बल्लाळेश्वर

Ballaleshwar Temple, Pali

अष्टविनायक का अकेला मंदिर जिसका नाम किसी देवता का नहीं, एक बालक भक्त का है।

यह स्थान इनमें भी है:अष्टविनायक

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

पाली रायगड ज़िले में है और अष्टविनायक यात्रा का तीसरा पड़ाव है।

यहाँ जो बात सबसे अलग है वह नाम में ही छिपी है। **अष्टविनायक के आठ मंदिरों में यह अकेला है जिसका नाम किसी देवता या असुर से नहीं, एक भक्त से आया** — बल्लाळ नामक बालक से। गणेश ने यहाँ उसी के नाम से रहना स्वीकार किया, और वे बल्लाळेश्वर कहलाए।

प्रतिमा की सूँड़ बाईं ओर है और उसकी **आँखों तथा नाभि में हीरे जड़े हैं।**

मंदिर पूर्वाभिमुख है और उसमें दो गर्भगृह हैं। यह रचना अष्टविनायक के अन्य मंदिरों में नहीं मिलती।

  • आठों में अकेला मंदिर जिसका नाम एक भक्त के नाम पर है, देवता के नहीं।
  • प्रतिमा की आँखों और नाभि में हीरे जड़े हैं।
  • मंदिर पूर्वाभिमुख है और उसमें दो गर्भगृह हैं।
  • मूल लकड़ी का मंदिर 1760 में नाना फडणवीस ने पत्थर का बनवाया।

पौराणिक कथा

बल्लाळेश्वर की कथा अष्टविनायक की सब कथाओं में सबसे कठोर है। इसमें असुर नहीं है — इसमें एक पिता है।

बल्लाळ की भक्ति

बल्लाळ एक व्यापारी का पुत्र था और बचपन से गणेश का भक्त। वह अपने साथी बालकों को इकट्ठा कर पूजा कराता, और वे सब घंटों उसी में लगे रहते।

गाँव के लोगों ने शिकायत की कि बच्चे काम-काज छोड़कर बिगड़ रहे हैं। बल्लाळ के पिता क्रोधित हुए। उन्होंने पूजा की सामग्री तोड़ दी, गणेश की शिला फेंक दी, और बल्लाळ को पीटा।

फिर उसे एक वृक्ष से बाँधकर वहीं छोड़ दिया, और चले गए।

जो बाँधकर छोड़ा गया, उसी के नाम पर

बल्लाळ बँधा रहा। भूखा, घायल, अकेला — और वह उसी अवस्था में गणेश का स्मरण करता रहा।

कथा कहती है कि गणेश एक ब्राह्मण के वेश में प्रकट हुए, उसके बंधन खोले, और उसे वर माँगने को कहा।

बल्लाळ ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने यही माँगा कि गणेश सदा के लिए इसी स्थान पर निवास करें।

गणेश ने वह स्वीकार किया — और यह भी कि वे उसी के नाम से जाने जाएँगे। इसीलिए यहाँ वे **बल्लाळेश्वर** हैं, यानी बल्लाळ के ईश्वर।

यह ध्यान देने योग्य है कि परंपरा ने किसे याद रखा। पिता का नाम कथा में है भी नहीं। गाँव वालों का भी नहीं। जिसे बाँधकर छोड़ दिया गया था, मंदिर उसी के नाम पर है — और आठ मंदिरों में केवल यही ऐसा है।

स्रोत: स्थल-परंपरा (मुद्गल पुराण की परंपरा से); विवरण en.wikipedia.org/wiki/Ashtavinayaka से सत्यापित

इतिहास

नाना फडणवीस का पुनर्निर्माण

मूल मंदिर लकड़ी का था। सन् 1760 में नाना फडणवीस ने उसे पत्थर से पुनर्निर्मित कराया, और वर्तमान ढाँचा तभी का है।

नाना फडणवीस पेशवा काल के प्रमुख राजनयिकों में थे, और महाराष्ट्र के कई मंदिरों के निर्माण व जीर्णोद्धार से उनका नाम जुड़ा है।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Ashtavinayaka — 2026-08-04 को देखा गया

1760 ई.
नाना फडणवीस द्वारा लकड़ी के मंदिर का पत्थर में पुनर्निर्माण।

दर्शन का समय

पाली मंदिर के लिए कोई आधिकारिक दर्शन-समय या आरती-तालिका प्रकाशित नहीं होती।

मंदिर सामान्यतः प्रातःकाल से सायंकाल तक दर्शन हेतु खुला रहता है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, मुंबई
निकटतम रेलवे स्टेशन: कर्जत रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, मुंबई

मुंबई से पाली तक सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे। पुणे भी एक विकल्प है।

रेल मार्ग

कर्जत रेलवे स्टेशन

कर्जत से सड़क मार्ग से आगे। खोपोली भी पास है।

सड़क मार्ग

पाली

मुंबई-गोवा मार्ग से जुड़ा; मुंबई व पुणे दोनों से पहुँचा जा सकता है।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च। वर्षा-काल में कोंकण क्षेत्र में भारी वर्षा होती है, यद्यपि उस समय आसपास का भूदृश्य सबसे सुंदर रहता है।

प्रमुख त्योहार

  • गणेश चतुर्थी
  • माघी गणेश जयंती

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • सरसगढ़ किला — पाली के पास स्थित पहाड़ी किला।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: पाली में सीमित व्यवस्था है; अधिकांश यात्री लोनावला, खोपोली अथवा पुणे में ठहरते हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री बल्लाळेश्वर मंदिर
स्थानपाली
ज़िलारायगड
राज्यमहाराष्ट्र

बल्लाळेश्वर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न