श्री झूलेलाल चालीसा

śrī jhūlelāla cālīsā

Jhulelal Chalisa (Sindhi Ishtadev)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
चेटीचंड (सिंधी नववर्ष); रविवार व नित्य
उद्देश्य:रक्षा (Protection)संकट-निवारण (Relief)शुभ आरंभ (Auspicious start)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री झूलेलाल चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। चौपाइयाँ "रतनलाल रतनाणी नंदन, जयति देवकी सुत जग वंदन" से शुरू होती हैं। यह स्तुति कम और इतिहास अधिक है — सिंध में जबरन धर्मांतरण, चालीस दिन का सामूहिक उपवास, वरुण देव का प्रकट होना, और झूलेलाल का अवतार तथा समाधि — सब तिथियों सहित।

परिचय

स्रोत: सिंध परंपरा; नसरपुर (सिंध) — वरुण देव का अवतार

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री झूलेलाल चालीसा
IASTśrī jhūlelāla cālīsā
मूल स्रोतसिंध परंपरा; नसरपुर (सिंध) — वरुण देव का अवतार
शुभ दिनचेटीचंड (सिंधी नववर्ष); रविवार व नित्य
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा बाक़ी सबसे इस बात में अलग है कि यह एक घटना का वृत्तांत है, और तिथियाँ तक देती है।

संकट (चौपाई 6–10). ठट्ठा (सिंध) का राजा मिरखशाह सबका जबरन धर्मांतरण करा रहा था — "पिटवाया हाकिम ढिंढोरा, हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा" (9)। घबराई सिंधी प्रजा ने अपने इष्टदेव वरुण को पुकारा।

चालीस दिन का उपवास (चौपाई 11–12). यही इस चालीसा का मर्म है — "बिन जल अन्न गए दिन राती… सिन्धी तीर सब दिन चालीसा": सिंधु के तट पर चालीस दिन तक बिना अन्न-जल के प्रार्थना। इसी "चालीस" से चालीसा का समापन दोहा भी जुड़ता है, जो चालीस दिन का संकल्प कहता है।

वरुण का दर्शन (चौपाई 13–17). सिंधु गरज उठा और वरुण देव मीन (मछली) पर सवार, हाथ में पुस्तक लिए प्रकट हुए — और वचन दिया कि वे नसरपुर में अवतार लेंगे।

अवतार (चौपाई 18–21). तिथि चालीसा स्वयं देती है — संवत 1007, चैत्र शुक्ल द्वितीया, ग्राम नसरपुर (चौपाई 4–5)। यही तिथि आज चेटीचंड के रूप में सिंधी नववर्ष पर मनाई जाती है। माता-पिता: रतनराय और रतनाणी।

मंत्री और राजा (चौपाई 22–37). राजा का मंत्री बालक को देखने आता है और बालक उसे कभी युवा सेनानी, कभी योद्धा-रूप में दिखते हैं (25–27)। फिर वह संदेश जो इस चालीसा का सबसे बड़ा वाक्य है — "मिरखशाह नऊप तजे गुमाना, हिन्दू मुस्लिम एक समाना" (29)। राजा नहीं माना, तो दरबार में जल-प्लावन हुआ और अंततः उसने आदेश वापस लिया।

समाधि (चौपाई 38–39). फिर तिथि — संवत 1020, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी — और "जल में ली जलदेव समाधि"।

यह पाठ सिंधी समाज का इष्ट-स्तोत्र है; झूलेलाल को उडेरोलाल, दरियाशाह और ज़िंदा पीर भी कहा जाता है — तीनों नाम चालीसा में ही आते हैं (दोहा, चौपाई 2, 3)।

संपूर्ण चालीसा

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जय जय जल देवता, जय ज्योति स्वरूप। अमर उडेरो लाल जय, झुलेलाल अनूप॥

