दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — तिरुमंगै आळ्वार तथा अन्य आळ्वार
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरुप्पेर नगर — आज **कोविलाडि** — तिरुचिरापल्ली से लगभग **सोलह किलोमीटर** दूर, **कावेरी** के तट पर है। यहाँ विष्णु **अप्पक्कुडत्तान् पेरुमाल** रूप में विराजते हैं।
**यह पंचरंग क्षेत्रों में से एक है** — कावेरी तट के वे पाँच रंगनाथ-क्षेत्र जिन्हें एक साथ गिना जाता है। इस सूची में **श्रीरंगम्** (आदि), **तिरुक्कुडंतै** (मध्य) और **तिरु इंदळूर** (अंत्य) पहले आ चुके हैं।
**पर यहाँ की सबसे विशिष्ट बात रसोई में है।**
स्रोत कहते हैं कि यह **अकेला दिव्य देशम** है जहाँ **प्रति रात्रि नेय्याप्पम्** — घी का अप्पम — नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। (यह दावा 108 पर है; हम इसे परंपरा के कथन के रूप में दर्ज कर रहे हैं।)
और भगवान का नाम भी वहीं से आया। **"अप्पक्कुडत्तान्"** का अर्थ है — *अप्पम का घड़ा अपने पास रखने वाले*।
**कथा एक शाप और एक परीक्षा की है।**
परंपरा कहती है कि राजा **उपमन्यु** ने ऋषि **दुर्वासा** के शाप से अपनी शक्तियाँ खो दीं। क्षमा माँगने पर ऋषि ने कहा कि इस स्थान पर — तब इसे **पलाशवनम्** कहा जाता था — **एक लाख लोगों को भोजन** कराओ, तभी शाप से मुक्ति मिलेगी।
राजा ने पास ही एक भवन बनवाया और भोजन कराना आरंभ किया।
एक दिन **नारायण स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण** के वेश में वहाँ आए — और राजा के संकल्प की परीक्षा लेने के लिए **उस दिन का सारा भोजन अकेले खा गए**।
- पंचरंग क्षेत्रों में से एक — कावेरी तट के पाँच में।
- स्रोतों के अनुसार अकेला दिव्य देशम जहाँ प्रति रात्रि नेय्याप्पम् अर्पित होता है।
- नाम की व्युत्पत्ति — अप्पक्कुडत्तान् यानी अप्पम का घड़ा साथ रखने वाले।
- उपमन्यु को दुर्वासा के शाप से मुक्ति का स्थान।
- विष्णु वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए और एक दिन का सारा भोजन अकेले खा गए।
पौराणिक कथा
यहाँ की कथा एक शाप से शुरू होती है, और एक भूखे वृद्ध पर आकर रुकती है।
एक लाख को भोजन
परंपरा कहती है कि राजा **उपमन्यु** ने ऋषि **दुर्वासा** के शाप से अपनी शक्तियाँ खो दीं।
जब उन्होंने क्षमा माँगी, तो ऋषि ने प्रायश्चित्त बताया — इस स्थान पर, जिसे तब **पलाशवनम्** कहा जाता था, **एक लाख लोगों को भोजन** कराओ।
राजा ने पास ही एक भवन बनवाया और भोजन कराना आरंभ कर दिया।
दुर्वासा का नाम इस सूची में दूसरी बार आ रहा है। कबिस्थलम् की गजेंद्र-कथा भी उन्हीं के शाप से शुरू होती है, जहाँ राजा इंद्रद्युम्न हाथी बन गए थे।
दोनों जगह वही ढाँचा है — एक भक्त राजा, एक क्रुद्ध ऋषि, और एक लंबा प्रायश्चित्त।
जो सब कुछ खा गया
एक दिन एक **वृद्ध ब्राह्मण** वहाँ आया।
वे नारायण थे — पर किसी ने नहीं पहचाना।
और उन्होंने राजा के संकल्प की परीक्षा लेने के लिए **उस दिन का सारा भोजन अकेले खा लिया**। जो एक लाख के लिए बन रहा था, उसमें से उस दिन का सब।
यह प्रसंग इस सूची में दो और कथाओं से जुड़ता है, और तीनों में एक ही बात है।
**तिरुवळ्ळूर** में सालिहोत्र ने एक वर्ष का उपवास तोड़ने से पहले अपना सारा भोजन एक वृद्ध ब्राह्मण को दे दिया था। **तिरुक्कण्णनकुडि** में वसिष्ठ की बनाई मक्खन की मूर्ति को कृष्ण बालक बनकर खा गए थे।
तीनों जगह भगवान भूखे आते हैं। और तीनों जगह वे लेने आते हैं, देने नहीं।
भक्ति-परंपरा में यह भाव बार-बार लौटता है — कि सबसे बड़ी परीक्षा तब आती है जब देने वाले के पास बस उतना ही बचा हो।
और यहाँ उसी की स्मृति में आज तक हर रात **नेय्याप्पम्** चढ़ाया जाता है। मंदिर का नाम ही उस अप्पम के घड़े पर है।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। ⚠️ नेय्याप्पम् का नैवेद्य **रात्रि** में होता है, इसलिए वह देखना हो तो सायंकाल के सत्र में जाना होगा।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग एक घंटा।
रेल मार्ग
तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन — लगभग 16 किमी
वहाँ से लगभग 16 किमी।
सड़क मार्ग
कोविलाडि
तिरुचिरापल्ली–तंजावुर मार्ग पर; स्थानीय बस उपलब्ध।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब मौसम सबसे अनुकूल रहता है।
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- तिरुवरंगम् — श्रीरंगम्, तमिलनाडु
- तिरुक्कुडंतै — कुंभकोणम्, तमिलनाडु
- श्रीरंगम् — प्रथम दिव्य देशम; यह भी पंचरंग क्षेत्रों में है।
