जय जय जल देवता,
जय ज्योति स्वरूप।
अमर उडेरो लाल जय,
झुलेलाल अनूप॥
हे जल-देवता, आपकी जय हो, जय हो; हे ज्योति-स्वरूप, जय हो। हे अमर उडेरोलाल, हे अनुपम झूलेलाल — आपकी जय हो।
1रतनलाल रतनाणी नंदन।
जयति देवकी सुत जग वंदन॥
आप रतनलाल और रतनाणी के पुत्र हैं; हे देवकी-सुत के समान जगत-वंदित, आपकी जय हो।
2दरियाशाह वरुण अवतारी।
जय जय लाल साईं सुखकारी॥
आप दरियाशाह हैं, वरुण के अवतार हैं; हे सुख देने वाले लाल साईं, आपकी जय हो, जय हो।
3जय जय होय धर्म की भीरा।
जिन्दा पीर हरे जन पीरा॥
धर्म की विजय हो — हे ज़िंदा पीर, आप जनों की पीड़ा हर लेते हैं।
4संवत दस सौ सात मंझरा।
चैत्र शुक्ल द्वितिया भगऊ वारा॥
संवत दस सौ सात (1007) में, चैत्र शुक्ल द्वितीया के शुभ वार को —
5ग्राम नसरपुर सिंध प्रदेशा।
प्रभु अवतरे हरे जन कलेशा॥
सिंध प्रदेश के नसरपुर ग्राम में प्रभु अवतरित हुए और जनों का क्लेश हरा।
6सिन्धु वीर ठट्ठा राजधानी।
मिरखशाह नऊप अति अभिमानी॥
सिंधु प्रदेश की राजधानी ठट्ठा में मिरखशाह नाम का अत्यंत अभिमानी राजा था।
7कपटी कुटिल क्रूर कूविचारी।
यवन मलिन मन अत्याचारी॥
वह कपटी, कुटिल, क्रूर और कुविचारी था; मलिन मन वाला अत्याचारी यवन था।
8धर्मान्तरण करे सब केरा।
दुखी हुए जन कष्ट घनेरा॥
उसने सबका धर्मांतरण कराना शुरू किया; लोग दुखी हुए और भारी कष्ट पाया।
9पिटवाया हाकिम ढिंढोरा।
हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा॥
हाकिम ने चारों ओर ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब इस्लाम धर्म स्वीकार करें।
10सिन्धी प्रजा बहुत घबराई।
इष्ट देव को टेर लगाई॥
सिंधी प्रजा बहुत घबरा गई और उसने अपने इष्टदेव को पुकारा।
11वरुण देव पूजे बहुंभाती।
बिन जल अन्न गए दिन राती॥
उन्होंने अनेक प्रकार से वरुण देव की पूजा की और बिना जल-अन्न के दिन-रात बिताए।
12सिन्धी तीर सब दिन चालीसा।
घर घर ध्यान लगाये ईशा॥
सिंधी लोगों ने नदी-तट पर चालीस दिन तक घर-घर ईश्वर का ध्यान लगाया।
13गरज उठा नद सिन्धु सहसा।
चारो और उठा नव हरषा॥
सहसा सिंधु नद गरज उठा; चारों ओर नया हर्ष उमड़ पड़ा।
14वरुणदेव ने सुनी पुकारा।
प्रकटे वरुण मीन असवारा॥
वरुण देव ने पुकार सुनी और मीन (मछली) पर सवार होकर प्रकट हुए।
15दिव्य पुरुष जल ब्रह्मा स्वरुपा।
कर पुष्तक नवरूप अनूपा॥
वे दिव्य पुरुष, जल-ब्रह्म स्वरूप थे; हाथ में पुस्तक लिए अनुपम रूप में।
16हर्षित हुए सकल नर नारी।
वरुणदेव की महिमा न्यारी॥
सब नर-नारी हर्षित हुए; वरुण देव की महिमा निराली है।
17जय जय कार उठी चाहुँओरा।
गई रात आने को भौंरा॥
चारों ओर जय-जयकार उठी; रात बीत गई और भोर आने को हुई।
18मिरखशाह नऊप अत्याचारी।
नष्ट करूँगा शक्ति सारी॥
(वरुण ने कहा —) अत्याचारी राजा मिरखशाह की सारी शक्ति मैं नष्ट कर दूँगा।
19दूर अधर्म, हरण भू भारा।
शीघ्र नसरपुर में अवतारा॥
अधर्म दूर करने और पृथ्वी का भार हरने के लिए मैं शीघ्र ही नसरपुर में अवतार लूँगा।