हे जल-देवता, आपकी जय हो, जय हो; हे ज्योति-स्वरूप, जय हो। हे अमर उडेरोलाल, हे अनुपम झूलेलाल — आपकी जय हो।

रतनलाल रतनाणी नंदन। जयति देवकी सुत जग वंदन॥

आप रतनलाल और रतनाणी के पुत्र हैं; हे देवकी-सुत के समान जगत-वंदित, आपकी जय हो।

दरियाशाह वरुण अवतारी। जय जय लाल साईं सुखकारी॥

आप दरियाशाह हैं, वरुण के अवतार हैं; हे सुख देने वाले लाल साईं, आपकी जय हो, जय हो।

जय जय होय धर्म की भीरा। जिन्दा पीर हरे जन पीरा॥

धर्म की विजय हो — हे ज़िंदा पीर, आप जनों की पीड़ा हर लेते हैं।

संवत दस सौ सात मंझरा। चैत्र शुक्ल द्वितिया भगऊ वारा॥

संवत दस सौ सात (1007) में, चैत्र शुक्ल द्वितीया के शुभ वार को —

ग्राम नसरपुर सिंध प्रदेशा। प्रभु अवतरे हरे जन कलेशा॥

सिंध प्रदेश के नसरपुर ग्राम में प्रभु अवतरित हुए और जनों का क्लेश हरा।

सिन्धु वीर ठट्ठा राजधानी। मिरखशाह नऊप अति अभिमानी॥

सिंधु प्रदेश की राजधानी ठट्ठा में मिरखशाह नाम का अत्यंत अभिमानी राजा था।

कपटी कुटिल क्रूर कूविचारी। यवन मलिन मन अत्याचारी॥

वह कपटी, कुटिल, क्रूर और कुविचारी था; मलिन मन वाला अत्याचारी यवन था।

धर्मान्तरण करे सब केरा। दुखी हुए जन कष्ट घनेरा॥

उसने सबका धर्मांतरण कराना शुरू किया; लोग दुखी हुए और भारी कष्ट पाया।

पिटवाया हाकिम ढिंढोरा। हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा॥

हाकिम ने चारों ओर ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब इस्लाम धर्म स्वीकार करें।

