तिरुक्कोळि

Azhagiya Manavala Perumal Temple, Uraiyur

वह दिव्य देशम जहाँ हर वर्ष श्रीरंगम् के रंगनाथ स्वयं चलकर आते हैं — अपनी वधू से विवाह के लिए।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
अऴगिय मणवाळ पेरुमाल
थायार
कमलवल्लि नाच्चियार — उत्तराभिमुख सन्निधि

मंगलाशासनम्: पासुरम् — तिरुमंगै आळ्वार तथा अन्य आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुक्कोळि — आज उरैयूर, तिरुचिरापल्ली का एक ऐतिहासिक उपनगर — 108 दिव्य देशम में गिना जाता है। यहाँ विष्णु अऴगिय मणवाळ पेरुमाल रूप में विराजते हैं, जिसका अर्थ है *सुंदर वर*। देवी कमलवल्लि नाच्चियार हैं।

यहाँ की सबसे उल्लेखनीय बात एक वार्षिक यात्रा है।

पंगुनि मास में श्रीरंगम् के रंगनाथ — यानी प्रथम दिव्य देशम के भगवान — प्रातः चार बजे अपना मंदिर छोड़ते हैं।

वे स्वर्ण पालकी में बैठकर कावेरी पार करते हैं और लगभग छह किलोमीटर की यात्रा कर यहाँ पहुँचते हैं — कमलवल्लि नाच्चियार से कल्याण उत्सवम् के लिए।

यह ध्यान देने योग्य है। इस पूरी सूची में मंदिर प्रायः कथाओं से जुड़ते हैं — कोई साझा प्रसंग, कोई साझा देवता।

यहाँ जोड़ कथा का नहीं है। यह हर वर्ष सचमुच होता है। प्रथम दिव्य देशम के भगवान अपने स्थान से निकलकर, नदी पार कर, इस मंदिर तक आते हैं।

कथा एक निःसंतान राजा की है। परंपरा कहती है कि चोल राजा नंद चोल संतानहीन थे और विष्णु के भक्त। उन्हें एक दिव्य कन्या मिली — कमलवल्लि, जो लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं। अऴगिय मणवाळन् उन्हीं से विवाह करने यहाँ आए।

एक और विरल बात: कमलवल्लि नाच्चियार की सन्निधि उत्तर की ओर मुख किए है — दिव्य देशम में यह असामान्य है। मंदिर को नाच्चियार कोविल भी कहा जाता है, यानी देवी-प्रधान।

⚠️ दो भ्रम टाल लें। (1) यह तंजावुर वाला नाच्चियार कोइल (तिरुनारायूर) नहीं है — वह अलग दिव्य देशम है, यद्यपि दोनों को यही नाम दिया जाता है। (2) कमलवल्लि नाच्चियार नाम की देवी तिरुक्कंडियूर में भी हैं।

मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में मध्यकालीन चोलों द्वारा माना जाता है; बाद में पांड्यों, विजयनगर राजाओं और नायकों ने योगदान दिया।

  • पंगुनि में श्रीरंगम् के रंगनाथ स्वयं यहाँ आते हैं — प्रातः 4 बजे, स्वर्ण पालकी में, कावेरी पार कर लगभग 6 किमी।
  • यह कथा-सूत्र नहीं, प्रतिवर्ष होने वाली वास्तविक यात्रा है।
  • भगवान का नाम अऴगिय मणवाळ — यानी सुंदर वर।
  • कमलवल्लि नाच्चियार की सन्निधि उत्तराभिमुख — दिव्य देशम में विरल।
  • परंपरा: निःसंतान चोल राजा नंद चोल को कमलवल्लि दिव्य कन्या के रूप में मिलीं।
  • ⚠️ तंजावुर के नाच्चियार कोइल (तिरुनारायूर) से भिन्न — दोनों का यही नाम है।

पौराणिक कथा

यहाँ की कथा एक विवाह की है — और वह विवाह हर वर्ष दोहराया जाता है।

राजा की बेटी

परंपरा कहती है कि चोल राजा नंद चोल संतानहीन थे और विष्णु के अनन्य भक्त।

उनकी भक्ति से उन्हें एक दिव्य कन्या मिली — कमलवल्लि, जिन्हें लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।

