दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — नम्माळ्वार
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरुवण्परिसारम् तमिलनाडु के कन्याकुमारी ज़िले में है, नागरकोइल से लगभग चार किलोमीटर दूर, नागरकोइल–तिरुनेलवेली राजमार्ग के पास। यहाँ विष्णु कुरळप्प पेरुमाल रूप में विराजते हैं।
यह भी मलै नाडु के तेरह दिव्य देशम में गिना जाता है — वह समूह जिसमें केरल के ग्यारह और कन्याकुमारी के दो मंदिर आते हैं।
यहाँ की कथा असामान्य है, क्योंकि वह किसी अवतार की नहीं — अवतार के *बाद* की है।
परंपरा कहती है कि जब विष्णु ने नरसिंह का रूप लिया, तो वह रूप इतना उग्र था कि स्वयं लक्ष्मी भयभीत हो गईं।
वे उन्हें छोड़कर चली आईं — और यहीं तप करने लगीं।
बाद में प्रह्लाद ने नरसिंह को शांत किया, और वे अपने सौम्य रूप में लौट आए।
तब वे यहाँ आए, और लक्ष्मी ने पुनः उनके वक्ष पर अपना स्थान लिया।
यह प्रसंग इसलिए उल्लेखनीय है कि अधिकांश मंदिर अवतार के *क्षण* को पकड़ते हैं।
नरसिंह के मंदिर उस क्षण के हैं जब खंभा फटा और हिरण्यकशिपु मारा गया। तिरुक्कडिगै में योग नरसिंह हैं, तिरुवल्लिक्केणि में योग नरसिंह की सन्निधि है।
यह मंदिर उसके बाद का है — जब सब समाप्त हो चुका था, और अब उस उग्रता के परिणाम भुगतने बाक़ी थे।
और परिणाम यह था कि जो सबसे निकट थीं, वे भी दूर चली गईं।
- कथा नरसिंह-अवतार के बाद की है — जो 108 में विरल है।
- लक्ष्मी नरसिंह के उग्र रूप से भयभीत होकर यहाँ तप करने आईं।
- प्रह्लाद द्वारा शांत किए जाने पर भगवान यहाँ आए और लक्ष्मी लौटीं।
- मलै नाडु के तेरह दिव्य देशम में से एक।
- नागरकोइल से केवल चार किलोमीटर।
पौराणिक कथा
यह कथा उस क्षण की है जो नरसिंह-अवतार के बाद आया।
जब लक्ष्मी डर गईं
नरसिंह-अवतार भक्ति-परंपरा का सबसे उग्र प्रसंग है। खंभा फटा, आधा सिंह आधा मनुष्य निकला, और हिरण्यकशिपु का अंत हुआ।
कथाएँ प्रायः यहीं रुक जाती हैं।
पर परंपरा कहती है कि वह उग्रता इतनी थी कि स्वयं लक्ष्मी भयभीत हो गईं।
वे उन्हें छोड़कर चली आईं, और यहीं तप करने लगीं।
यह असामान्य है। भक्ति-साहित्य में लक्ष्मी सदा विष्णु के साथ हैं — उनके वक्ष पर, उनके चरणों में, उनकी अर्धांगिनी।
यहाँ वे दूर चली गईं।
और कारण कोई शाप नहीं था, कोई अपराध नहीं। कारण केवल यह था कि वे उस रूप को सह नहीं सकीं।
और फिर लौटीं
प्रह्लाद ने नरसिंह को शांत किया।
यह भी ध्यान देने योग्य है। जिसके लिए वह अवतार हुआ था, वही उसे शांत करता है — एक बालक।
भगवान अपने सौम्य रूप में लौटे, और यहाँ आए।
और लक्ष्मी ने पुनः उनके वक्ष पर अपना स्थान लिया।
यानी यह मंदिर उस क्षण का है जब कोई लौटकर आता है।
108 में नरसिंह के कई मंदिर हैं, और वे प्रायः उस क्षण के हैं जब वे प्रकट हुए। तिरुक्कडिगै में योग नरसिंह हैं, अहोबिलम् नौ नरसिंह रूपों का स्थान है।
यह मंदिर उसके बाद का है — जब क्रोध उतर चुका था, और जो डरकर चली गई थीं, वे वापस आ रही थीं।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर नागरकोइल के पास ही है, इसलिए पहुँचना सरल है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
तिरुवनंतपुरम् अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग डेढ़ घंटा।
रेल मार्ग
नागरकोइल जंक्शन — लगभग 4 किमी
वहाँ से केवल 4 किमी।
सड़क मार्ग
नागरकोइल — लगभग 4 किमी
नागरकोइल–तिरुनेलवेली राजमार्ग के पास।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। यह कन्याकुमारी व तिरुवनंतपुरम् की यात्रा के साथ जोड़ा जा सकता है।
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरु वट्टारु — नागरकोइल से लगभग 30 किमी, मार्तांडम् के पास, तमिलनाडु
- तिरुक्कडिगै — शोलिंगर, तमिलनाडु
- कन्याकुमारी
- तिरु वट्टारु — एक और दिव्य देशम, इसी ज़िले में।
