श्री रामदेव पीर चालीसा

śrī rāmadeva pīra cālīsā

Ramdev Pir Chalisa (Ramdevra, Rajasthan)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
भादवा सुदी बीज (बाबे री बीज); रामदेव जयंती
उद्देश्य:रक्षा (Protection)संकट-निवारण (Relief)मनोकामना (Wish fulfilment)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री रामदेव पीर चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। इसका बीच का पूरा हिस्सा — चौपाई 5 से 34 तक — बाबा रामदेव के चौबीस परचों (चमत्कारों) की क्रमबद्ध सूची है, हर परचा अपने नंबर और पाने वाले भक्त के नाम के साथ।

परिचय

स्रोत: रामदेवरा (रुणिचा), जैसलमेर — राजस्थान की लोक-परंपरा

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री रामदेव पीर चालीसा
IASTśrī rāmadeva pīra cālīsā
मूल स्रोतरामदेवरा (रुणिचा), जैसलमेर — राजस्थान की लोक-परंपरा
शुभ दिनभादवा सुदी बीज (बाबे री बीज); रामदेव जयंती
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा एक सूची है, और उसी में इसकी उपयोगिता है — राजस्थान की लोक-परंपरा में बाबा रामदेव के जो चौबीस परचे कहे जाते हैं, वे यहाँ क्रम से, नंबर के साथ गिनाए गए हैं। किसी और पाठ में यह पूरी गिनती एक जगह नहीं मिलती।

घर के परचे (1–4). पहला पिता अजमल को — दूध के परींडे में दर्शन; पालने में प्रकट होते ही कुमकुम-चरणों की छाप। दूसरा माता को — उबलते दूध का चूल्हा उठा लेना। तीसरा नगरवासियों को — चिथड़ों का घोड़ा सचमुच का घोड़ा बन जाना। चौथा भैरव-वध (5–11)।

भक्तों के परचे (5–24). रतना, विजयसिंह, सुगना (जिसका मरा पुत्र लौट आया), बोहित (जिसकी डूबती नाव उबरी), वीरम बनिया, बंजारा (जिसकी मिश्री नमक हुई और फिर मिश्री), हरबू, हरजी (जिन्हें आत्मज्ञान मिला), हाकिम, दलजी, सेठानी, चोर, मिर्ज़ा, बादशाह और बख्शी (12–34)।

इनमें तीन प्रसंग अलग से ध्यान खींचते हैं:

· तेरहवाँ परचा — पीरों का कटोरा (चौपाई 21)। लोक-कथा में पाँच पीर मक्का से बाबा की परीक्षा लेने आए और अपने कटोरे वहीं छोड़ आए; बाबा ने उन्हें अपनी शक्ति से मँगवा दिया। इसी के बाद वे रामसा पीर कहलाए — और यही नाम इस चालीसा के शीर्षक में है।

· बारहवाँ और पंद्रहवाँ परचा — जल (20, 23)। ठोकर से "निकलंग नाड़ी" का फूटना और "राम सरोवर" का खुदवाया जाना। रामदेवरा का सरोवर आज भी तीर्थ का केंद्र है।

· चौदहवाँ परचा — जाँभो (22)। यह गुरु जंभेश्वर (जंभोजी) का संकेत माना जाता है, जो बिश्नोई पंथ के प्रवर्तक थे और बाबा रामदेव के समकालीन कहे जाते हैं।

अंतिम छह चौपाइयों में कवि की विनय है — "मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ, कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ" (38) और "मती अनुसार रची चालीसा" (39)। नाम कहीं नहीं दिया।

एक बात और — दो अलग रामदेव चालीसाएँ प्रचलित हैं। यह वाली अधिक व्यापक रूप से छपती है। दूसरी "जय जय रामदेव जयकारी, विपदा हरो तुम आन हमारी" से शुरू होती है और उसमें "नन्द" की छाप है; वह अलग रचना है, इसी का पाठ-भेद नहीं।

