मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
रांजणगाँव पुणे ज़िले में है, पुणे-अहमदनगर मार्ग पर, और अष्टविनायक यात्रा का आठवाँ पड़ाव — पर अंतिम नहीं, क्योंकि यात्रा तब पूरी होती है जब यहाँ से पुनः मोरगाँव लौटा जाए।
प्रतिमा पूर्वाभिमुख है और पद्मासन में बैठी है, **चौड़े ललाट** के साथ। सूँड़ बाईं ओर मुड़ी है।
यहाँ गणेश **महागणपति** हैं — यह अष्टविनायक के आठ नामों में सबसे व्यापक नाम है। शेष सात नाम किसी कथा-प्रसंग से आए हैं: मयूरेश्वर मयूर से, बल्लाळेश्वर एक भक्त से, विघ्नेश्वर एक असुर से। यह नाम किसी प्रसंग से नहीं आया — यह केवल "महान गणपति" है।
यह अंत के लिए उपयुक्त लगता है। आठ पड़ावों की यात्रा जिन अलग-अलग रूपों से होकर गुज़रती है, वह अंत में उस नाम पर पहुँचती है जो सबको समेट लेता है।
- अष्टविनायक का आठवाँ पड़ाव; इसके बाद यात्री पुनः मोरगाँव लौटता है।
- प्रतिमा पूर्वाभिमुख, पद्मासन में, चौड़े ललाट के साथ; सूँड़ बाईं ओर।
- आठों में अकेला नाम जो किसी कथा-प्रसंग से नहीं आया — केवल "महान गणपति"।
- परंपरा के अनुसार शिव ने त्रिपुरासुर से युद्ध से पूर्व यहीं गणेश की पूजा की।
- मंदिर का निर्माण नवीं से दसवीं शताब्दी के बीच बताया जाता है।
- गर्भगृह पेशवा माधवराव ने बनवाया; 1790 में अन्याबा देव के अधीन पूजा की व्यवस्था हुई।
पौराणिक कथा
रांजणगाँव की कथा में गणेश की पूजा करने वाले उनके अपने पिता हैं।
त्रिपुरासुर से पहले
कथा कहती है कि त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों को त्रस्त कर रखा था और उसे परास्त करना किसी के वश में नहीं था।
शिव ने उससे युद्ध का निश्चय किया — पर उससे पहले उन्होंने यहीं गणेश की पूजा की।
इसके बाद ही वे त्रिपुरासुर का संहार कर सके, और इसी से वे त्रिपुरारि कहलाए।
यह प्रसंग अष्टविनायक की कथाओं की उस रचना को अपने शिखर पर ले जाता है जो सिद्धटेक में विष्णु के साथ दिखी थी। वहाँ विष्णु रुके थे, यहाँ शिव रुकते हैं — और शिव गणेश के पिता हैं।
परंपरा यह कहने से नहीं हिचकती कि आरंभ करने से पहले रुकना सबके लिए है, चाहे वह कोई भी हो। जो सबसे बड़ा है, वह भी।
मणिपुर से रांजणगाँव
कथा के अनुसार शिव ने इस स्थान को **मणिपुर** नाम दिया था। वही आगे चलकर रांजणगाँव कहलाया।
नाम बदल गया, पर स्थान वही रहा — और यह अष्टविनायक के कई स्थानों की साझा कथा है। मोरगाँव को नाम मयूर से मिला, सिद्धटेक को सिद्धि से। नाम प्रायः उस घटना से आते हैं जो वहाँ घटी।
स्रोत: स्थल-परंपरा (मुद्गल पुराण की परंपरा से); विवरण en.wikipedia.org/wiki/Ashtavinayaka से सत्यापित
इतिहास
रांजणगाँव अष्टविनायक के उन थोड़े मंदिरों में है जिनके लिए एक कालावधि बताई जाती है।
नवीं–दसवीं शताब्दी
मंदिर का निर्माण नवीं से दसवीं शताब्दी के बीच बताया जाता है — यानी यह अष्टविनायक के अधिकांश वर्तमान ढाँचों से पुराना है, जो मराठा काल के हैं।
पेशवा काल
गर्भगृह का निर्माण पेशवा माधवराव ने कराया। सन् 1790 में अन्याबा देव के अधीन यहाँ पूजा की औपचारिक व्यवस्था हुई।
पेशवा माधवराव का नाम थेऊर के चिंतामणि मंदिर से भी जुड़ा है — अष्टविनायक के दो मंदिरों में उनका योगदान दर्ज है।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Ashtavinayaka — 2026-08-04 को देखा गया
दर्शन का समय
रांजणगाँव मंदिर के लिए कोई आधिकारिक दर्शन-समय या आरती-तालिका प्रकाशित नहीं होती।
मंदिर सामान्यतः प्रातःकाल से सायंकाल तक दर्शन हेतु खुला रहता है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
पुणे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
पुणे से रांजणगाँव तक सड़क मार्ग से लगभग डेढ़ घंटा।
रेल मार्ग
पुणे जंक्शन
पुणे से सड़क मार्ग से आगे।
सड़क मार्ग
रांजणगाँव
पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर; सड़क मंदिर तक जाती है।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च। गणेश चतुर्थी व माघी गणेश जयंती पर विशेष उत्सव होता है।
प्रमुख त्योहार
- गणेश चतुर्थी
- माघी गणेश जयंती
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- मयूरेश्वर — बारामती के निकट, महाराष्ट्र