सिन्धी प्रजा बहुत घबराई। इष्ट देव को टेर लगाई॥

सिंधी प्रजा बहुत घबरा गई और उसने अपने इष्टदेव को पुकारा।

वरुण देव पूजे बहुंभाती। बिन जल अन्न गए दिन राती॥

उन्होंने अनेक प्रकार से वरुण देव की पूजा की और बिना जल-अन्न के दिन-रात बिताए।

सिन्धी तीर सब दिन चालीसा। घर घर ध्यान लगाये ईशा॥

सिंधी लोगों ने नदी-तट पर चालीस दिन तक घर-घर ईश्वर का ध्यान लगाया।

गरज उठा नद सिन्धु सहसा। चारो और उठा नव हरषा॥

सहसा सिंधु नद गरज उठा; चारों ओर नया हर्ष उमड़ पड़ा।

वरुणदेव ने सुनी पुकारा। प्रकटे वरुण मीन असवारा॥

वरुण देव ने पुकार सुनी और मीन (मछली) पर सवार होकर प्रकट हुए।

दिव्य पुरुष जल ब्रह्मा स्वरुपा। कर पुष्तक नवरूप अनूपा॥

वे दिव्य पुरुष, जल-ब्रह्म स्वरूप थे; हाथ में पुस्तक लिए अनुपम रूप में।

हर्षित हुए सकल नर नारी। वरुणदेव की महिमा न्यारी॥

सब नर-नारी हर्षित हुए; वरुण देव की महिमा निराली है।

जय जय कार उठी चाहुँओरा। गई रात आने को भौंरा॥

चारों ओर जय-जयकार उठी; रात बीत गई और भोर आने को हुई।

मिरखशाह नऊप अत्याचारी। नष्ट करूँगा शक्ति सारी॥

(वरुण ने कहा —) अत्याचारी राजा मिरखशाह की सारी शक्ति मैं नष्ट कर दूँगा।

दूर अधर्म, हरण भू भारा। शीघ्र नसरपुर में अवतारा॥

अधर्म दूर करने और पृथ्वी का भार हरने के लिए मैं शीघ्र ही नसरपुर में अवतार लूँगा।

रतनराय रातनाणी आँगन। खेलूँगा, आऊँगा शिशु बन॥

रतनराय और रतनाणी के आँगन में मैं शिशु बनकर आऊँगा और खेलूँगा।

रतनराय घर ख़ुशी आई। झुलेलाल अवतारे सब देय बधाई॥

रतनराय के घर खुशी आई; झूलेलाल अवतरित हुए और सबने बधाई दी।

घर घर मंगल गीत सुहाए। झुलेलाल हरन दुःख आए॥

घर-घर मंगल गीत सुहाने लगे; दुख हरने वाले झूलेलाल आ गए।

मिरखशाह तक चर्चा आई। भेजा मंत्री क्रोध अधिकाई॥

यह चर्चा मिरखशाह तक पहुँची; उसने क्रोध में भरकर मंत्री को भेजा।

मंत्री ने जब बाल निहारा। धीरज गया हृदय का सारा॥

मंत्री ने जब उस बालक को देखा, तो उसके हृदय का सारा धीरज जाता रहा।

देखि मंत्री साईं की लीला। अधिक विचित्र विमोहन शीला॥

मंत्री ने साईं की लीला देखी — अत्यंत विचित्र और मोह लेने वाली।

बालक धीखा युवा सेनानी। देखा मंत्री बुद्धि चाकरानी॥

बालक कभी युवा सेनानी दिखा; मंत्री ने उसे अपनी बुद्धि से देखा।

योद्धा रूप दिखे भगवाना। मंत्री हुआ विगत अभिमाना॥

भगवान कभी योद्धा-रूप में दिखे; मंत्री का अभिमान जाता रहा।

झुलेलाल दिया आदेशा। जा तव नऊपति कहो संदेशा॥

झूलेलाल ने आदेश दिया — जाकर अपने राजा से यह संदेश कहो।

मिरखशाह नऊप तजे गुमाना। हिन्दू मुस्लिम एक समाना॥

"मिरखशाह राजा अपना घमंड छोड़े; हिन्दू और मुसलमान एक समान हैं।"

बंद करो नित्य अत्याचारा। त्यागो धर्मान्तरण विचारा॥

"नित्य का अत्याचार बंद करो और धर्मांतरण का विचार त्याग दो।"

लेकिन मिरखशाह अभिमानी। वरुणदेव की बात न मानी॥

लेकिन अभिमानी मिरखशाह ने वरुण देव की बात नहीं मानी।

एक दिवस हो अश्व सवारा। झुलेलाल गए दरबारा॥

एक दिन अश्व पर सवार होकर झूलेलाल दरबार गए।

मिरखशाह नऊप ने आज्ञा दी। झुलेलाल बनाओ बन्दी॥

मिरखशाह राजा ने आज्ञा दी — झूलेलाल को बंदी बनाओ।

किया स्वरुप वरुण का धारण। चारो और हुआ जल प्लावन॥

तब उन्होंने वरुण का स्वरूप धारण कर लिया और चारों ओर जल-प्लावन हो गया।

दरबारी डूबे उतराये। नऊप के होश ठिकाने आये॥

दरबारी डूबने-उतराने लगे; तब राजा के होश ठिकाने आए।

नऊप तब पड़ा चरण में आई। जय जय धन्य जय साईं॥

राजा तब चरणों में आ पड़ा और बोला — जय हो, धन्य हो, जय साईं।

वापिस लिया नऊपति आदेशा। दूर दूर सब जन क्लेशा॥

राजा ने अपना आदेश वापस ले लिया और सब जनों का क्लेश दूर हुआ।

संवत दस सौ बीस मंझारी। भाद्र शुक्ल चौदस शुभकारी॥

संवत दस सौ बीस (1020) में, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी के शुभ दिन —

