तिरु कडल्मलै

Sthalasayana Perumal Temple, Mahabalipuram

वह अकेला दिव्य देशम जहाँ भगवान शेषनाग के बिना, सीधे भूमि पर लेटे हैं — और जहाँ भूतत्ताळ्वार अवतरित हुए।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
स्थल शयन पेरुमाल — भूमि पर शयन, शेषनाग के बिना
थायार
नीलमंगै थायार
तीर्थम्
पुंडरीक पुष्करिणी
विमानम्
गगनकृति विमान

मंगलाशासनम्: पासुरम्भूतत्ताळ्वार व तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरु कडल्मलै तमिलनाडु के **महाबलिपुरम्** में, समुद्र-तट पर है। यहाँ विष्णु **स्थल शयन पेरुमाल** रूप में विराजते हैं और देवी **नीलमंगै थायार** उनके साथ हैं।

**नाम का अर्थ ही यहाँ की सबसे बड़ी बात है।**

"स्थल शयन" का अर्थ है *भूमि पर शयन*। और यह केवल उपाधि नहीं — यह ठीक-ठीक वही है जो यहाँ दिखता है।

विष्णु की शयन-मूर्तियाँ प्रायः **शेषनाग** पर होती हैं। श्रीरंगम् में, तिरु तेट्रि अंबलम् में, हर जगह वह फन उनके ऊपर होता है।

**यहाँ शेषनाग नहीं हैं।** भगवान सीधे **भूमि पर** लेटे हैं।

**तिरुमंगै आळ्वार** ने इस रूप को विशेष माना, और स्रोत कहते हैं कि यह **अकेला ऐसा स्थान** है जहाँ वे अपने पारंपरिक नाग के बिना भूमि पर शयन करते हैं।

⚠️ **एक भ्रम टाल लें:** मयिलाडुतुरै ज़िले के **तिरु सिरुपुलियूर** के देवता भी "स्थल शयन पेरुमाल" कहलाते हैं। दोनों अलग दिव्य देशम हैं — और वहाँ मूर्ति शिशु के आकार की है, दक्षिणाभिमुख।

**यह भूतत्ताळ्वार की अवतार-भूमि भी है।**

भूतत्ताळ्वार बारह आळ्वारों में से एक हैं — उन तीन आदि-आळ्वारों में, जिनसे यह पूरी परंपरा शुरू होती है। **आइप्पसि** मास (अक्टूबर–नवंबर) में उनका **अवतार उत्सवम्** यहीं मनाया जाता है।

गर्भगृह के ऊपर **गगनकृति विमान** है और मंदिर का तीर्थ **पुंडरीक पुष्करिणी** — ऋषि **पुंडरीक** के नाम पर, जिनकी भक्ति से जुड़ी कथा इस स्थान की है।

निर्माण **पल्लवों** द्वारा हुआ; बाद में मध्यकालीन चोलों, विजयनगर राजाओं और मदुरै नायकों ने विस्तार किया।

  • अकेला दिव्य देशम जहाँ भगवान शेषनाग के बिना, सीधे भूमि पर शयन करते हैं।
  • "स्थल शयन" का शाब्दिक अर्थ ही — भूमि पर शयन; तिरुमंगै आळ्वार ने इसे विशेष माना।
  • भूतत्ताळ्वार की अवतार-भूमि; आइप्पसि में उनका अवतार उत्सवम् यहीं।
  • गगनकृति विमान; पुंडरीक पुष्करिणी — ऋषि पुंडरीक के नाम पर।
  • निर्माण पल्लवों द्वारा; महाबलिपुरम् के तट पर।

पौराणिक कथा

यहाँ की कथा ऋषि पुंडरीक की भक्ति से जुड़ी है। ⚠️ स्रोत इसका संक्षिप्त रूप ही देता है, इसलिए हम भी उतना ही लिख रहे हैं जितना सत्यापित है।

