गोवर्धन

Govardhan (Giriraj Ji)

ब्रज का वह तीर्थ जहाँ पूजा किसी विग्रह की नहीं, पर्वत की ही होती है — और भक्त उस पर चढ़ते नहीं, उसकी परिक्रमा करते हैं।

यह स्थान इनमें भी है:प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

गोवर्धन मथुरा से लगभग बीस किलोमीटर दूर वह पर्वत है जिसे ब्रज में गिरिराज जी कहकर पूजा जाता है। भारत के प्रमुख कृष्ण-तीर्थों में यह अकेला है जहाँ आराध्य कोई प्रतिमा नहीं, स्वयं पर्वत है।

कथा वही है जो हर ब्रजवासी को कंठस्थ है — इंद्र के प्रकोप से गोकुल को बचाने के लिए कृष्ण ने यह पूरा पर्वत अपनी कनिष्ठ अंगुली पर उठा लिया और सात दिन तक थामे रखा।

यहाँ की मुख्य साधना परिक्रमा है — सात कोस, लगभग इक्कीस किलोमीटर, जिसे पैदल पूरा करने में पाँच से छह घंटे लगते हैं। कुछ भक्त दंडौती परिक्रमा करते हैं, अर्थात पूरे मार्ग पर साष्टांग दंडवत करते हुए चलते हैं — इसमें एक से दो सप्ताह लग जाते हैं।

एक मान्यता इस पर्वत को अन्य सब तीर्थों से अलग करती है: परंपरा कहती है कि ऋषि पुलस्त्य के श्राप के कारण यह प्रतिदिन तिल-तिल क्षीण होता जा रहा है और धीरे-धीरे धरती में समाता जा रहा है। जो तीर्थ स्वयं घट रहा हो, उसकी परिक्रमा करना ब्रज में विशेष पुण्य माना जाता है।

परंपरा में भक्त पर्वत पर चढ़ते नहीं — पूजनीय मानी गई है परिक्रमा ही।

  • प्रमुख कृष्ण-तीर्थों में अकेला जहाँ आराध्य कोई विग्रह नहीं, स्वयं पर्वत है।
  • गोवर्धन-धारण लीला का स्थल — कृष्ण ने इसे कनिष्ठ अंगुली पर उठाया था।
  • सात कोस (लगभग 21 किमी) की परिक्रमा; पैदल 5–6 घंटे।
  • दंडौती परिक्रमा — पूरे मार्ग पर साष्टांग दंडवत; एक से दो सप्ताह में पूरी होती है।
  • परंपरा के अनुसार पुलस्त्य ऋषि के श्राप से पर्वत प्रतिदिन तिल-तिल क्षीण हो रहा है।
  • भक्त पर्वत पर चढ़ते नहीं; पूजनीय परिक्रमा ही मानी गई है।

पौराणिक कथा

गोवर्धन की कथा एक विद्रोह से शुरू होती है — और वह विद्रोह एक बालक ने किया।

इंद्र-पूजा रुकवाना

ब्रज में हर वर्ष इंद्र की पूजा होती थी, क्योंकि वर्षा उन्हीं से मानी जाती थी।

कृष्ण ने प्रश्न उठाया — ब्रज का जीवन गौओं से चलता है, गौएँ गोवर्धन पर चरती हैं, और वर्षा इसी पर्वत के वनों से बरसती है। तो पूजा उसकी होनी चाहिए जो सामने है और जिससे वास्तव में जीवन चलता है।

ब्रजवासी मान गए और उस वर्ष अन्नकूट गोवर्धन को अर्पित हुआ, इंद्र को नहीं।

सात दिन की वर्षा

इंद्र क्रोधित हुए और उन्होंने प्रलय जैसी वर्षा भेज दी। गोकुल डूबने लगा।

तब कृष्ण ने पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी सबसे छोटी अंगुली पर उठा लिया और सात दिन तक थामे रखा। समस्त ब्रजवासी, उनकी गौएँ और उनका सब कुछ उस पर्वत के नीचे सुरक्षित रहा।

सातवें दिन इंद्र ने हार मानी और क्षमा माँगी।

कथा में जो बात सबसे कम कही जाती है वह यह है कि कृष्ण ने पर्वत अकेले नहीं थामा था — ब्रजवासियों ने भी अपनी-अपनी लाठियाँ लगाकर सहारा दिया था। परंपरा कहती है कि उन्हें यह जानने नहीं दिया गया कि भार कौन उठा रहा है, ताकि वे स्वयं को असहाय अनुभव न करें।

