तिरुक्करंबनूर

Uthamar Koil (Purushothaman Perumal Temple), Tiruchirappalli

वह विरल मंदिर जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों अपनी-अपनी देवियों के साथ एक ही परिसर में विराजते हैं।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
पुरुषोत्तमन् पेरुमाल
थायार
पूर्णवल्लि थायार

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार तथा अन्य आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुक्करंबनूर — जिसे **उत्तमर् कोविल** और **पिच्चांडार् कोविल** भी कहा जाता है — **श्रीरंगम् से केवल दो किलोमीटर** और तिरुचिरापल्ली से सात किलोमीटर दूर है।

यहाँ विष्णु **पुरुषोत्तमन् पेरुमाल** रूप में विराजते हैं और देवी **पूर्णवल्लि** उनके साथ हैं।

**पर यह मंदिर केवल विष्णु का नहीं है — और यही इसकी सबसे असाधारण बात है।**

**यहाँ त्रिमूर्ति तीनों, अपनी-अपनी देवियों सहित, एक ही परिसर में हैं:**

- **विष्णु** और **लक्ष्मी** (पूर्णवल्लि) - **शिव** और **पार्वती** (वडिवुडैअम्मन्) - **ब्रह्मा** और **सरस्वती**

इन्हें सामूहिक रूप से **"मुम्मूर्तिगळ्"** कहा जाता है — *तीनों मूर्तियाँ*।

भारत में ऐसे मंदिर बहुत थोड़े हैं जहाँ तीनों एक ही परिसर में प्रतिष्ठित हों।

**ब्रह्मा का यहाँ होना विशेष रूप से उल्लेखनीय है।**

ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं, पर उनके मंदिर भारत में लगभग नहीं मिलते। दक्षिण भारत में व्यापक मान्यता है कि **ब्रह्मा की पूजा केवल दो स्थानों पर होती है — राजस्थान का पुष्कर, और यह मंदिर।**

(⚠️ यह मान्यता पूरे भारत पर दावा करती है और हम इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं कर सके; इसलिए इसे परंपरा के कथन के रूप में दर्ज कर रहे हैं।)

**यह मंदिर एक और कारण से पढ़ने योग्य है।**

इस पूरी सूची में शैव और वैष्णव परंपराओं का मेल बार-बार दिखा है — **तिरुक्कंडियूर** में विष्णु ने शिव को ब्रह्महत्या-दोष से मुक्त किया, **नाथन् कोइल** में शिव के वाहन नंदी को शाप से, और **तलैच्चंग नान्मदियम्** में विष्णु स्वयं शिव की तरह चंद्र-कला धारण करते हैं।

यहाँ वह मेल अपने सबसे पूर्ण रूप में है। कोई किसी को मुक्त नहीं कर रहा, कोई किसी का चिह्न धारण नहीं कर रहा।

**तीनों बस साथ खड़े हैं।**

⚠️ **एक भ्रम टाल लें:** तिरुनांगूर के **तिरु वण् पुरुषोत्तमम्** के देवता भी पुरुषोत्तमन् कहलाते हैं। दोनों अलग दिव्य देशम हैं।

  • ब्रह्मा, विष्णु व शिव — तीनों अपनी-अपनी देवियों सहित एक ही परिसर में।
  • तीनों को सामूहिक रूप से "मुम्मूर्तिगळ्" कहा जाता है।
  • मान्यता: ब्रह्मा की पूजा केवल दो स्थानों पर — पुष्कर और यहाँ।
  • श्रीरंगम् से केवल दो किलोमीटर — प्रथम दिव्य देशम के साथ ही देखा जा सकता है।
  • शैव-वैष्णव सामंजस्य का सबसे पूर्ण रूप — यहाँ कोई किसी को मुक्त नहीं कर रहा, तीनों साथ हैं।

