उज्जैन

Ujjain (Avantika)

सप्त पुरी की छठी पुरी — शिप्रा के तट पर वह नगर जो कभी अवंति की राजधानी था और जहाँ से कभी भारतीय ज्योतिष की मध्य रेखा गुज़रती थी।

यह स्थान इनमें भी है:सप्त पुरी

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

गरुड़ पुराण के श्लोक में छठा नाम **अवन्तिका** है — यानी आज का उज्जैन। यह नगर शिप्रा नदी के तट पर, मालवा के पठार पर बसा है।

उज्जैन की पहचान केवल धार्मिक नहीं है, और यही इसे शेष छह पुरियों से अलग करता है। यह **अवंति महाजनपद की राजधानी** था — प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में से एक। लगभग 600 ईसा पूर्व तक यह मालवा का राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था।

एक और बात, जो प्रायः कम कही जाती है: **भारतीय ज्योतिष में उज्जैन की स्थिति वही रही जो आधुनिक भूगोल में ग्रीनविच की है।** देशांतर की गणना यहीं से होती थी। जयपुर के सवाई जय सिंह द्वितीय (1688–1743) ने यहाँ जंतर मंतर बनवाया, जो आज भी खड़ा है।

यहाँ **महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग** है — बारह ज्योतिर्लिंगों में अकेला दक्षिणमुखी — और **उज्जयिनी शक्ति पीठ** भी। काशी की तरह यहाँ भी शैव और शाक्त दोनों परंपराओं के प्रमुख तीर्थ एक ही नगर में हैं। हरसिद्धि और काल भैरव के मंदिर भी यहीं हैं।

हर बारह वर्ष में यहाँ **सिंहस्थ कुंभ** लगता है, जो देश के चार कुंभ स्थलों में एक है।

  • सप्त पुरी की छठी पुरी; श्लोक में "अवन्तिका" के नाम से।
  • अवंति महाजनपद की राजधानी — प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में एक।
  • भारतीय ज्योतिष की मध्य रेखा यहीं से मानी जाती थी; जंतर मंतर आज भी खड़ा है।
  • यहाँ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और उज्जयिनी शक्ति पीठ दोनों हैं।
  • हर बारह वर्ष में सिंहस्थ कुंभ — देश के चार कुंभ स्थलों में एक।
  • परंपरा में सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी; विक्रम संवत् उन्हीं से जुड़ा माना जाता है।

पौराणिक कथा

उज्जैन का नाम काल से जुड़ा है — समय से — और यह जोड़ संयोग नहीं लगता।

महाकाल की नगरी

यहाँ शिव **महाकाल** कहलाते हैं — काल के भी स्वामी। परंपरा कहती है कि जहाँ सब कुछ समय के अधीन है, वहाँ महाकाल समय के अधीन नहीं, समय उनके अधीन है।

यह नाम इस नगर के लिए विशेष रूप से सटीक बैठता है। जिस नगर से भारतीय ज्योतिष की देशांतर-रेखा गुज़रती थी, यानी जहाँ से समय की गणना होती थी, वहीं काल के स्वामी विराजते हैं।

खगोल और आस्था का यह मेल कहीं और इस तरह नहीं दिखता। पंडित जिस नगर में बैठकर पंचांग बनाते रहे, उसी नगर के देवता का नाम महाकाल है।

भस्म आरती

महाकालेश्वर में प्रतिदिन प्रातःकाल भस्म आरती होती है — शिव को भस्म अर्पित की जाती है। यह परंपरा और कहीं इस रूप में नहीं मिलती।

भस्म वह है जो जल जाने के बाद बचता है। हर वस्तु का, हर देह का अंतिम रूप वही है।

जिस नगर में समय की गणना होती थी, वहाँ दिन की पहली पूजा उसी पदार्थ से होती है जो समय के पूरा हो जाने पर शेष रहता है। परंपरा ने यह संगति जानबूझकर रखी हो या नहीं, पर वह वहाँ है।

स्रोत: महाकाल-परंपरा; तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Ujjain से. भस्म आरती के समय व नियम महाकालेश्वर के पेज पर देखें।

