श्री गुरु पद नमन करि,
गिरा गनेश मनाय।
कथूं रामदेव विमल यश,
सुने पाप विनशाय॥
श्री गुरु के चरणों में नमन कर, वाणी (सरस्वती) और गणेश को मनाकर मैं रामदेव का निर्मल यश कहता हूँ — जिसे सुनने से पाप नष्ट हो जाते हैं।
द्वार केश से आय कर,
लिया मनुज अवतार।
अजमल गेह बधावणा,
जग में जय जयकार॥
द्वारका से आकर उन्होंने मनुष्य का अवतार लिया; अजमल के घर बधाई बजी और जगत में जय-जयकार हुई।
1जय जय रामदेव सुर राया।
अजमल पुत्र अनोखी माया॥
हे रामदेव, देवताओं के राजा, आपकी जय हो; अजमल के पुत्र, आपकी माया अनोखी है।
2विष्णु रूप सुर नर के स्वामी।
परम प्रतापी अन्तर्यामी॥
आप विष्णु के रूप हैं, देवों और मनुष्यों के स्वामी; परम प्रतापी और सबके अंतर की जानने वाले।
3ले अवतार अवनि पर आये।
तंवर वंश अवतंश कहाये॥
आप अवतार लेकर पृथ्वी पर आए और तँवर वंश के शिरोमणि कहलाए।
4संत जनों के कारज सारे।
दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥
आपने संतजनों के सब काम सँवारे और दानव, दैत्य तथा दुष्टों का संहार किया।
5परच्या प्रथम पिता को दीन्हा।
दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥
पहला परचा (चमत्कार) पिता को दिया — दूध के परींडे में उसे दिखा दिया।
6कुमकुम पद पोली दर्शाये।
ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥
पालने में प्रकट होते ही आपने कुमकुम-भरे चरणों की छाप द्वार पर दिखा दी।
7परचा दूजा जननी पाया।
दूध उफणता चरा उठाया॥
दूसरा परचा माता ने पाया — उबलते दूध का चूल्हा आपने उठा लिया।
8परचा तीजा पुरजन पाया।
चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥
तीसरा परचा नगरवासियों ने पाया — चिथड़ों का घोड़ा ही सचमुच का घोड़ा बन गया।
9परच्या चौथा भैरव मारा।
भक्त जनों का कष्ट निवारा॥
चौथा परचा भैरव-वध का था — इससे भक्तजनों का कष्ट दूर हुआ।
10पंचम परच्या रतना पाया।
पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥
पाँचवाँ परचा रतना ने पाया — पुंगल जाकर प्रभु ने उसे बंधन से छुड़ाया।
11परच्या छठा विजयसिंह पाया।
जला नगर शरणागत आया॥
छठा परचा विजयसिंह ने पाया, जो नगर जलने पर शरण में आया था।
12परच्या सप्तम् सुगना पाया।
मुवा पुत्र हंसता भग आया॥
सातवाँ परचा सुगना ने पाया — उसका मरा हुआ पुत्र हँसता हुआ लौट आया।
13परच्या अष्टम् बौहित पाया।
जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥
आठवाँ परचा बोहित ने पाया, जो परदेश जाकर बहुत धन लाया था।
14भंवर डूबती नाव उबारी।
प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥
भँवर में डूबती उसकी नाव आपने उबार ली — पुकार सुनते ही अवतारी प्रकट होकर पहुँच गए।
15नवमां परच्या वीरम पाया।
बनियां आ जब हाल सुनाया॥
नौवाँ परचा वीरम ने पाया, जब वह बनिया आकर अपना हाल सुनाने लगा।
16दसवां परच्या पा बिनजारा।
मिश्री बनी नमक सब खारा॥
दसवाँ परचा एक बंजारे ने पाया — उसकी मिश्री नमक बन गई और सब खारा हो गया।
17परच्या ग्यारह किरपा थारी।
नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥
ग्यारहवाँ परचा आपकी कृपा का था — वही नमक फिर सारा मिश्री हो गया।
18परच्या द्वादश ठोकर मारी।
निकलंग नाड़ी सिरजी प्यारी॥
बारहवाँ परचा ठोकर मारने का — उससे प्यारी निकलंग नाड़ी (जल-स्रोत) सृजित हो गई।
19परच्या तेरहवां पीर परी पधारया।
ल्याय कटोरा कारज सारा॥
तेरहवाँ परचा तब हुआ जब पीर पधारे — आप उनका कटोरा ले आए और काम सँवार दिया।
20चौदहवां परच्या जाभो पाया।
