परंपरा कहती है कि श्रीरंगम् के रंगनाथ, आंडाळ की भक्ति से मुग्ध होकर, उनका हाथ माँगने श्रीविल्लिपुत्तूर की ओर चले।

मार्ग में अँधेरा हो गया, और उन्होंने यहीं रात बिताने का निश्चय किया।

वे यहाँ ठहरे — और स्थान का नाम तिरुत्तंगाल् पड़ गया, तथा पहाड़ी तलगिरि।

यह जोड़ ध्यान देने योग्य है। यह मंदिर एक ही कथा-सूत्र में दो अन्य दिव्य देशम से बँध जाता है — श्रीरंगम्, जहाँ से वे चले, और श्रीविल्लिपुत्तूर, जहाँ आंडाळ थीं।

और यह स्थान उन दोनों के बीच का है — न आरंभ, न गंतव्य। केवल वह जगह जहाँ रात हो गई।

⚠️ एक भेद स्पष्ट कर देना चाहिए। आंडाळ की सबसे प्रचलित कथा में वे स्वयं श्रीरंगम् जाती हैं और रंगनाथ में समा जाती हैं। यह मंदिर उलटी दिशा की यात्रा दर्ज करता है — रंगनाथ का श्रीविल्लिपुत्तूर आना। दोनों परंपराएँ चलती हैं, और हमने वही लिखा है जो इस स्थल की परंपरा कहती है।

पुरातत्त्व भी यहाँ है। मंदिर की दो चट्टान-कटी गुफ़ाओं में तीन शिलालेख हैं, जिनमें दो आठवीं शताब्दी के हैं। वर्तमान स्वरूप का निर्माण पांड्य राजा देवेंद्र वल्लभ द्वारा माना जाता है।

  • नाम एक रात के ठहराव पर — तमिल "तंगल्" यानी ठहरना।
  • परंपरा: रंगनाथ श्रीरंगम् से श्रीविल्लिपुत्तूर जाते हुए यहीं रुके थे।
  • एक ही कथा-सूत्र में श्रीरंगम् व श्रीविल्लिपुत्तूर — दोनों से जुड़ा।
  • 100 फ़ुट ऊँची ग्रेनाइट पहाड़ी (तलगिरि) पर स्थित।
  • दो चट्टान-कटी गुफ़ाओं में तीन शिलालेख; दो आठवीं शताब्दी के।
  • वर्तमान स्वरूप का निर्माण पांड्य राजा देवेंद्र वल्लभ द्वारा।

पौराणिक कथा

यह कथा किसी युद्ध या वरदान की नहीं। यह इस बात की है कि किसी को रास्ते में रात हो गई।

जहाँ रात हो गई

परंपरा कहती है कि श्रीरंगम् के रंगनाथ आंडाळ की भक्ति से मुग्ध हो गए, और उनका हाथ माँगने श्रीविल्लिपुत्तूर की ओर चल पड़े।

मार्ग में अँधेरा हो गया।

और उन्होंने यहीं रात बिताने का निश्चय किया।

स्थान का नाम वहीं से पड़ा — तमिल में "तंगल्" यानी ठहरना — और पहाड़ी तलगिरि कहलाई।

इस कथा में जो सबसे सुंदर है, वह इसका छोटापन है।

108 दिव्य देशम में मंदिर बड़े कारणों से बने हैं — कोई असुर मारा गया, किसी को शाप से मुक्ति मिली, कोई अवतार हुआ।

यह मंदिर इसलिए है कि किसी को रास्ते में रात हो गई और वह रुक गया।

न कोई युद्ध, न कोई वरदान। बस एक पड़ाव।

बीच का स्थान

यह मंदिर एक ही कथा में दो अन्य दिव्य देशम से बँध जाता है।

एक ओर श्रीरंगम् है — प्रथम दिव्य देशम, जहाँ से वे चले।

दूसरी ओर श्रीविल्लिपुत्तूर है — आंडाळ की जन्मभूमि, जहाँ वे पहुँचना चाहते थे।

और यह स्थान उन दोनों के बीच है।

यह भाव इस सूची में दूसरी बार आया है। उरैयूर में भी रंगनाथ श्रीरंगम् से निकलकर विवाह के लिए जाते हैं — और वह यात्रा आज भी हर वर्ष होती है।

दोनों जगह वही देवता निकलते हैं, और दोनों बार किसी स्त्री के लिए।

⚠️ एक भेद दर्ज करना उचित है। आंडाळ की सबसे प्रचलित कथा में वे स्वयं श्रीरंगम् जाती हैं और रंगनाथ में समा जाती हैं — यात्रा उनकी होती है, भगवान की नहीं।

यह मंदिर उलटी दिशा दर्ज करता है।

दोनों परंपराएँ साथ-साथ चलती हैं, और हम किसी को ग़लत नहीं कह रहे। हमने वही लिखा है जो इस स्थल की परंपरा कहती है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Ninra_Narayana_Perumal_temple से, 2026-08-05.

इतिहास

मंदिर की दो चट्टान-कटी गुफ़ाओं में तीन शिलालेख हैं, जिनमें दो आठवीं शताब्दी के हैं। वर्तमान स्वरूप का निर्माण पांड्य राजा देवेंद्र वल्लभ द्वारा माना जाता है।

8वीं शताब्दी
चट्टान-कटी गुफ़ाओं में दो शिलालेख — मंदिर की प्राचीनता का प्रमाण

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। ⚠️ मंदिर पहाड़ी पर है, इसलिए कुछ चढ़ाई है — प्रातःकाल जाना अधिक सुविधाजनक है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: मदुरै हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: शिवकाशी / श्रीविल्लिपुत्तूर · 4 किमी

हवाई मार्ग

मदुरै हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।

रेल मार्ग

शिवकाशी / श्रीविल्लिपुत्तूर — लगभग 4 किमी

शिवकाशी से केवल 4 किमी।

सड़क मार्ग

शिवकाशी — लगभग 4 किमी

विरुदुनगर व श्रीविल्लिपुत्तूर दोनों से 20-20 किमी।

पैदल यात्रा (ट्रेक)

तिरुत्तंगाल् गाँव से लगभग किमी की चढ़ाई · कठिनाई: हल्की — छोटी पहाड़ी।

मंदिर लगभग सौ फ़ुट ऊँची ग्रेनाइट पहाड़ी (तलगिरि) पर है। चढ़ाई शोलिंगर जैसी लंबी नहीं है, पर है — प्रातःकाल जाना अधिक सुविधाजनक है।

अंतिम चरण: सड़क तलहटी तक जाती है; आगे पहाड़ी पर चढ़ना होता है।

सुगमता: पहाड़ी पर होने के कारण थोड़ी चढ़ाई है।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। श्रीविल्लिपुत्तूर केवल बीस किलोमीटर है, इसलिए दोनों एक ही दिन में किए जा सकते हैं — और कथा की दृष्टि से वही क्रम उचित भी है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • श्रीविल्लिपुत्तूर (लगभग 20 किमी) — आंडाळ की जन्मभूमि — इसी कथा का गंतव्य।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प शिवकाशी, श्रीविल्लिपुत्तूर व मदुरै में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री निंद्र नारायण पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुत्तंगाल्, शिवकाशी से 4 किमी; श्रीविल्लिपुत्तूर से 20 किमी
ज़िलाविरुदुनगर
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुत्तंगाल् — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न