घटता हुआ पर्वत

एक और कथा इस पर्वत से जुड़ी है, जो उसके वर्तमान रूप की व्याख्या करती है।

परंपरा के अनुसार ऋषि पुलस्त्य ने गोवर्धन को श्राप दिया कि "तू प्रतिदिन तिल-तिल क्षीण होता जाएगा।" इसी कारण यह पर्वत, जो प्राचीन काल में विशाल था, क्रमशः धरती में समाता जा रहा है।

ब्रज में इसे उदासी से नहीं देखा जाता। कहा जाता है कि जो घट रहा है, उसे देख लेना ही सौभाग्य है।

स्रोत: भागवत पुराण की गोवर्धन-धारण लीला की प्रचलित परंपरा; पुलस्त्य-श्राप व तथ्यात्मक विवरण hi.wikipedia.org/wiki/गोवर्धन_पर्वत से

दर्शन का समय

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली
निकटतम रेलवे स्टेशन: मथुरा जंक्शन · 20 किमी

हवाई मार्ग

इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली

दिल्ली से मथुरा यमुना एक्सप्रेसवे द्वारा लगभग तीन घंटे; मथुरा से गोवर्धन लगभग 20 किमी।

रेल मार्ग

मथुरा जंक्शन — लगभग 20 किमी

मथुरा जंक्शन दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर है; वहाँ से गोवर्धन के लिए बस व साझा वाहन मिलते हैं।

सड़क मार्ग

गोवर्धन

मथुरा व वृंदावन दोनों से नियमित बस तथा साझा वाहन चलते हैं।

अंतिम चरण: परिक्रमा मार्ग पक्का है और अधिकांश भाग समतल। पैदल न चल सकने वाले यात्रियों के लिए मार्ग पर ई-रिक्शा तथा टमटम उपलब्ध रहते हैं।

सुगमता: पूरी परिक्रमा इक्कीस किलोमीटर की है, इसलिए वृद्ध व अस्वस्थ यात्रियों के लिए वाहन से परिक्रमा अधिक व्यावहारिक है। मार्ग पर छाया कम है — ग्रीष्म में यह कठिन हो जाता है।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च। गोवर्धन पूजा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, दीपावली के अगले दिन) तथा मुड़िया पूनो (गुरु पूर्णिमा) यहाँ के सबसे बड़े अवसर हैं, जब लाखों यात्री परिक्रमा करते हैं। ग्रीष्म में परिक्रमा से बचें — मार्ग पर छाया कम है और दोपहर में गर्मी अत्यधिक हो जाती है।

प्रमुख त्योहार

  • गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)
  • मुड़िया पूनो
  • जन्माष्टमी
  • होली (ब्रज की होली)

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • दानघाटी — परिक्रमा मार्ग का प्रमुख पड़ाव; अनेक स्रोत इसे परिक्रमा का आरंभ बताते हैं।
  • मानसी गंगा — परिक्रमा मार्ग पर स्थित सरोवर; गिरिराज जी का मुखारविंद यहीं माना जाता है।
  • राधाकुंड व श्यामकुंड — परिक्रमा मार्ग पर; राधा-उपासना का सर्वोच्च स्थल माना जाता है।
  • कुसुम सरोवर — परिक्रमा मार्ग पर स्थित ऐतिहासिक सरोवर व छतरियाँ।
  • आन्यौर — परिक्रमा मार्ग का गाँव; अन्नकूट परंपरा से जुड़ा।
  • मथुरा (लगभग 20 किमी) — कृष्ण जन्मस्थान।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र। परिक्रमा प्रायः नंगे पाँव की जाती है, इसलिए मार्ग की स्थिति देखकर ही निर्णय लें।

ठहरने की व्यवस्था: गोवर्धन में धर्मशालाएँ व साधारण होटल हैं; अधिकांश यात्री मथुरा या वृंदावन में ठहरकर दिन में परिक्रमा करते हैं। गोवर्धन पूजा व मुड़िया पूनो के समय व्यवस्था महीनों पहले करनी पड़ती है।

एक नज़र में

प्रकारनगर
स्थानगोवर्धन
ज़िलामथुरा
राज्यउत्तर प्रदेश

गोवर्धन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न