संपूर्ण चालीसा

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श्री गुरु पद नमन करि, गिरा गनेश मनाय। कथूं रामदेव विमल यश, सुने पाप विनशाय॥

श्री गुरु के चरणों में नमन कर, वाणी (सरस्वती) और गणेश को मनाकर मैं रामदेव का निर्मल यश कहता हूँ — जिसे सुनने से पाप नष्ट हो जाते हैं।

द्वार केश से आय कर, लिया मनुज अवतार। अजमल गेह बधावणा, जग में जय जयकार॥

द्वारका से आकर उन्होंने मनुष्य का अवतार लिया; अजमल के घर बधाई बजी और जगत में जय-जयकार हुई।

जय जय रामदेव सुर राया। अजमल पुत्र अनोखी माया॥

हे रामदेव, देवताओं के राजा, आपकी जय हो; अजमल के पुत्र, आपकी माया अनोखी है।

विष्णु रूप सुर नर के स्वामी। परम प्रतापी अन्तर्यामी॥

आप विष्णु के रूप हैं, देवों और मनुष्यों के स्वामी; परम प्रतापी और सबके अंतर की जानने वाले।

ले अवतार अवनि पर आये। तंवर वंश अवतंश कहाये॥

आप अवतार लेकर पृथ्वी पर आए और तँवर वंश के शिरोमणि कहलाए।

संत जनों के कारज सारे। दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥

आपने संतजनों के सब काम सँवारे और दानव, दैत्य तथा दुष्टों का संहार किया।

परच्या प्रथम पिता को दीन्हा। दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥

पहला परचा (चमत्कार) पिता को दिया — दूध के परींडे में उसे दिखा दिया।

कुमकुम पद पोली दर्शाये। ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥

पालने में प्रकट होते ही आपने कुमकुम-भरे चरणों की छाप द्वार पर दिखा दी।

परचा दूजा जननी पाया। दूध उफणता चरा उठाया॥

दूसरा परचा माता ने पाया — उबलते दूध का चूल्हा आपने उठा लिया।

परचा तीजा पुरजन पाया। चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥

तीसरा परचा नगरवासियों ने पाया — चिथड़ों का घोड़ा ही सचमुच का घोड़ा बन गया।

परच्या चौथा भैरव मारा। भक्त जनों का कष्ट निवारा॥

चौथा परचा भैरव-वध का था — इससे भक्तजनों का कष्ट दूर हुआ।

पंचम परच्या रतना पाया। पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥

पाँचवाँ परचा रतना ने पाया — पुंगल जाकर प्रभु ने उसे बंधन से छुड़ाया।

परच्या छठा विजयसिंह पाया। जला नगर शरणागत आया॥

छठा परचा विजयसिंह ने पाया, जो नगर जलने पर शरण में आया था।

परच्या सप्तम् सुगना पाया। मुवा पुत्र हंसता भग आया॥

सातवाँ परचा सुगना ने पाया — उसका मरा हुआ पुत्र हँसता हुआ लौट आया।

परच्या अष्टम् बौहित पाया। जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥

आठवाँ परचा बोहित ने पाया, जो परदेश जाकर बहुत धन लाया था।

भंवर डूबती नाव उबारी। प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥

भँवर में डूबती उसकी नाव आपने उबार ली — पुकार सुनते ही अवतारी प्रकट होकर पहुँच गए।

नवमां परच्या वीरम पाया। बनियां आ जब हाल सुनाया॥

नौवाँ परचा वीरम ने पाया, जब वह बनिया आकर अपना हाल सुनाने लगा।

दसवां परच्या पा बिनजारा। मिश्री बनी नमक सब खारा॥

दसवाँ परचा एक बंजारे ने पाया — उसकी मिश्री नमक बन गई और सब खारा हो गया।

परच्या ग्यारह किरपा थारी। नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥

ग्यारहवाँ परचा आपकी कृपा का था — वही नमक फिर सारा मिश्री हो गया।

परच्या द्वादश ठोकर मारी। निकलंग नाड़ी सिरजी प्यारी॥

बारहवाँ परचा ठोकर मारने का — उससे प्यारी निकलंग नाड़ी (जल-स्रोत) सृजित हो गई।

परच्या तेरहवां पीर परी पधारया। ल्याय कटोरा कारज सारा॥

तेरहवाँ परचा तब हुआ जब पीर पधारे — आप उनका कटोरा ले आए और काम सँवार दिया।

चौदहवां परच्या जाभो पाया। निजसर जल खारा करवाया॥

चौदहवाँ परचा जाँभो (जंभेश्वर) ने पाया — उन्होंने अपने सरोवर का जल खारा करवा दिया था।

परच्या पन्द्रह फिर बतलाया। राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥

पंद्रहवाँ परचा फिर बताया गया — प्रभु ने राम-सरोवर खुदवा दिया।

परच्या सोलह हरबू पाया। दर्श पाय अतिशय हरषाया॥

सोलहवाँ परचा हरबू ने पाया — दर्शन पाकर वह अत्यंत हर्षित हुआ।

परच्या सत्रह हर जी पाया। दूध थणा बकरया के आया॥

सत्रहवाँ परचा हरजी ने पाया — बकरी के थनों में दूध उतर आया।

सुखी नाडी पानी कीन्हों। आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥

सूखी नाड़ी में आपने पानी कर दिया, और हरजी को आत्मज्ञान दे दिया।

परच्या अठारहवां हाकिम पाया। सूते को धरती लुढ़काया॥

अठारहवाँ परचा हाकिम ने पाया — सोते हुए को धरती ने लुढ़का दिया।

परच्या उन्नीसवां दल जी पाया। पुत्र पाय मन में हरषाया॥

उन्नीसवाँ परचा दलजी ने पाया — पुत्र पाकर उनका मन हर्ष से भर गया।

परच्या बीसवां पाया सेठाणी। आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥

बीसवाँ परचा एक सेठानी ने पाया — उसकी गद्गद वाणी सुनकर प्रभु आ पहुँचे।

तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा। उक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥

उन्होंने तुरंत सेठ को जीवित कर दिया और अभय का स्पष्ट वरदान दे दिया।

परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया। हो अन्धा करनी फल पाया॥

इक्कीसवाँ परचा उस चोर ने पाया, जो अपनी करनी का फल पाकर अंधा हो गया।

परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां। सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥

बाईसवाँ परचा मिर्ज़ा ने चाहा — प्रभु ने सातों तवे एक साथ बेध दिए।

परच्या तेईसवां बादशाह पाया। फेर भक्त को नहीं सताया॥

तेईसवाँ परचा बादशाह ने पाया — उसके बाद उसने भक्तों को फिर कभी नहीं सताया।

परच्या चौबीसवां बख्शी पाया। मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥

चौबीसवाँ परचा बख्शी ने पाया — उसका मरा हुआ पुत्र पल भर में उठ खड़ा हुआ।

जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां। तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥

जब-जब जिसने आपका स्मरण किया, तब-तब आपने आकर दर्शन दिए।

भक्त टेर सुन आतुर धाते। चढ़ लीले पर जल्दी आते॥

भक्त की पुकार सुनकर आप आतुर होकर दौड़ पड़ते हैं और लीले घोड़े पर चढ़कर तुरंत आ जाते हैं।

जो जन प्रभु की लीला गावें। मनवांछित कारज फल पावें॥

जो जन प्रभु की लीला गाते हैं, उन्हें मनचाहे कार्य का फल मिलता है।

यह चालीसा सुने सुनावे। ताके कष्ट सकल कट जावे॥

जो यह चालीसा सुने या सुनाए, उसके सारे कष्ट कट जाते हैं।

जय जय जय प्रभु लीला धारी। तेरी महिमा अपरम्पारी॥

हे लीला धारण करने वाले प्रभु, आपकी जय हो, जय हो; आपकी महिमा अपरम्पार है।

मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ। कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥

मैं मूरख आपके क्या गुण गाऊँ — शारदा जैसी बुद्धि कहाँ से लाऊँ?

नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा। मती अनुसार रची चालीसा॥

मुझमें लव-लेश भर भी बुद्धि-बल नहीं; अपनी मति के अनुसार ही यह चालीसा रची है।

दास सभी शरण में तेरी। रखियों प्रभु लज्जा मेरी॥

सब दास आपकी शरण में हैं — हे प्रभु, मेरी लाज रखियेगा।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. श्री गुरु के चरणों में नमन कर, वाणी (सरस्वती) और गणेश को मनाकर मैं रामदेव का निर्मल यश कहता हूँ — जिसे सुनने से पाप नष्ट हो जाते हैं।
  2. द्वारका से आकर उन्होंने मनुष्य का अवतार लिया; अजमल के घर बधाई बजी और जगत में जय-जयकार हुई।
  3. हे रामदेव, देवताओं के राजा, आपकी जय हो; अजमल के पुत्र, आपकी माया अनोखी है।
  4. आप विष्णु के रूप हैं, देवों और मनुष्यों के स्वामी; परम प्रतापी और सबके अंतर की जानने वाले।
  5. आप अवतार लेकर पृथ्वी पर आए और तँवर वंश के शिरोमणि कहलाए।
  6. आपने संतजनों के सब काम सँवारे और दानव, दैत्य तथा दुष्टों का संहार किया।
  7. पहला परचा (चमत्कार) पिता को दिया — दूध के परींडे में उसे दिखा दिया।
  8. पालने में प्रकट होते ही आपने कुमकुम-भरे चरणों की छाप द्वार पर दिखा दी।
  9. दूसरा परचा माता ने पाया — उबलते दूध का चूल्हा आपने उठा लिया।
  10. तीसरा परचा नगरवासियों ने पाया — चिथड़ों का घोड़ा ही सचमुच का घोड़ा बन गया।
  11. चौथा परचा भैरव-वध का था — इससे भक्तजनों का कष्ट दूर हुआ।
  12. पाँचवाँ परचा रतना ने पाया — पुंगल जाकर प्रभु ने उसे बंधन से छुड़ाया।
  13. छठा परचा विजयसिंह ने पाया, जो नगर जलने पर शरण में आया था।
  14. सातवाँ परचा सुगना ने पाया — उसका मरा हुआ पुत्र हँसता हुआ लौट आया।
  15. आठवाँ परचा बोहित ने पाया, जो परदेश जाकर बहुत धन लाया था।
  16. भँवर में डूबती उसकी नाव आपने उबार ली — पुकार सुनते ही अवतारी प्रकट होकर पहुँच गए।
  17. नौवाँ परचा वीरम ने पाया, जब वह बनिया आकर अपना हाल सुनाने लगा।
  18. दसवाँ परचा एक बंजारे ने पाया — उसकी मिश्री नमक बन गई और सब खारा हो गया।
  19. ग्यारहवाँ परचा आपकी कृपा का था — वही नमक फिर सारा मिश्री हो गया।
  20. बारहवाँ परचा ठोकर मारने का — उससे प्यारी निकलंग नाड़ी (जल-स्रोत) सृजित हो गई।
  21. तेरहवाँ परचा तब हुआ जब पीर पधारे — आप उनका कटोरा ले आए और काम सँवार दिया।
  22. चौदहवाँ परचा जाँभो (जंभेश्वर) ने पाया — उन्होंने अपने सरोवर का जल खारा करवा दिया था।
  23. पंद्रहवाँ परचा फिर बताया गया — प्रभु ने राम-सरोवर खुदवा दिया।
  24. सोलहवाँ परचा हरबू ने पाया — दर्शन पाकर वह अत्यंत हर्षित हुआ।
  25. सत्रहवाँ परचा हरजी ने पाया — बकरी के थनों में दूध उतर आया।
  26. सूखी नाड़ी में आपने पानी कर दिया, और हरजी को आत्मज्ञान दे दिया।
  27. अठारहवाँ परचा हाकिम ने पाया — सोते हुए को धरती ने लुढ़का दिया।
  28. उन्नीसवाँ परचा दलजी ने पाया — पुत्र पाकर उनका मन हर्ष से भर गया।
  29. बीसवाँ परचा एक सेठानी ने पाया — उसकी गद्गद वाणी सुनकर प्रभु आ पहुँचे।
  30. उन्होंने तुरंत सेठ को जीवित कर दिया और अभय का स्पष्ट वरदान दे दिया।
  31. इक्कीसवाँ परचा उस चोर ने पाया, जो अपनी करनी का फल पाकर अंधा हो गया।
  32. बाईसवाँ परचा मिर्ज़ा ने चाहा — प्रभु ने सातों तवे एक साथ बेध दिए।
  33. तेईसवाँ परचा बादशाह ने पाया — उसके बाद उसने भक्तों को फिर कभी नहीं सताया।
  34. चौबीसवाँ परचा बख्शी ने पाया — उसका मरा हुआ पुत्र पल भर में उठ खड़ा हुआ।
  35. जब-जब जिसने आपका स्मरण किया, तब-तब आपने आकर दर्शन दिए।
  36. भक्त की पुकार सुनकर आप आतुर होकर दौड़ पड़ते हैं और लीले घोड़े पर चढ़कर तुरंत आ जाते हैं।
  37. जो जन प्रभु की लीला गाते हैं, उन्हें मनचाहे कार्य का फल मिलता है।
  38. जो यह चालीसा सुने या सुनाए, उसके सारे कष्ट कट जाते हैं।
  39. हे लीला धारण करने वाले प्रभु, आपकी जय हो, जय हो; आपकी महिमा अपरम्पार है।
  40. मैं मूरख आपके क्या गुण गाऊँ — शारदा जैसी बुद्धि कहाँ से लाऊँ?
  41. मुझमें लव-लेश भर भी बुद्धि-बल नहीं; अपनी मति के अनुसार ही यह चालीसा रची है।
  42. सब दास आपकी शरण में हैं — हे प्रभु, मेरी लाज रखियेगा।