पौराणिक कथा

यहाँ कहने योग्य बात कोई एक घटना नहीं — वह संरचना है।

तीनों, एक ही प्राकार में

भारत के मंदिर प्रायः किसी एक देवता के होते हैं। विष्णु के मंदिर में शिव की सन्निधि हो सकती है, या शिव के मंदिर में विष्णु की — पर प्रधानता एक की ही रहती है।

**यहाँ तीनों प्रतिष्ठित हैं, और तीनों अपनी-अपनी देवियों के साथ।**

विष्णु के साथ लक्ष्मी (पूर्णवल्लि)। शिव के साथ पार्वती (वडिवुडैअम्मन्)। और ब्रह्मा के साथ सरस्वती।

तीनों को मिलाकर **मुम्मूर्तिगळ्** कहा जाता है।

यह इस सूची में उस स्वर का चरम है जो पूरे कावेरी-क्षेत्र में सुनाई देता रहा है।

**तिरुक्कंडियूर** में विष्णु ने शिव को ब्रह्महत्या-दोष से मुक्त किया — वहाँ एक दूसरे को शरण दे रहा था।

**नाथन् कोइल** में उन्होंने शिव के वाहन को शाप से मुक्त किया — और भेजने वाले स्वयं शिव थे।

**तलैच्चंग नान्मदियम्** में विष्णु ने शिव का ही चिह्न, चंद्र-कला, अपने मस्तक पर धारण कर लिया।

यहाँ इनमें से कुछ नहीं हो रहा। कोई किसी को बचा नहीं रहा, कोई किसी का चिह्न नहीं ले रहा।

तीनों बस साथ खड़े हैं — और किसी को कुछ सिद्ध नहीं करना है।

ब्रह्मा, जिनके मंदिर नहीं होते

त्रिमूर्ति में **ब्रह्मा** सृष्टिकर्ता हैं — जिनसे सब कुछ आरंभ होता है।

पर भारत भर में उनके मंदिर लगभग नहीं मिलते। विष्णु के सैकड़ों हैं, शिव के हज़ारों। ब्रह्मा के गिने-चुने।

दक्षिण भारत में व्यापक मान्यता है कि **ब्रह्मा की पूजा केवल दो स्थानों पर होती है** — राजस्थान का **पुष्कर**, और **यह मंदिर**।

(⚠️ यह दावा पूरे भारत पर है और हम इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं कर सके, इसलिए इसे परंपरा का कथन मानकर दर्ज कर रहे हैं।)

पुराणों में इसके कई कारण बताए जाते हैं, और उनमें से एक इसी सूची में आ चुका है — **तिरुक्कंडियूर** की कथा, जहाँ ब्रह्मा के अभिमान पर शिव ने उनका मध्य शीश काट दिया था।

यानी जिस अभिमान की सज़ा एक मंदिर की कथा में मिलती है, उसी देवता को दूसरा मंदिर, उसी क्षेत्र में, अपनी देवी के साथ बिठा लेता है।

दोनों मंदिर लगभग एक ही भूभाग में हैं।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर श्रीरंगम् से केवल दो किलोमीटर है, इसलिए दोनों एक ही दिन में सुविधा से किए जा सकते हैं।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन · 7 किमी

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

नगर के पास; पहुँच सरल।

रेल मार्ग

तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन — लगभग 7 किमी

वहाँ से लगभग 7 किमी।

सड़क मार्ग

श्रीरंगम् — लगभग 2 किमी

श्रीरंगम् से केवल 2 किमी; ऑटो व स्थानीय बस उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब मौसम सबसे अनुकूल रहता है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • श्रीरंगम् (लगभग 2 किमी) — प्रथम दिव्य देशम — केवल दो किलोमीटर दूर।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के पर्याप्त विकल्प तिरुचिरापल्ली व श्रीरंगम् में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री पुरुषोत्तमन् पेरुमाल मंदिर (उत्तमर् कोविल)
स्थानतिरुक्करंबनूर, श्रीरंगम् से 2 किमी, तिरुचिरापल्ली से 7 किमी
ज़िलातिरुचिरापल्ली
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुक्करंबनूर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न