और अऴगिय मणवाळन् — *सुंदर वर* — उन्हीं से विवाह करने यहाँ आए।

देवी की सन्निधि यहाँ उत्तर की ओर मुख किए है, जो दिव्य देशम में विरल है। मंदिर को नाच्चियार कोविल भी कहा जाता है — यानी वह मंदिर जहाँ देवी प्रधान हैं।

यह भाव तंजावुर के तिरुनारायूर से मिलता-जुलता है, जिसे भी नाच्चियार कोइल कहा जाता है और जहाँ विवाह की शर्त ही देवी की प्राथमिकता थी। (दोनों अलग दिव्य देशम हैं — नाम एक-सा होने से भ्रम होना सामान्य है।)

जब रंगनाथ चलकर आते हैं

पर इस मंदिर की सबसे बड़ी बात कोई पुरानी कथा नहीं है। वह हर वर्ष होती है।

पंगुनि मास में, प्रातः चार बजे, श्रीरंगम् के रंगनाथ अपना मंदिर छोड़ते हैं।

श्रीरंगम् — यानी प्रथम दिव्य देशम, 108 की सूची का पहला नाम।

वे स्वर्ण पालकी में बैठते हैं, कावेरी पार करते हैं, और लगभग छह किलोमीटर चलकर यहाँ पहुँचते हैं — कल्याण उत्सवम् के लिए, कमलवल्लि नाच्चियार से विवाह करने।

इस पूरी सूची में मंदिर एक-दूसरे से प्रायः कथाओं से जुड़ते हैं। तिरु मणिमाड कोविल बद्रीनाथ से एक परंपरा के सूत्र से जुड़ता है; नाथन् कोइल पुरी से समानता के कारण।

यह जोड़ वैसा नहीं है।

यहाँ कोई कथा नहीं जोड़ रही। भगवान स्वयं चलकर आते हैं — हर साल, एक निश्चित महीने में, एक निश्चित समय पर, एक निश्चित दूरी तय करके।

और वे उस मंदिर से आते हैं जो इस पूरी सूची में पहला है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

इतिहास

मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में मध्यकालीन चोलों द्वारा माना जाता है; बाद में पांड्यों, विजयनगर राजाओं और नायकों ने भी योगदान दिया। उरैयूर स्वयं प्राचीन चोल राजधानी रहा है।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर तिरुचिरापल्ली नगर के भीतर ही है, इसलिए समय पूछकर जाना सरल है। ⚠️ पंगुनि के कल्याण उत्सवम् पर व्यवस्था व भीड़ दोनों बदल जाती हैं।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

नगर के भीतर; पहुँच सरल।

रेल मार्ग

तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन

उरैयूर नगर का ही भाग है।

सड़क मार्ग

उरैयूर, तिरुचिरापल्ली

नगर-बस व ऑटो उपलब्ध; श्रीरंगम् लगभग 6 किमी है।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी मौसम की दृष्टि से सबसे अनुकूल है। पर यदि रंगनाथ की पालकी-यात्रा और कल्याण उत्सवम् देखना हो, तो पंगुनि (मार्च–अप्रैल) में आना होगा — तब भीड़ बहुत अधिक रहती है।

प्रमुख त्योहार

  • कल्याण उत्सवम् (पंगुनि, मार्च–अप्रैल) — श्रीरंगम् से रंगनाथ की पालकी-यात्रा

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • श्रीरंगम् (लगभग 6 किमी) — प्रथम दिव्य देशम; कल्याण उत्सवम् में रंगनाथ यहीं से आते हैं।
  • तिरुचिरापल्ली का रॉक फ़ोर्ट

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के पर्याप्त विकल्प तिरुचिरापल्ली में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाल मंदिर
स्थानउरैयूर, तिरुचिरापल्ली
ज़िलातिरुचिरापल्ली
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुक्कोळि — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न