लाभ

  • बाबा रामदेव के चौबीस परचे एक ही पाठ में, क्रम और भक्त-नाम सहित।
  • भादवा मेले और "बाबे री बीज" का प्रमुख पाठ।
  • रामसा पीर नाम की जड़ — पीरों के कटोरे वाला तेरहवाँ परचा (चौपाई 21)।
  • पाठ छोटा है — 40 चौपाइयाँ, लगभग 8–10 मिनट।

कब करें पाठ

भादवा सुदी बीज ("बाबे री बीज") परभादवा मेले के दिनों मेंहर माह की शुक्ल द्वितीया कोमन्नत माँगते या पूरी होने पर

पाठ विधि

बाबा रामदेव के चित्र या पगल्या (चरण-चिह्न) के समक्ष दीप जलाएँ; नेजा (ध्वज), लीला घोड़ा और पुष्प अर्पित करना परंपरा है। "जय बाबा री" का स्मरण कर पहले दोनों दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ पढ़ें। परचों की गिनती बीच में न तोड़ें — वह क्रम ही पाठ का ढाँचा है। प्रसाद में चूरमा या मीठे चावल बाँटे जाते हैं।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — रामदेव चालीसा (आधार-पाठ) · dharmsaar.com — श्री रामदेव चालीसा · bhaktibharat.com — श्री रामदेव चालीसा · ⚠️ "जय जय रामदेव जयकारी" वाली चालीसा (bhajandiary.com, theraigarsamaj.com) अलग रचना है; वह यहाँ नहीं ली गई।
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री रामदेव पीर चालीसा — सामान्य प्रश्न