भक्तो की हर आधी व्याधि। जल में ली जलदेव समाधि॥

भक्तों की सब आधि-व्याधि हरकर जल-देव ने जल में ही समाधि ले ली।

जो जन धरे आज भी ध्याना। उनका वरुण करे कल्याणा॥

जो जन आज भी उनका ध्यान धरते हैं, वरुण उनका कल्याण करते हैं।

चालीसा चालीस दिन, पाठ करे जो कोय। पावे मनवांछित फल, अरु जीवन सुखमय होय॥

जो कोई चालीस दिन तक यह चालीसा पढ़े, वह मनचाहा फल पाता है और उसका जीवन सुखमय होता है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे जल-देवता, आपकी जय हो, जय हो; हे ज्योति-स्वरूप, जय हो। हे अमर उडेरोलाल, हे अनुपम झूलेलाल — आपकी जय हो।
  2. आप रतनलाल और रतनाणी के पुत्र हैं; हे देवकी-सुत के समान जगत-वंदित, आपकी जय हो।
  3. आप दरियाशाह हैं, वरुण के अवतार हैं; हे सुख देने वाले लाल साईं, आपकी जय हो, जय हो।
  4. धर्म की विजय हो — हे ज़िंदा पीर, आप जनों की पीड़ा हर लेते हैं।
  5. संवत दस सौ सात (1007) में, चैत्र शुक्ल द्वितीया के शुभ वार को —
  6. सिंध प्रदेश के नसरपुर ग्राम में प्रभु अवतरित हुए और जनों का क्लेश हरा।
  7. सिंधु प्रदेश की राजधानी ठट्ठा में मिरखशाह नाम का अत्यंत अभिमानी राजा था।
  8. वह कपटी, कुटिल, क्रूर और कुविचारी था; मलिन मन वाला अत्याचारी यवन था।
  9. उसने सबका धर्मांतरण कराना शुरू किया; लोग दुखी हुए और भारी कष्ट पाया।
  10. हाकिम ने चारों ओर ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब इस्लाम धर्म स्वीकार करें।
  11. सिंधी प्रजा बहुत घबरा गई और उसने अपने इष्टदेव को पुकारा।
  12. उन्होंने अनेक प्रकार से वरुण देव की पूजा की और बिना जल-अन्न के दिन-रात बिताए।
  13. सिंधी लोगों ने नदी-तट पर चालीस दिन तक घर-घर ईश्वर का ध्यान लगाया।
  14. सहसा सिंधु नद गरज उठा; चारों ओर नया हर्ष उमड़ पड़ा।
  15. वरुण देव ने पुकार सुनी और मीन (मछली) पर सवार होकर प्रकट हुए।
  16. वे दिव्य पुरुष, जल-ब्रह्म स्वरूप थे; हाथ में पुस्तक लिए अनुपम रूप में।
  17. सब नर-नारी हर्षित हुए; वरुण देव की महिमा निराली है।
  18. चारों ओर जय-जयकार उठी; रात बीत गई और भोर आने को हुई।
  19. (वरुण ने कहा —) अत्याचारी राजा मिरखशाह की सारी शक्ति मैं नष्ट कर दूँगा।
  20. अधर्म दूर करने और पृथ्वी का भार हरने के लिए मैं शीघ्र ही नसरपुर में अवतार लूँगा।
  21. रतनराय और रतनाणी के आँगन में मैं शिशु बनकर आऊँगा और खेलूँगा।
  22. रतनराय के घर खुशी आई; झूलेलाल अवतरित हुए और सबने बधाई दी।
  23. घर-घर मंगल गीत सुहाने लगे; दुख हरने वाले झूलेलाल आ गए।
  24. यह चर्चा मिरखशाह तक पहुँची; उसने क्रोध में भरकर मंत्री को भेजा।
  25. मंत्री ने जब उस बालक को देखा, तो उसके हृदय का सारा धीरज जाता रहा।
  26. मंत्री ने साईं की लीला देखी — अत्यंत विचित्र और मोह लेने वाली।
  27. बालक कभी युवा सेनानी दिखा; मंत्री ने उसे अपनी बुद्धि से देखा।
  28. भगवान कभी योद्धा-रूप में दिखे; मंत्री का अभिमान जाता रहा।
  29. झूलेलाल ने आदेश दिया — जाकर अपने राजा से यह संदेश कहो।
  30. "मिरखशाह राजा अपना घमंड छोड़े; हिन्दू और मुसलमान एक समान हैं।"
  31. "नित्य का अत्याचार बंद करो और धर्मांतरण का विचार त्याग दो।"
  32. लेकिन अभिमानी मिरखशाह ने वरुण देव की बात नहीं मानी।
  33. एक दिन अश्व पर सवार होकर झूलेलाल दरबार गए।
  34. मिरखशाह राजा ने आज्ञा दी — झूलेलाल को बंदी बनाओ।
  35. तब उन्होंने वरुण का स्वरूप धारण कर लिया और चारों ओर जल-प्लावन हो गया।
  36. दरबारी डूबने-उतराने लगे; तब राजा के होश ठिकाने आए।
  37. राजा तब चरणों में आ पड़ा और बोला — जय हो, धन्य हो, जय साईं।
  38. राजा ने अपना आदेश वापस ले लिया और सब जनों का क्लेश दूर हुआ।
  39. संवत दस सौ बीस (1020) में, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी के शुभ दिन —
  40. भक्तों की सब आधि-व्याधि हरकर जल-देव ने जल में ही समाधि ले ली।
  41. जो जन आज भी उनका ध्यान धरते हैं, वरुण उनका कल्याण करते हैं।
  42. जो कोई चालीस दिन तक यह चालीसा पढ़े, वह मनचाहा फल पाता है और उसका जीवन सुखमय होता है।

