तिरु मणिमाड कोविल

Thirumanimada Koil, Thirunangur

तिरुनांगूर का वह दिव्य देशम जहाँ गरुड सेवै समाप्त होती है — और जहाँ परंपरा के अनुसार बद्री के नारायण आकर बसे।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
नारायण पेरुमाल (बद्रीनारायण)
थायार
पुंडरीकवल्लि

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरु मणिमाड कोविल शिरकाळि के पास **तिरुनांगूर** के ग्यारह दिव्य देशम में से एक है। यहाँ विष्णु **नारायण पेरुमाल** रूप में विराजते हैं — जिन्हें **बद्रीनारायण पेरुमाल** भी कहा जाता है — देवी **पुंडरीकवल्लि** के साथ। मूर्ति बैठी मुद्रा में है।

**दो बातें इस मंदिर को अलग करती हैं।**

**पहली** — परंपरा कहती है कि **बद्री के नारायण** यहाँ आकर ग्यारह रूपों में से एक बने। यानी उत्तराखंड का वह बद्रीनाथ, जो चार धाम, छोटा चार धाम, पंच बद्री और दिव्य देशम — चारों में है — कथा के सूत्र से इस छोटे तमिल गाँव तक पहुँचता है।

**दूसरी** — **गरुड सेवै का समापन यहीं होता है।** तै मास में जब तिरुमंगै आळ्वार अपनी पत्नी कुमुदवल्लि के साथ पालकी में तिरुनांगूर के ग्यारह दिव्य देशम की परिक्रमा करते हैं, तो अंत में वे इसी नारायण पेरुमाल के मंदिर पहुँचते हैं।

परंपरा में यहाँ के नारायण को उस दीपक की तरह देखा जाता है जो संसार में ज्ञान फैलाता है।

  • तिरुनांगूर के ग्यारह दिव्य देशम में से एक; गरुड सेवै का समापन यहीं होता है।
  • परंपरा: बद्री के नारायण यहाँ आकर ग्यारह रूपों में से एक बने।
  • विष्णु यहाँ नारायण/बद्रीनारायण पेरुमाल, बैठी मुद्रा में; देवी पुंडरीकवल्लि।
  • परंपरा में यहाँ के नारायण को ज्ञान फैलाने वाले दीपक के रूप में देखा जाता है।

पौराणिक कथा

तिरुनांगूर के ग्यारह की साझा कथा तिरु अरिमेय विण्णगरम् के पृष्ठ पर है। यहाँ इस स्थान के अपने दो सूत्र हैं।

बद्री से यहाँ तक

परंपरा कहती है कि यहाँ के नारायण **बद्री से आए** — यानी वही बद्रीनारायण, जिनका धाम हिमालय में अलकनंदा के तट पर है।

यह जोड़ ध्यान देने योग्य है। बद्रीनाथ इस साइट पर चार समूहों का सदस्य है — चार धाम, छोटा चार धाम, पंच बद्री और दिव्य देशम। और यहाँ, दो हज़ार किलोमीटर दक्षिण में, एक छोटे तमिल गाँव की परंपरा उसी नाम को अपने साथ जोड़ लेती है।

भूगोल दोनों को बहुत दूर रखता है। कथा उन्हें पास ले आती है।

जहाँ यात्रा समाप्त होती है

तै मास की गरुड सेवै में तिरुमंगै आळ्वार अपनी पत्नी कुमुदवल्लि नाच्चियार के साथ पालकी में तिरुनांगूर के ग्यारह दिव्य देशम से होकर जाते हैं।

अंत में वे इसी मंदिर पहुँचते हैं।

यानी यह वह स्थान है जहाँ वह वार्षिक यात्रा पूरी होती है — ग्यारह मंदिर, एक कवि, और अंत में यहाँ।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्रोतों से, 2026-08-05. ग्यारहों की साझा कथा हेतु देखें तिरु अरिमेय विण्णगरम्।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। गरुड सेवै के दिन यहाँ भीड़ सबसे अधिक रहती है, क्योंकि यात्रा का समापन यहीं होता है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: शिरकाळि रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।

रेल मार्ग

शिरकाळि रेलवे स्टेशन

शिरकाळि से तिरुनांगूर पास ही है।

सड़क मार्ग

तिरुनांगूर

ग्यारह मंदिर आसपास ही हैं और एक दिन में किए जा सकते हैं।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। तै मास की गरुड सेवै का समापन यहीं होता है — वह अवसर विशेष है, पर तब भीड़ सबसे अधिक रहती है।

प्रमुख त्योहार

  • गरुड सेवै (तै मास) — समापन यहीं

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • तिरुनांगूर के अन्य दस दिव्य देशम — ग्यारहों पास-पास हैं।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प शिरकाळि व मयिलाडुतुरै में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री नारायण पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुनांगूर, शिरकाळि के निकट
ज़िलामयिलाडुतुरै
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरु मणिमाड कोविल — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न