दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — तिरुमंगै आळ्वार
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरुक्कडिगै — जिसे आज **शोलिंगर** और **घटिकाचलम्** भी कहा जाता है — तमिलनाडु के **रानीपेट्टै** ज़िले में है। यहाँ विष्णु **योग नरसिंह** रूप में विराजते हैं और देवी **अमृतवल्लि थायार** उनके साथ हैं।
**नाम स्वयं एक इकाई है, और यही यहाँ की सबसे विशिष्ट बात है।**
**"कडिगै"** समय की एक पारंपरिक भारतीय इकाई है — लगभग **चौबीस मिनट**।
परंपरा कहती है कि यहाँ **एक कडिगै** — यानी केवल चौबीस मिनट — की उपासना मोक्ष दिला सकती है।
यानी स्थान का नाम किसी देवता, किसी ऋषि या किसी घटना पर नहीं पड़ा। वह **उस अवधि** पर पड़ा है जितनी देर यहाँ ठहरना पर्याप्त माना गया।
**यहाँ दो पहाड़ियाँ हैं, और दोनों पर अलग मंदिर हैं।**
- **पेरिय मलै** (बड़ी पहाड़ी) — यहाँ **योग नरसिंह** और अमृतवल्लि थायार हैं - **चिन्न मलै** (छोटी पहाड़ी) — यहाँ **योग अंजनेय** हैं
**छोटी पहाड़ी वाले हनुमान 108 में अनोखे हैं।**
यहाँ हनुमान **चतुर्भुज** हैं — चार भुजाओं वाले — और **योग-मुद्रा** में बैठे हैं। दो हाथों में वे **नारायण के शंख और चक्र** धारण करते हैं, और शेष दो में जपमाला तथा जप-शंख।
परंपरा कहती है कि वे शंख-चक्र उन्हें **राम ने** दिए थे, असुरों से युद्ध के लिए — इसीलिए उन्हें **वीर अंजनेय** भी कहा जाता है।
स्रोत कहते हैं कि चतुर्भुज हनुमान, वह भी योग-मुद्रा में, केवल यहीं मिलते हैं।
यह भाव इस सूची में दूसरी बार आ रहा है। तंजावुर के **तिरुवेळ्ळियंकुडि** में **गरुड** के चार हाथ हैं — क्योंकि वहाँ भी भगवान ने अपने शंख-चक्र उन्हें थमा दिए थे, ताकि स्वयं धनुष उठा सकें।
दोनों जगह वाहन केवल ढोता नहीं — वह स्वामी का छूटा हुआ भार सँभालता है।
परंपरा कहती है कि विष्णु ने यहाँ **सात ऋषियों** को नरसिंह रूप के दर्शन दिए। मंदिर का तीर्थ **तक्कन् कुळम्** है, जिसे **ब्रह्म तीर्थ** भी कहा जाता है।
- नाम ही एक अवधि है — "कडिगै" यानी लगभग 24 मिनट।
- परंपरा: एक कडिगै की उपासना मोक्षदायी मानी जाती है।
- दो पहाड़ियाँ — पेरिय मलै पर योग नरसिंह, चिन्न मलै पर योग अंजनेय।
- चतुर्भुज योग अंजनेय — नारायण के शंख-चक्र धारण किए; स्रोतों के अनुसार केवल यहीं।
- तिरुवेळ्ळियंकुडि के चतुर्भुज गरुड से वही भाव — वाहन स्वामी के आयुध सँभाले हुए।
- परंपरा: विष्णु ने यहाँ सात ऋषियों को नरसिंह रूप के दर्शन दिए।
पौराणिक कथा
यहाँ दो बातें कहने योग्य हैं — एक अवधि, और एक वाहन।
चौबीस मिनट
**"कडिगै"** समय की एक पारंपरिक इकाई है — लगभग **चौबीस मिनट**।
और इस स्थान का नाम उसी इकाई पर पड़ा है, क्योंकि परंपरा कहती है कि यहाँ **एक कडिगै की उपासना** मोक्ष दिला सकती है।
यह असामान्य है।
तीर्थों के नाम प्रायः किसी देवता पर होते हैं, या किसी ऋषि पर, या किसी घटना पर। यहाँ नाम **समय** पर है — उस अवधि पर, जितनी देर रुकना पर्याप्त माना गया।
और वह अवधि बहुत छोटी है। चौबीस मिनट।
भक्ति-परंपरा में तप प्रायः वर्षों का होता है। इसी सूची में सालिहोत्र ने एक वर्ष बिना अन्न-जल के तप किया, मार्कंडेय ने हज़ार वर्ष।
यहाँ परंपरा उलटी बात कहती है — कि इतना काफ़ी है।
⚠️ पर ध्यान रहे: चढ़ाई 1305 सीढ़ियों की है। रुकना चौबीस मिनट का हो सकता है, पहुँचना नहीं।
