काशी

Kashi (Varanasi)

सप्त पुरी की चौथी पुरी — गंगा के तट पर वह नगर जिसका नाम ही "प्रकाश" से बना है, और जहाँ लोग मरने के लिए आते हैं।

यह स्थान इनमें भी है:सप्त पुरी

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

गरुड़ पुराण के जिस श्लोक में सात मोक्षदायिनी पुरियाँ गिनाई गई हैं, उसमें चौथा नाम **काशी** है।

नाम स्वयं अर्थ रखता है। "काशी" संस्कृत की उस धातु से बना है जिसका अर्थ है चमकना — प्रकाश की नगरी। "वाराणसी" नाम दो धाराओं से आया, वरुणा और अस्सी, जो पुराने नगर की सीमा बनाती थीं। "बनारस" इन्हीं का बदला हुआ रूप है।

काशी विश्व के उन गिने-चुने नगरों में है जो लगातार बसे रहे हैं। यहाँ 2014 की खुदाई में 800 ईसा पूर्व तक के अवशेष मिले हैं।

पर काशी की सबसे असामान्य बात उसका मृत्यु से संबंध है। **यहाँ लोग मरने के लिए आते हैं।** मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाटों की चिताएँ कभी बुझती नहीं, और परंपरा मानती है कि काशी में देह त्यागने वाले को मोक्ष मिलता है।

संसार भर में नगर जीवन के लिए बसाए जाते हैं। यह अकेला ऐसा है जिसकी सबसे बड़ी प्रतिष्ठा उसके अंत-संस्कारों में है। और उसी नगर में, उन्हीं घाटों पर, हर शाम गंगा आरती होती है और हज़ारों लोग जुटते हैं। जलती चिताएँ और जलते दीप — दोनों एक ही नदी के किनारे, कुछ ही दूरी पर।

यही काशी का भाव है। यहाँ मृत्यु को छिपाया नहीं जाता, उसे जीवन के साथ खड़ा कर दिया जाता है।

  • सप्त पुरी की चौथी पुरी; नाम "काशी" का अर्थ है प्रकाश की नगरी।
  • विश्व के सबसे पुराने लगातार बसे नगरों में — 800 ईसा पूर्व तक के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग और मणिकर्णिका शक्ति पीठ दोनों हैं — दो अलग परंपराएँ एक नगर में।
  • मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाट पर चिताएँ कभी बुझती नहीं; परंपरा मानती है कि यहाँ देह त्यागने से मोक्ष मिलता है।
  • दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन संध्या को गंगा आरती होती है।
  • गंगा यहाँ अर्धचंद्राकार मोड़ लेती है और नगर उसके बाएँ तट पर बसा है।

पौराणिक कथा

काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है — वह भूमि जिसे शिव ने कभी नहीं छोड़ा।

अविमुक्त

परंपरा कहती है कि प्रलय के समय भी, जब सब कुछ जल में समा जाता है, काशी नष्ट नहीं होती। शिव उसे अपने त्रिशूल पर उठा लेते हैं।

इसीलिए इसे अविमुक्त कहा गया — जो कभी मुक्त नहीं किया गया, कभी छोड़ा नहीं गया।

यह कल्पना ही बताती है कि परंपरा ने इस नगर को क्या माना। वह इसे एक स्थान नहीं, एक निरंतरता मानती है — जो समय के बाहर है।

तारक मंत्र

काशी में मृत्यु को लेकर जो मान्यता है, वह इस पर टिकी है कि यहाँ मरने वाले के कान में शिव स्वयं तारक मंत्र कहते हैं, और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

इसी विश्वास के कारण सदियों से वृद्ध और रोगी यहाँ आकर अपने अंतिम दिन बिताते रहे हैं। नगर में ऐसे भवन हैं जो केवल इसी प्रयोजन के लिए बने — मुक्ति भवन।

यह बात बाहर से देखने पर उदास लग सकती है। पर जो वहाँ जाकर देखते हैं, वे प्रायः कुछ और कहते हैं। जिस चीज़ से पूरा संसार डरता है, यहाँ उसकी तैयारी की जाती है — और तैयारी कर लेने से डर कम हो जाता है।

