तिरुक्कवितलम्

Gajendra Varadha Perumal Temple, Kabisthalam

वह दिव्य देशम जहाँ गजेंद्र की पुकार सुनी गई — और जिसका नाम एक वानर पर पड़ा।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
गजेंद्र वरद पेरुमाल
थायार
रमणवल्लि

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुक्कवितलम् — जिसे **कबिस्थलम्** भी कहा जाता है — तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले में है। यहाँ विष्णु **गजेंद्र वरद** रूप में विराजते हैं और देवी **रमणवल्लि** उनके साथ हैं।

**नाम स्वयं वह बताता है जो यह मंदिर है।** "गजेंद्र वरद" का अर्थ है *गजेंद्र को वरदान देने वाले*।

**यह गजेंद्र मोक्ष का स्थल है** — वही कथा जो भागवत में है, और जो वैष्णव परंपरा की सबसे प्रिय कथाओं में गिनी जाती है: एक हाथी जो ग्राह के चंगुल में फँसा, और जिसकी पुकार पर विष्णु स्वयं दौड़े आए।

**दूसरा नाम — कबिस्थलम् — एक और प्रसंग से आया है।** तमिल में **"कबि" का अर्थ है वानर**, और परंपरा कहती है कि **हनुमान** ने यहाँ विष्णु की पूजा की थी। स्थान का नाम वहीं से पड़ा।

स्थल-स्रोत कहते हैं कि **108 में यह अकेला दिव्य देशम है जहाँ भगवान ने दो पशुओं को दर्शन दिए** — एक वानर को और एक हाथी को। यह दावा परंपरा का है और हम इसे उसी रूप में दर्ज कर रहे हैं।

यह **पंच कृष्ण क्षेत्रों** में से भी एक है।

⚠️ **एक भ्रम टाल लेना चाहिए।** तिरुनांगूर के **तिरु कवलंपाडि** में भी एक हाथी की रक्षा की कथा है, पर वह कृष्ण की अलग स्थानीय कथा है। **गजेंद्र मोक्ष का स्थल यह है।**

  • गजेंद्र मोक्ष का स्थल — भागवत की वह कथा जहाँ विष्णु हाथी की पुकार पर आए।
  • नाम कबिस्थलम् — तमिल "कबि" यानी वानर; परंपरा में हनुमान ने यहाँ पूजा की।
  • स्थल-परंपरा: 108 में अकेला मंदिर जहाँ दो पशुओं को दर्शन मिले — वानर व हाथी।
  • पंच कृष्ण क्षेत्रों में से एक।
  • आडि मास (जुलाई–अगस्त) का गजेंद्र मोक्ष लीला यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव।

पौराणिक कथा

यहाँ की मुख्य कथा गजेंद्र की है — और वह एक शाप से शुरू होती है, हाथी से नहीं।

राजा जो हाथी बन गया

परंपरा कहती है कि राजा **इंद्रद्युम्न** विष्णु के अनन्य भक्त थे। ध्यान में बैठते तो अपने आप को भूल जाते थे।

एक बार वे गहरे ध्यान में थे, और तभी **दुर्वासा ऋषि** उनसे मिलने आए।

ऋषि प्रतीक्षा करते रहे। फिर धैर्य खोकर राजा के सामने जा खड़े हुए। राजा तब भी नहीं उठे — उन्हें पता ही नहीं था।

दुर्वासा क्रुद्ध हो गए और शाप दे दिया कि राजा **हाथी** बन जाएँ।

यह कथा का वह हिस्सा है जो प्रायः भुला दिया जाता है। गजेंद्र कोई साधारण पशु नहीं था। वह एक भक्त था, जिसे उसकी भक्ति में डूबे रहने की ही सज़ा मिली थी।

आदिमूलम्

हाथी बने राजा एक दिन सरोवर में उतरे, और वहाँ एक **ग्राह** ने उनका पैर पकड़ लिया।

संघर्ष लंबा चला। हाथी का बल घटता गया।

अंत में उसने वह पुकार लगाई जिसके लिए यह कथा याद की जाती है — **"आदिमूलम्"**, यानी *हे आदि मूल*।

विष्णु ने अपना चक्र भेजा। ग्राह मारा गया।

और फिर वह हुआ जो कथा का सबसे सुंदर अंश है — **हाथी और ग्राह, दोनों** विष्णु की कृपा से अपने मानव रूप में लौट आए।

जो बचाया गया वह भी मुक्त हुआ, और जिससे बचाया गया वह भी।

पुकार में हाथी ने अपना नाम नहीं लिया, अपनी भक्ति नहीं गिनाई, अपना राजा होना नहीं बताया। उसने केवल उसे पुकारा जो सबका मूल है। और वही पर्याप्त था।

और एक वानर

इस स्थान का दूसरा नाम **कबिस्थलम्** है। तमिल में "कबि" का अर्थ है वानर।

परंपरा कहती है कि **हनुमान** ने यहाँ विष्णु की पूजा की थी, और नाम वहीं से पड़ा।

स्थल-स्रोत इसी से एक बात कहते हैं — कि 108 दिव्य देशम में यह अकेला ऐसा स्थान है जहाँ भगवान ने **दो पशुओं** को दर्शन दिए: एक वानर को, एक हाथी को।

दावा परंपरा का है; हम इसे उसी रूप में रख रहे हैं।

पर भाव देखने लायक़ है। जिस मंदिर के दोनों नाम पशुओं से जुड़े हों — एक हाथी से, एक वानर से — उसमें यह बात अपने आप कही जा रही है कि पुकारने के लिए मनुष्य होना आवश्यक नहीं।

स्रोत: स्थल-परंपरा व भागवत की गजेंद्र मोक्ष कथा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर कुंभकोणम् व तंजावुर के बीच है और क्षेत्र के अन्य दिव्य देशम के साथ किया जा सकता है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: कुंभकोणम् रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।

रेल मार्ग

कुंभकोणम् रेलवे स्टेशन

वहाँ से कबिस्थलम् सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है।

सड़क मार्ग

कबिस्थलम्

कुंभकोणम्–तंजावुर मार्ग पर; स्थानीय बस उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी सबसे सुविधाजनक है। आडि मास (जुलाई–अगस्त) में गजेंद्र मोक्ष लीला होती है — वही यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है, पर तब वर्षा-ऋतु रहती है।

प्रमुख त्योहार

  • गजेंद्र मोक्ष लीला (आडि मास, जुलाई–अगस्त)

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • कुंभकोणम् के दिव्य देशम — तिरुक्कुडंतै, तिरु विण्णगर, तिरुनारायूर।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प कुंभकोणम् व तंजावुर में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री गजेंद्र वरद पेरुमाल मंदिर
स्थानकबिस्थलम्, कुंभकोणम् व तंजावुर के बीच
ज़िलातंजावुर
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुक्कवितलम् — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न