जिसने स्वामी के आयुध सँभाले
छोटी पहाड़ी पर **योग अंजनेय** हैं — और वे 108 में अनोखे हैं।
यहाँ हनुमान **चतुर्भुज** हैं, योग-मुद्रा में बैठे। दो हाथों में **नारायण के शंख और चक्र** हैं, और शेष दो में जपमाला व जप-शंख।
परंपरा कहती है कि वे आयुध उन्हें **राम ने** दिए थे — असुरों से युद्ध के लिए। इसीलिए वे **वीर अंजनेय** भी कहलाते हैं।
यह भाव इस सूची में दूसरी बार आया है।
तंजावुर के **तिरुवेळ्ळियंकुडि** में **गरुड** के भी चार हाथ हैं — क्योंकि वहाँ भगवान ने अपने शंख-चक्र उन्हें थमा दिए थे, ताकि स्वयं धनुष लेकर राम रूप में खड़े हो सकें।
दोनों जगह एक ही बात है। वाहन केवल ढोता नहीं। जब स्वामी को कोई और रूप लेना होता है, तो जो उनके हाथ से छूटता है, वह वाहन सँभाल लेता है।
और दोनों जगह उसके हाथ इसीलिए चार हो गए।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों व sholingurdivine.com से, 2026-08-05.
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी पुष्ट आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके। एक भक्ति-वेबसाइट पर समय दिया गया है, पर वह मंदिर-ट्रस्ट या HR&CE का आधिकारिक स्रोत नहीं है, इसलिए हमने उसे नहीं छापा।
⚠️ यह पहाड़ी मंदिर है और चढ़ाई लंबी है — इसलिए यहाँ समय की जानकारी सामान्य से अधिक महत्वपूर्ण है। दिन बहुत जल्दी शुरू करें, और चढ़ने से पहले नीचे स्थानीय रूप से बंद होने का समय अवश्य पूछ लें। दोपहर की गर्मी में चढ़ाई कठिन होती है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।
रेल मार्ग
शोलिंगर रेलवे स्टेशन
चेन्नै–कट्पाडि मार्ग पर।
सड़क मार्ग
शोलिंगर
चेन्नै व वेल्लोर दोनों से बस उपलब्ध।
पैदल यात्रा (ट्रेक)
शोलिंगर नगर (पहाड़ी की तलहटी) से लगभग किमी की चढ़ाई · कठिनाई: मध्यम से कठिन — पूरी चढ़ाई सीढ़ियों की है।
**पेरिय मलै (बड़ी पहाड़ी, योग नरसिंह): लगभग 1,305 सीढ़ियाँ, ऊँचाई लगभग 750 फ़ुट।** **चिन्न मलै (छोटी पहाड़ी, योग अंजनेय): लगभग 406 सीढ़ियाँ, ऊँचाई लगभग 350 फ़ुट।** ⚠️ ये आँकड़े एक भक्ति-वेबसाइट (sholingurdivine.com) से हैं, किसी पुष्ट आधिकारिक स्रोत से नहीं — इसलिए इन्हें अनुमानित मानें। पर चढ़ाई लंबी है, यह निश्चित है। दोनों मंदिर देखने हों तो दोनों चढ़ाइयाँ करनी होंगी। प्रातःकाल जल्दी चढ़ना सबसे उचित है; जल साथ रखें। वृद्धों, हृदय-रोगियों व घुटनों की तकलीफ़ वालों को सावधानी बरतनी चाहिए।
अंतिम चरण: ⚠️ मंदिर पहाड़ी पर हैं — सड़क तलहटी तक जाती है, आगे सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं।
सुगमता: सुगम नहीं। दोनों मंदिरों तक केवल सीढ़ियों से पहुँचा जा सकता है, और बड़ी पहाड़ी की चढ़ाई लंबी है।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी — चढ़ाई के कारण ठंडा मौसम यहाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। प्रातःकाल जल्दी चढ़ना सबसे उचित है।
प्रमुख त्योहार
- ब्रह्मोत्सवम् (चित्तिरै)
- नरसिंह जयंती (वैकासि)
- नवरात्रि (पुरट्टासि)
- वैकुंठ एकादशी (मार्गऴि)
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरुवेळ्ळियंकुडि — कुंभकोणम् के निकट, तमिलनाडु
- तिरुएव्वुळूर — तिरुवळ्ळूर, तमिलनाडु
- चिन्न मलै का योग अंजनेय मंदिर — दूसरी पहाड़ी पर; 406 सीढ़ियाँ।