निजसर जल खारा करवाया॥
चौदहवाँ परचा जाँभो (जंभेश्वर) ने पाया — उन्होंने अपने सरोवर का जल खारा करवा दिया था।
21परच्या पन्द्रह फिर बतलाया।
राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥
पंद्रहवाँ परचा फिर बताया गया — प्रभु ने राम-सरोवर खुदवा दिया।
22परच्या सोलह हरबू पाया।
दर्श पाय अतिशय हरषाया॥
सोलहवाँ परचा हरबू ने पाया — दर्शन पाकर वह अत्यंत हर्षित हुआ।
23परच्या सत्रह हर जी पाया।
दूध थणा बकरया के आया॥
सत्रहवाँ परचा हरजी ने पाया — बकरी के थनों में दूध उतर आया।
24सुखी नाडी पानी कीन्हों।
आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥
सूखी नाड़ी में आपने पानी कर दिया, और हरजी को आत्मज्ञान दे दिया।
25परच्या अठारहवां हाकिम पाया।
सूते को धरती लुढ़काया॥
अठारहवाँ परचा हाकिम ने पाया — सोते हुए को धरती ने लुढ़का दिया।
26परच्या उन्नीसवां दल जी पाया।
पुत्र पाय मन में हरषाया॥
उन्नीसवाँ परचा दलजी ने पाया — पुत्र पाकर उनका मन हर्ष से भर गया।
27परच्या बीसवां पाया सेठाणी।
आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥
बीसवाँ परचा एक सेठानी ने पाया — उसकी गद्गद वाणी सुनकर प्रभु आ पहुँचे।
28तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा।
उक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥
उन्होंने तुरंत सेठ को जीवित कर दिया और अभय का स्पष्ट वरदान दे दिया।
29परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया।
हो अन्धा करनी फल पाया॥
इक्कीसवाँ परचा उस चोर ने पाया, जो अपनी करनी का फल पाकर अंधा हो गया।
30परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां।
सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥
बाईसवाँ परचा मिर्ज़ा ने चाहा — प्रभु ने सातों तवे एक साथ बेध दिए।
31परच्या तेईसवां बादशाह पाया।
फेर भक्त को नहीं सताया॥
तेईसवाँ परचा बादशाह ने पाया — उसके बाद उसने भक्तों को फिर कभी नहीं सताया।
32परच्या चौबीसवां बख्शी पाया।
मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥
चौबीसवाँ परचा बख्शी ने पाया — उसका मरा हुआ पुत्र पल भर में उठ खड़ा हुआ।
33जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां।
तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥
जब-जब जिसने आपका स्मरण किया, तब-तब आपने आकर दर्शन दिए।
34भक्त टेर सुन आतुर धाते।
चढ़ लीले पर जल्दी आते॥
भक्त की पुकार सुनकर आप आतुर होकर दौड़ पड़ते हैं और लीले घोड़े पर चढ़कर तुरंत आ जाते हैं।
35जो जन प्रभु की लीला गावें।
मनवांछित कारज फल पावें॥
जो जन प्रभु की लीला गाते हैं, उन्हें मनचाहे कार्य का फल मिलता है।
36यह चालीसा सुने सुनावे।
ताके कष्ट सकल कट जावे॥
जो यह चालीसा सुने या सुनाए, उसके सारे कष्ट कट जाते हैं।
37जय जय जय प्रभु लीला धारी।
तेरी महिमा अपरम्पारी॥
हे लीला धारण करने वाले प्रभु, आपकी जय हो, जय हो; आपकी महिमा अपरम्पार है।
38मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ।
कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥
मैं मूरख आपके क्या गुण गाऊँ — शारदा जैसी बुद्धि कहाँ से लाऊँ?
39नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा।
मती अनुसार रची चालीसा॥
मुझमें लव-लेश भर भी बुद्धि-बल नहीं; अपनी मति के अनुसार ही यह चालीसा रची है।
40दास सभी शरण में तेरी।
रखियों प्रभु लज्जा मेरी॥
सब दास आपकी शरण में हैं — हे प्रभु, मेरी लाज रखियेगा।