तिरु वण् पुरुषोत्तमम्

Thiruvanpurushothamam, Thirunangur

तिरुनांगूर का वह दिव्य देशम जहाँ विष्णु उसी नाम से विराजते हैं जो गीता में उनका अपना दिया हुआ है — पुरुषोत्तम।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
पुरुषोत्तमन् पेरुमाल
थायार
पुरुषोत्तम नायगी
विमानम्
त्रि-तल विमान

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरु वण् पुरुषोत्तमम् शिरकाळि और तिरुवेण्काडु — दोनों से लगभग दस किलोमीटर दूर, **तिरुनांगूर** के ग्यारह दिव्य देशम में से एक है। यहाँ विष्णु **पुरुषोत्तमन्** रूप में विराजते हैं और देवी **पुरुषोत्तम नायगी**। दोनों मूर्तियाँ गर्भगृह में **खड़ी मुद्रा** में हैं।

मंदिर छोटा और सीधा है — एक गर्भगृह, चारों ओर आयताकार प्राकार-भित्ति, और गर्भगृह के ऊपर **तीन तल का विमान**।

**नाम ही यहाँ का सबसे बड़ा तथ्य है।**

"पुरुषोत्तम" का अर्थ है *पुरुषों में उत्तम*। यह कोई स्थानीय उपाधि नहीं — यह वह नाम है जो **भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय** में स्वयं कृष्ण अपने लिए कहते हैं। उस अध्याय का नाम ही **पुरुषोत्तम योग** है।

तिरुनांगूर के अधिकांश मंदिरों का नाम किसी घटना पर पड़ा है — कहीं हाथी की रक्षा पर, कहीं अर्जुन के दर्शन पर। यहाँ नाम किसी घटना का नहीं, स्वयं उस तत्त्व का है।

तिरुमंगै आळ्वार ने इसका मंगलाशासनम् किया।

  • तिरुनांगूर के ग्यारह दिव्य देशम में से एक।
  • देवता का नाम पुरुषोत्तम — वही नाम जो गीता के पंद्रहवें अध्याय में कृष्ण अपने लिए कहते हैं।
  • पेरुमाल व थायार दोनों खड़ी मुद्रा में।
  • गर्भगृह के ऊपर तीन तल का विमान; एक गर्भगृह, आयताकार प्राकार-भित्ति।
  • तिरुमंगै आळ्वार ने मंगलाशासनम् किया।

पौराणिक कथा

तिरुनांगूर के ग्यारह की साझा कथा तिरु अरिमेय विण्णगरम् के पृष्ठ पर है। यहाँ केवल नाम का भाव है।

जो नाम गीता ने दिया

"पुरुषोत्तम" का अर्थ है पुरुषों में उत्तम।

यह नाम कहीं और से नहीं आया। भगवद्गीता का **पंद्रहवाँ अध्याय** इसी नाम पर है — **पुरुषोत्तम योग** — और उसमें कृष्ण स्वयं कहते हैं कि क्षर और अक्षर, दोनों से परे जो है, वही पुरुषोत्तम कहलाता है।

तिरुनांगूर के बाक़ी मंदिरों के नाम किसी घटना पर पड़े हैं। तिरु कवलंपाडि का नाम एक हाथी की रक्षा पर, तिरु पार्थन्पळ्ळि का अर्जुन के दर्शन पर, तिरु सेंपोन् सेइ कोविल का उस सोने पर जिससे मंदिर बना।

यहाँ नाम किसी घटना का नहीं है। यह उस तत्त्व का नाम है जिसे गीता परिभाषित करती है — और मंदिर उसी को खड़ा कर देता है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Thiruvanpurushothamam से. ग्यारहों की साझा कथा हेतु देखें तिरु अरिमेय विण्णगरम्।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। तिरुनांगूर के ग्यारह मंदिर पास-पास हैं और प्रायः एक ही दिन में किए जाते हैं।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: शिरकाळि रेलवे स्टेशन · 10 किमी

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।

रेल मार्ग

शिरकाळि रेलवे स्टेशन — लगभग 10 किमी

शिरकाळि व तिरुवेण्काडु — दोनों से लगभग 10 किमी।

सड़क मार्ग

तिरुनांगूर

ग्यारह मंदिर आसपास ही हैं और एक दिन में किए जा सकते हैं।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। तै मास की गरुड सेवै में तिरुनांगूर के ग्यारहों की उत्सव-मूर्तियाँ एकत्र होती हैं।

प्रमुख त्योहार

  • तिरुमंगै आळ्वार मंगलाशासन उत्सवम् / गरुड सेवै (तै मास)

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • तिरुनांगूर के अन्य दस दिव्य देशम — ग्यारहों पास-पास हैं।
  • तिरुवेण्काडु (लगभग 10 किमी)

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प शिरकाळि व मयिलाडुतुरै में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री पुरुषोत्तमन् पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुनांगूर, शिरकाळि व तिरुवेण्काडु — दोनों से लगभग 10 किमी
ज़िलामयिलाडुतुरै
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरु वण् पुरुषोत्तमम् — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न