तिरुवेळ्ळियंकुडि

Kolavalvil Ramar Temple, Thiruvelliyangudi

वह दिव्य देशम जहाँ असुरों के गुरु शुक्राचार्य को खोई हुई दृष्टि वापस मिली — और जहाँ गरुड के चार हाथ हैं।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
कोल वल्विल्लि रामर
थायार
मरगतवल्लि

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुवेळ्ळियंकुडि तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले में है और 108 दिव्य देशम में **सत्रहवाँ** गिना जाता है। यहाँ विष्णु **कोल वल्विल्लि रामर** रूप में विराजते हैं — यानी *धनुष धारण किए राम* — और देवी **मरगतवल्लि** उनके साथ हैं।

**यह शुक्र स्थलम् है।** परंपरा कहती है कि असुरों के गुरु **शुक्राचार्य** ने यहीं अपनी खोई हुई दृष्टि पुनः पाई। इसीलिए इस मंदिर को **नेत्र मूर्ति कोइल** भी कहा जाता है।

वह दृष्टि गई कैसे थी, यह कथा वामन-अवतार से जुड़ती है (नीचे विस्तार से)।

**दूसरी असाधारण बात यहाँ के गरुड हैं।**

अधिकांश मंदिरों में गरुड के दो हाथ होते हैं। **यहाँ चार हैं।**

कारण कथा में है। जब भगवान शुक्राचार्य के समक्ष प्रकट होने वाले थे, तो वे उन्हें अपने आयुधों के दर्शन भी कराना चाहते थे — पर साथ ही **धनुषधारी राम** के रूप में आना चाहते थे।

दोनों एक साथ कैसे हों?

उन्होंने अपने **शंख और चक्र अपने वाहन गरुड को थमा दिए**, और स्वयं धनुष लेकर खड़े हुए।

इसीलिए यहाँ के भगवान **कोल वल्विल्लि रामर** कहलाते हैं, और गरुड के चार हाथ हैं — दो अपने, और दो में स्वामी के आयुध।

  • शुक्र स्थलम् — परंपरा के अनुसार शुक्राचार्य ने यहीं खोई दृष्टि पुनः पाई।
  • नेत्र मूर्ति कोइल — नाम उसी दृष्टि-पुनर्प्राप्ति पर।
  • चतुर्भुज गरुड — विरल; दो हाथों में भगवान के शंख व चक्र।
  • भगवान धनुषधारी राम रूप में — इसीलिए कोल वल्विल्लि रामर।
  • 108 में सत्रहवाँ दिव्य देशम; देवी मरगतवल्लि।

पौराणिक कथा

यह कथा वामन-अवतार के उसी प्रसंग से आती है जो काऴिच्चीराम विण्णगरम् पर है — पर वहाँ भगवान के पक्ष से, और यहाँ उस गुरु के पक्ष से जिसने उन्हें रोकने की कोशिश की थी।

जिसने अपने शिष्य को बचाना चाहा

राजा **बलि** दानवीर थे, और उनके गुरु थे **शुक्राचार्य** — असुरों के आचार्य।

जब वामन रूप में विष्णु बलि के पास तीन डग भूमि माँगने आए, तो शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह कौन है और यह माँग क्या कर देगी।

उन्होंने बलि को रोका। पर बलि ने वचन दे दिया था, और वे पीछे हटने वाले नहीं थे।

दान की विधि में जल छोड़ना आवश्यक था — संकल्प का जल। शुक्राचार्य ने अंतिम प्रयास किया: वे **भ्रमर बनकर** उस पात्र के मुख में जा बैठे, जिससे जल गिरना था, और धारा रोक दी।

धारा रुकी। और उसे खोलने के लिए पात्र के मुख में कुश की सींक डाली गई।

उसी से शुक्राचार्य की आँख को चोट लगी।

यह प्रसंग प्रायः असुर-गुरु की चालाकी की तरह सुनाया जाता है। पर एक बार दूसरी ओर से देखिए — वे अपने शिष्य को उस हानि से बचाने की कोशिश कर रहे थे जो उन्हें दिख रही थी और शिष्य को नहीं। गुरु का यही धर्म भी था।

जहाँ दृष्टि लौटी

परंपरा कहती है कि शुक्राचार्य ने यहीं अपनी खोई हुई दृष्टि **पुनः पाई**।

और यह सोचने योग्य है कि लौटाई किसने।

जिनके कारण दृष्टि गई थी, उन्हीं के दर्शन से वह लौटी।

भक्ति-परंपरा में यह भाव बार-बार आता है — जिसने रोका, उसे भी दंड नहीं मिलता, उपचार मिलता है। बलि को भी विष्णु ने पाताल का राज्य और अपना द्वारपाल-रूप दिया था, कोई सज़ा नहीं।

इसीलिए इस मंदिर का एक नाम **नेत्र मूर्ति कोइल** है, और यह **शुक्र स्थलम्** माना जाता है।

गरुड के चार हाथ

जब भगवान शुक्राचार्य के समक्ष प्रकट होने वाले थे, तब एक कठिनाई थी।

वे उन्हें अपने **आयुधों** — शंख और चक्र — के दर्शन कराना चाहते थे। पर साथ ही **धनुषधारी राम** के रूप में आना चाहते थे।

हाथ चार ही हैं, और धनुष के लिए दो चाहिए।

उन्होंने शंख और चक्र **गरुड को थमा दिए**।

इसीलिए यहाँ के गरुड के **चार हाथ** हैं — दो अपने, और दो में स्वामी के आयुध। और भगवान **कोल वल्विल्लि रामर** कहलाते हैं, धनुष वाले राम।

यह छोटा-सा विवरण है, पर इसमें एक बात है। वाहन केवल ढोता नहीं — यहाँ वह वह भी सँभाल रहा है जो स्वामी के हाथ से छूटा है, ताकि स्वामी वह रूप ले सके जो वे लेना चाहते थे।

स्रोत: स्थल-परंपरा व वामन-अवतार का बलि-प्रसंग; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। शुक्रवार को यहाँ विशेष भीड़ रहती है, क्योंकि यह शुक्र स्थलम् माना जाता है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: कुंभकोणम् रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।

रेल मार्ग

कुंभकोणम् रेलवे स्टेशन

वहाँ से सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है।

सड़क मार्ग

कुंभकोणम्

स्थानीय बस व ऑटो उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। शुक्र स्थलम् होने के कारण शुक्रवार को विशेष महत्व माना जाता है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • कुंभकोणम् के दिव्य देशम — तिरुक्कुडंतै, तिरु विण्णगर, तिरुनारायूर, तिरुच्चेरै।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प कुंभकोणम् में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री कोल वल्विल्लि रामर पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुवेळ्ळियंकुडि, कुंभकोणम् के निकट
ज़िलातंजावुर
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुवेळ्ळियंकुडि — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न