जो भूमि पर ही रह गए

परंपरा कहती है कि ऋषि **पुंडरीक** की गहन भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु यहाँ आए — वेश बदलकर।

और फिर वे यहीं रह गए।

जब पुंडरीक ने जाना कि भगवान इसी स्थान पर ठहर गए हैं, तो वे **स्थल शयन पेरुमाल** कहलाए — *इस स्थान पर शयन करने वाले भगवान*।

मंदिर का तीर्थ आज भी उन्हीं के नाम पर **पुंडरीक पुष्करिणी** है।

बिना शेष के

विष्णु की शयन-मूर्ति भारत में सैकड़ों जगह है। और लगभग हर जगह एक चीज़ समान रहती है — वे **शेषनाग** पर लेटे होते हैं, और वह अपना फन उनके ऊपर फैलाए रहता है।

वह शेष केवल आसन नहीं है। वह छत्र है, शय्या है, और साथी भी।

**यहाँ वह नहीं है।**

भगवान सीधे **भूमि पर** लेटे हैं।

तिरुमंगै आळ्वार ने इस रूप को अलग से लक्ष्य किया, और स्रोत कहते हैं कि 108 में यह अकेला ऐसा स्थान है।

भाव सोचने लायक़ है। जो सृष्टि के शेष पर लेटा रहता है, वह यहाँ उसी भूमि पर लेटा है जिस पर भक्त खड़ा है।

बीच में कुछ नहीं।

एक आळ्वार यहाँ जन्मे

यह स्थान **भूतत्ताळ्वार** की अवतार-भूमि है।

भूतत्ताळ्वार उन **तीन आदि-आळ्वारों** में से एक हैं — पोइगै, भूतत्त और पेय — जिनसे आळ्वार-परंपरा आरंभ होती है। जिन पदों से 108 दिव्य देशम की यह पूरी सूची बनी, उनकी नींव इन्हीं तीन से पड़ी।

**आइप्पसि** मास (अक्टूबर–नवंबर) में उनका **अवतार उत्सवम्** यहीं मनाया जाता है।

यह दूसरा अवसर है जब कोई दिव्य देशम किसी कवि से इस तरह जुड़ता है। पहला **तेराऴुंदूर** था, जहाँ **कंबन** जन्मे — वही जिन्होंने तमिल में रामायण रची।

एक जगह उस परंपरा का आरंभ करने वाला जन्मा, दूसरी जगह उसका सबसे बड़ा महाकाव्य लिखने वाला।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Thirukadalmallai से, 2026-08-05.

इतिहास

मंदिर का निर्माण पल्लवों द्वारा हुआ; बाद में मध्यकालीन चोलों, विजयनगर राजाओं और मदुरै नायकों ने इसका विस्तार किया।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। महाबलिपुरम् पर्यटन-स्थल है, इसलिए यहाँ पहुँचना व स्थानीय रूप से समय पूछना सरल है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: चेंगलपट्टु रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग डेढ़ घंटा।

रेल मार्ग

चेंगलपट्टु रेलवे स्टेशन

वहाँ से सड़क मार्ग से।

सड़क मार्ग

महाबलिपुरम्

चेन्नै से ईस्ट कोस्ट रोड द्वारा सीधी बस व टैक्सी।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। आइप्पसि (अक्टूबर–नवंबर) में भूतत्ताळ्वार का अवतार उत्सवम् यहाँ का मुख्य अवसर है।

प्रमुख त्योहार

  • भूतत्ताळ्वार अवतार उत्सवम् (आइप्पसि, अक्टूबर–नवंबर)

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • महाबलिपुरम् के पल्लव स्मारक — यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल — शोर मंदिर, पंच रथ आदि।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: महाबलिपुरम् में पर्यटकों के लिए ठहरने के पर्याप्त विकल्प हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री स्थल शयन पेरुमाल मंदिर
स्थानमहाबलिपुरम् (मामल्लपुरम्)
ज़िलाचेंगलपट्टु
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरु कडल्मलै — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न