20रतनराय रातनाणी आँगन।
खेलूँगा, आऊँगा शिशु बन॥
रतनराय और रतनाणी के आँगन में मैं शिशु बनकर आऊँगा और खेलूँगा।
21रतनराय घर ख़ुशी आई।
झुलेलाल अवतारे सब देय बधाई॥
रतनराय के घर खुशी आई; झूलेलाल अवतरित हुए और सबने बधाई दी।
22घर घर मंगल गीत सुहाए।
झुलेलाल हरन दुःख आए॥
घर-घर मंगल गीत सुहाने लगे; दुख हरने वाले झूलेलाल आ गए।
23मिरखशाह तक चर्चा आई।
भेजा मंत्री क्रोध अधिकाई॥
यह चर्चा मिरखशाह तक पहुँची; उसने क्रोध में भरकर मंत्री को भेजा।
24मंत्री ने जब बाल निहारा।
धीरज गया हृदय का सारा॥
मंत्री ने जब उस बालक को देखा, तो उसके हृदय का सारा धीरज जाता रहा।
25देखि मंत्री साईं की लीला।
अधिक विचित्र विमोहन शीला॥
मंत्री ने साईं की लीला देखी — अत्यंत विचित्र और मोह लेने वाली।
26बालक धीखा युवा सेनानी।
देखा मंत्री बुद्धि चाकरानी॥
बालक कभी युवा सेनानी दिखा; मंत्री ने उसे अपनी बुद्धि से देखा।
27योद्धा रूप दिखे भगवाना।
मंत्री हुआ विगत अभिमाना॥
भगवान कभी योद्धा-रूप में दिखे; मंत्री का अभिमान जाता रहा।
28झुलेलाल दिया आदेशा।
जा तव नऊपति कहो संदेशा॥
झूलेलाल ने आदेश दिया — जाकर अपने राजा से यह संदेश कहो।
29मिरखशाह नऊप तजे गुमाना।
हिन्दू मुस्लिम एक समाना॥
"मिरखशाह राजा अपना घमंड छोड़े; हिन्दू और मुसलमान एक समान हैं।"
30बंद करो नित्य अत्याचारा।
त्यागो धर्मान्तरण विचारा॥
"नित्य का अत्याचार बंद करो और धर्मांतरण का विचार त्याग दो।"
31लेकिन मिरखशाह अभिमानी।
वरुणदेव की बात न मानी॥
लेकिन अभिमानी मिरखशाह ने वरुण देव की बात नहीं मानी।
32एक दिवस हो अश्व सवारा।
झुलेलाल गए दरबारा॥
एक दिन अश्व पर सवार होकर झूलेलाल दरबार गए।
33मिरखशाह नऊप ने आज्ञा दी।
झुलेलाल बनाओ बन्दी॥
मिरखशाह राजा ने आज्ञा दी — झूलेलाल को बंदी बनाओ।
34किया स्वरुप वरुण का धारण।
चारो और हुआ जल प्लावन॥
तब उन्होंने वरुण का स्वरूप धारण कर लिया और चारों ओर जल-प्लावन हो गया।
35दरबारी डूबे उतराये।
नऊप के होश ठिकाने आये॥
दरबारी डूबने-उतराने लगे; तब राजा के होश ठिकाने आए।
36नऊप तब पड़ा चरण में आई।
जय जय धन्य जय साईं॥
राजा तब चरणों में आ पड़ा और बोला — जय हो, धन्य हो, जय साईं।
37वापिस लिया नऊपति आदेशा।
दूर दूर सब जन क्लेशा॥
राजा ने अपना आदेश वापस ले लिया और सब जनों का क्लेश दूर हुआ।
38संवत दस सौ बीस मंझारी।
भाद्र शुक्ल चौदस शुभकारी॥
संवत दस सौ बीस (1020) में, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी के शुभ दिन —
39भक्तो की हर आधी व्याधि।
जल में ली जलदेव समाधि॥
भक्तों की सब आधि-व्याधि हरकर जल-देव ने जल में ही समाधि ले ली।
40जो जन धरे आज भी ध्याना।
उनका वरुण करे कल्याणा॥
जो जन आज भी उनका ध्यान धरते हैं, वरुण उनका कल्याण करते हैं।
चालीसा चालीस दिन,
पाठ करे जो कोय।
पावे मनवांछित फल,
अरु जीवन सुखमय होय॥
जो कोई चालीस दिन तक यह चालीसा पढ़े, वह मनचाहा फल पाता है और उसका जीवन सुखमय होता है।