स्रोत: काशी-माहात्म्य की प्रचलित परंपरा (स्कंद पुराण के काशी खंड में विस्तृत); तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Varanasi से

इतिहास

काशी का इतिहास इतना लंबा है कि उसका आरंभ-बिंदु निश्चित करना ही कठिन है।

कितना पुराना

सन् 2014 की खुदाई में यहाँ 800 ईसा पूर्व तक के अवशेष मिले। नगर इससे भी पुराना हो सकता है, पर यह वह तिथि है जो पुरातत्व से सिद्ध है।

काशी उन थोड़े नगरों में है जो हज़ारों वर्षों से लगातार बसे रहे — कभी उजड़कर फिर बसे नहीं, बस बसे ही रहे।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Varanasi — 2026-08-04 को देखा गया

800 ई.पू. (कम से कम)
2014 की खुदाई में इस काल तक के अवशेष प्राप्त।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, वाराणसी
निकटतम रेलवे स्टेशन: वाराणसी जंक्शन

हवाई मार्ग

लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, वाराणसी

नगर से लगभग एक घंटे की दूरी पर; टैक्सी सुगमता से मिल जाती हैं।

रेल मार्ग

वाराणसी जंक्शन

देश के लगभग हर बड़े नगर से सीधी गाड़ियाँ आती हैं। बनारस व मंडुआडीह स्टेशन भी विकल्प हैं।

सड़क मार्ग

वाराणसी

लखनऊ, प्रयागराज, गोरखपुर व पटना से नियमित बस सेवा उपलब्ध है।

अंतिम चरण: पुराने नगर की गलियाँ सँकरी हैं और वहाँ वाहन नहीं जाते — घाटों व विश्वनाथ मंदिर तक पैदल ही पहुँचा जाता है। घाटों के बीच आने-जाने के लिए नाव सबसे सुगम साधन है।

सुगमता: नगर तक पहुँच सुगम है, पर पुराने नगर की गलियाँ सँकरी और भीड़भाड़ वाली हैं तथा घाटों तक सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। चलने-फिरने में कठिनाई वाले यात्रियों के लिए नाव से घाट देखना सबसे व्यावहारिक रहता है।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च। ग्रीष्म में यहाँ अत्यधिक गर्मी पड़ती है। देव दीपावली (कार्तिक पूर्णिमा) पर सभी घाट दीपों से भर जाते हैं — वह दृश्य विशेष है, पर भीड़ भी बहुत रहती है और ठहरने की व्यवस्था पहले से करनी पड़ती है।

प्रमुख त्योहार

  • महाशिवरात्रि
  • देव दीपावली
  • गंगा दशहरा

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • दशाश्वमेध घाट — नगर का सबसे प्रमुख घाट; प्रतिदिन संध्या को गंगा आरती यहीं होती है।
  • मणिकर्णिका घाट — प्रमुख श्मशान घाट, जहाँ चिताएँ कभी बुझती नहीं। यहीं मणिकर्णिका शक्ति पीठ भी है।
  • हरिश्चंद्र घाट — दूसरा प्रमुख श्मशान घाट; राजा हरिश्चंद्र की कथा से जुड़ा।
  • अस्सी घाट — नगर के दक्षिणी छोर पर; प्रातःकालीन आरती व शांत वातावरण के लिए जाना जाता है।
  • संकट मोचन हनुमान मंदिर — तुलसीदास से जुड़ा प्रसिद्ध हनुमान मंदिर।
  • सारनाथ — जहाँ बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया; नगर से कुछ ही दूरी पर।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र। घाटों की सीढ़ियाँ प्रायः गीली व फिसलन भरी रहती हैं — पकड़ वाले जूते-चप्पल पहनें।

ठहरने की व्यवस्था: काशी में धर्मशालाओं से लेकर घाट-किनारे के होटलों तक हर प्रकार की व्यवस्था है। घाट के पास ठहरना सुविधाजनक रहता है, क्योंकि पुराने नगर में वाहन नहीं जाते।

एक नज़र में

प्रकारनगर
स्थानवाराणसी
ज़िलावाराणसी
राज्यउत्तर प्रदेश

काशी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न