इतिहास

उज्जैन उन थोड़े तीर्थ-नगरों में है जिनका राजनीतिक इतिहास धार्मिक इतिहास जितना ही लंबा है।

अवंति की राजधानी

उज्जैन अवंति महाजनपद की राजधानी था — प्राचीन भारत के उन सोलह महाजनपदों में से एक जिनका उल्लेख बौद्ध व जैन ग्रंथों में मिलता है।

लगभग 600 ईसा पूर्व तक यह मालवा के पठार का राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था। यानी यह नगर तीर्थ बनने से पहले एक राजधानी था।

विक्रमादित्य और जंतर मंतर

परंपरा में उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी के रूप में बार-बार आता है, और विक्रम संवत् उन्हीं से जुड़ा माना जाता है।

बहुत बाद में, जयपुर के सवाई जय सिंह द्वितीय (1688–1743) ने यहाँ जंतर मंतर बनवाया — वही वेधशाला-शृंखला जो उन्होंने पाँच नगरों में बनवाई थी। उज्जैन का चुनाव आकस्मिक नहीं था; यह नगर सदियों से ज्योतिषीय गणना का केंद्र रहा था।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Ujjain — 2026-08-04 को देखा गया

लगभग 600 ई.पू.
मालवा के पठार के राजनीतिक, व्यापारिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभार।
1688–1743 ई.
सवाई जय सिंह द्वितीय के काल में जंतर मंतर का निर्माण।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाई अड्डा, इंदौर
निकटतम रेलवे स्टेशन: उज्जैन जंक्शन

हवाई मार्ग

देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाई अड्डा, इंदौर

इंदौर से उज्जैन लगभग एक से डेढ़ घंटे की दूरी पर है; टैक्सी व बस नियमित उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग

उज्जैन जंक्शन

उज्जैन एक प्रमुख रेल-गंतव्य है और दिल्ली, मुंबई, इंदौर व भोपाल से सीधी गाड़ियाँ आती हैं।

सड़क मार्ग

उज्जैन

इंदौर, भोपाल व देवास से नियमित बस सेवा उपलब्ध है।

अंतिम चरण: नगर के भीतर महाकालेश्वर मंदिर, शिप्रा के घाट व अन्य मंदिर ऑटो से सुगमता से पहुँच में हैं।

सुगमता: नगर समतल है और घूमने में सुगम। महाकालेश्वर मंदिर में भीड़ के दिनों में लंबी पंक्ति लगती है।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब मौसम अनुकूल रहता है। महाशिवरात्रि पर यहाँ बहुत भीड़ होती है। सिंहस्थ कुंभ के वर्ष में नगर की पूरी व्यवस्था बदल जाती है और ठहरने का प्रबंध महीनों पहले करना पड़ता है।

प्रमुख त्योहार

  • महाशिवरात्रि
  • सिंहस्थ कुंभ (हर 12 वर्ष)
  • नाग पंचमी

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • काल भैरव मंदिर — नगर के भैरव; यहाँ की चढ़ावे की परंपरा असामान्य है और बहुत चर्चित रही है।
  • हरसिद्धि मंदिर — शक्ति का प्रमुख मंदिर; दीपस्तंभों के लिए जाना जाता है।
  • राम घाट, शिप्रा — सिंहस्थ कुंभ का प्रमुख स्नान-स्थल।
  • जंतर मंतर (वेध शाला) — सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित वेधशाला; आज भी गणना के लिए प्रयुक्त।
  • सांदीपनि आश्रम — परंपरा के अनुसार कृष्ण, बलराम व सुदामा ने यहीं शिक्षा पाई।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र। महाकालेश्वर की भस्म आरती के अपने नियम व बुकिंग की व्यवस्था है — उसका विवरण मंदिर के पेज पर देखें।

ठहरने की व्यवस्था: उज्जैन में धर्मशालाओं से लेकर होटलों तक हर प्रकार की व्यवस्था है। महाशिवरात्रि व सिंहस्थ के समय बुकिंग पहले से करनी पड़ती है।

एक नज़र में

प्रकारनगर
स्थानउज्जैन
ज़िलाउज्जैन
राज्यमध्य प्रदेश
ऊँचाई494 मीटर
निर्देशांक23.1667, 75.7833

उज्जैन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न