दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — पेरियाळ्वार, तिरुमऴिसै आळ्वार व तिरुमंगै आळ्वार
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरु मणिक्कूडम् शिरकाळि से लगभग आठ किलोमीटर पूर्व, तिरुवेण्काडु के मार्ग पर, **तिरुनांगूर** के ग्यारह दिव्य देशम में से एक है। यहाँ विष्णु **वरदराज पेरुमाल** रूप में विराजते हैं — जिन्हें **सेंगण्माल** और **मणिकूड नायकर** भी कहा जाता है — पूर्व की ओर मुख किए, खड़ी मुद्रा में।
एक बात यहाँ अलग है। श्रीदेवी (**तिरुमामंगै नाच्चियार**) और **भूदेवी** — दोनों देवियाँ **एक ही गर्भगृह** में पेरुमाल के साथ हैं, अलग-अलग मंदिर में नहीं।
मंदिर की संरचना सीधी है — एक प्राकार, एक गर्भगृह, द्रविड़ शैली। गर्भगृह के ऊपर **कनक विमान** है।
**तीर्थ-कुंड की परंपरा उल्लेखनीय है।** कहा जाता है कि यह कुंड **महाभारत काल में अर्जुन ने खोदा** था।
यह जोड़ ध्यान देने योग्य है — तिरुनांगूर में ही **तिरु पार्थन्पळ्ळि** है, जिसका नाम ही "पार्थन्" यानी अर्जुन से पड़ा। यानी इस छोटे क्षेत्र की परंपरा अर्जुन को यहाँ दो बार लाती है: एक बार दर्शन पाने, एक बार जल खोदने।
पेरियाळ्वार, तिरुमऴिसै आळ्वार और तिरुमंगै आळ्वार — तीनों ने इसका मंगलाशासनम् किया।
- तिरुनांगूर के ग्यारह दिव्य देशम में से एक।
- तीर्थ-कुंड परंपरा के अनुसार अर्जुन ने महाभारत काल में खोदा।
- श्रीदेवी व भूदेवी दोनों एक ही गर्भगृह में पेरुमाल के साथ।
- गर्भगृह के ऊपर कनक विमान; एक प्राकार, एक गर्भगृह।
- तीन आळ्वारों ने मंगलाशासनम् किया।
पौराणिक कथा
तिरुनांगूर के ग्यारह की साझा कथा तिरु अरिमेय विण्णगरम् के पृष्ठ पर है। यहाँ केवल इस स्थान का अपना प्रसंग है।
अर्जुन का खोदा हुआ कुंड
परंपरा कहती है कि यहाँ का तीर्थ-कुंड महाभारत काल में **अर्जुन** ने खोदा था।
यह अकेली बात नहीं है। तिरुनांगूर में ही **तिरु पार्थन्पळ्ळि** है, और उसका नाम ही अर्जुन के एक नाम "पार्थन्" से पड़ा — वहाँ की कथा कहती है कि जल की खोज में भटकते अर्जुन को वहीं नारायण के दर्शन हुए।
दोनों कथाओं में अर्जुन जल के साथ हैं। एक में वे जल खोजते हैं, दूसरे में खोदते हैं।
एक ही छोटे क्षेत्र की परंपरा एक ही व्यक्ति को दो बार वहाँ ले आती है — यह संयोग हो सकता है, या स्थानीय स्मृति का वही धागा दो मंदिरों में बँट गया हो। स्रोत यह नहीं बताते, इसलिए हम भी नहीं कहेंगे। दोनों बातें दर्ज हैं, इतना पर्याप्त है।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Thirumanikkoodam से. ग्यारहों की साझा कथा हेतु देखें तिरु अरिमेय विण्णगरम्।
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। तिरुनांगूर के ग्यारह मंदिर पास-पास हैं और प्रायः एक ही दिन में किए जाते हैं।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।
रेल मार्ग
शिरकाळि रेलवे स्टेशन — लगभग 8 किमी
शिरकाळि से 8 किमी पूर्व, तिरुवेण्काडु के मार्ग पर।
सड़क मार्ग
तिरुनांगूर
ग्यारह मंदिर आसपास ही हैं और एक दिन में किए जा सकते हैं।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। तै मास की गरुड सेवै में तिरुनांगूर के ग्यारहों की उत्सव-मूर्तियाँ एकत्र होती हैं।
प्रमुख त्योहार
- तिरुमंगै आळ्वार मंगलाशासन उत्सवम् / गरुड सेवै (तै मास)
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरु अरिमेय विण्णगरम् — शिरकाळि के निकट, तमिलनाडु
- तिरु पार्थन्पळ्ळि — शिरकाळि से लगभग 10 किमी, तमिलनाडु
- तिरुनांगूर के अन्य दस दिव्य देशम — ग्यारहों पास-पास हैं।
- तिरुवेण्काडु — मंदिर इसी मार्ग पर है।