लाभ

  • झूलेलाल के अवतार और समाधि की तिथियाँ चालीसा में ही दी हैं (चौपाई 4 और 38)।
  • चालीस दिन के सामूहिक उपवास की कथा — जिससे "चालीसा" का नाम जुड़ता है (चौपाई 11–12)।
  • चेटीचंड (सिंधी नववर्ष) का प्रमुख पाठ।
  • "हिन्दू मुस्लिम एक समाना" — चौपाई 29 का सीधा संदेश।

कब करें पाठ

चेटीचंड (चैत्र शुक्ल द्वितीया, सिंधी नववर्ष) पररविवार कोनित्य प्रातः पूजा मेंचालीस दिन का संकल्प लेकर — समापन दोहा यही कहता है

पाठ विधि

झूलेलाल के चित्र के समक्ष जल से भरा कलश रखें और दीप जलाएँ — वे जल-देवता वरुण के अवतार हैं, इसलिए जल की उपस्थिति पूजा का केंद्र है। बहिराणा साहिब की परंपरा (जल-कलश) इसी से आती है। पहले दोहा, फिर चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहा पढ़ें। समापन दोहा स्वयं चालीस दिन का संकल्प बताता है — "चालीसा चालीस दिन पाठ करे जो कोय"। प्रसाद में मीठे चावल या तहरी बाँटी जाती है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — श्री झूलेलाल चालीसा (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — श्री झूलेलाल चालीसा · dharmsaar.com — श्री झूलेलाल चालीसा · chalisasangrah.in — श्री झूलेलाल चालीसा
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री झूलेलाल चालीसा — सामान्य प्रश्न