मयूरेश्वर

Mayureshwar Temple, Morgaon

अष्टविनायक का पहला मंदिर — और अंतिम भी, क्योंकि यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक यहाँ लौटा न जाए।

यह स्थान इनमें भी है:अष्टविनायक

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

मोरगाँव पुणे ज़िले में है और अष्टविनायक यात्रा यहीं से आरंभ होती है। पर इसका महत्व केवल पहला होने में नहीं — **यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक आठों के दर्शन के बाद पुनः यहाँ न लौटा जाए।** यानी यह पहला भी है और नौवाँ भी।

प्रतिमा काले पत्थर की है और उसकी सूँड़ बाईं ओर मुड़ी है। सबसे विशिष्ट बात यह है कि उसके ऊपर **नागराज का फन छाया किए हुए है** — जैसे रक्षा कर रहा हो। यह अष्टविनायक की किसी और प्रतिमा में नहीं है।

यहाँ गणेश का रूप **मयूरेश्वर** है — मयूर पर सवार। नाम गाँव को भी मिला: मोरगाँव, यानी मोर का गाँव।

  • अष्टविनायक यात्रा का पहला और अंतिम पड़ाव — लौटे बिना यात्रा पूरी नहीं मानी जाती।
  • प्रतिमा पर नागराज का फन छाया किए हुए है — आठों में केवल यहाँ।
  • गणेश यहाँ मयूरेश्वर हैं, मयूर पर सवार; गाँव का नाम भी वहीं से।
  • सूँड़ बाईं ओर; प्रतिमा काले पत्थर की।
  • बहमनी काल में बना; निर्माण का श्रेय बीदर के सुल्तान के दरबार के एक सरदार गोले को दिया जाता है।

पौराणिक कथा

मोरगाँव की कथा एक असुर के वध की है, और उस रूप की जो गणेश ने उसके लिए धरा।

सिंधु का वध

कथा कहती है कि सिंधु नामक असुर ने तीनों लोकों को त्रस्त कर रखा था। देवताओं की प्रार्थना पर गणेश ने उसका वध करने का निश्चय किया।

इस युद्ध के लिए उन्होंने मयूर को वाहन बनाया — और इसी रूप में वे **मयूरेश्वर** कहलाए।

गणेश का सामान्य वाहन मूषक है, जो सबसे छोटे प्राणियों में है। यहाँ उन्होंने मयूर चुना। परंपरा में वाहन केवल सवारी नहीं होता, वह उस रूप का स्वभाव बताता है — और जिस काम के लिए यह रूप धरा गया, उसके लिए मूषक पर्याप्त नहीं था।

स्रोत: स्थल-परंपरा (मुद्गल पुराण की परंपरा से); विवरण en.wikipedia.org/wiki/Ashtavinayaka से सत्यापित

इतिहास

बहमनी काल का निर्माण

वर्तमान मंदिर बहमनी शासन-काल में काले पत्थर से बना। निर्माण का श्रेय बीदर के सुल्तान के दरबार के एक सरदार को दिया जाता है, जिनका नाम गोले बताया जाता है।

मंदिर के चारों ओर ऊँची दीवार है, जो उसे किसी दुर्ग जैसा रूप देती है — उस काल के निर्माण की एक सामान्य विशेषता।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Ashtavinayaka — 2026-08-04 को देखा गया

दर्शन का समय

मोरगाँव मंदिर के लिए कोई आधिकारिक दर्शन-समय या आरती-तालिका प्रकाशित नहीं होती।

मंदिर सामान्यतः प्रातःकाल से सायंकाल तक दर्शन हेतु खुला रहता है। गणेश चतुर्थी व माघी गणेश जयंती पर व्यवस्था बदल जाती है और भीड़ बहुत बढ़ती है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: पुणे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: पुणे जंक्शन

हवाई मार्ग

पुणे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

पुणे से मोरगाँव तक सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।

रेल मार्ग

पुणे जंक्शन

पुणे से आगे सड़क मार्ग से जाना होता है। बारामती स्टेशन भी एक विकल्प है।

सड़क मार्ग

मोरगाँव

पुणे से बारामती मार्ग पर; सड़क मंदिर तक जाती है।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई सीढ़ी या चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब महाराष्ट्र में मौसम अनुकूल रहता है। गणेश चतुर्थी (भाद्रपद) और माघी गणेश जयंती पर विशेष उत्सव होता है, पर भीड़ भी बहुत रहती है।

प्रमुख त्योहार

  • गणेश चतुर्थी
  • माघी गणेश जयंती

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • कऱ्हा नदी — मंदिर इसी नदी के तट पर है।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: मोरगाँव में व्यवस्था सीमित है; अधिकांश यात्री पुणे अथवा बारामती में ठहरते हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री मयूरेश्वर मंदिर
स्थानमोरगाँव, बारामती के निकट
ज़िलापुणे
राज्यमहाराष्ट्र

मयूरेश्वर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न