श्री विश्वकर्मा चालीसा

śrī viśvakarmā cālīsā

Vishwakarma Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
विश्वकर्मा पूजा (कन्या संक्रांति, 17 सितंबर); कार्य-आरंभ
उद्देश्य:शुभ आरंभ (Auspicious start)कार्य-सिद्धि (Success at work)समृद्धि (Prosperity)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री विश्वकर्मा चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में चलती है। चौपाइयाँ "जय श्री विश्वकर्म भगवाना, जय विश्वेश्वर कृपा निधाना" से शुरू होती हैं। इसका बड़ा हिस्सा यह गिनाता है कि विश्वकर्मा ने किस देवता को कौन-सा आयुध गढ़कर दिया — विष्णु को चक्र, शंकर को शूल, इन्द्र को वज्र, वरुण को पाश।

परिचय

स्रोत: प्रचलित हिन्दी विश्वकर्मा चालीसा

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री विश्वकर्मा चालीसा
IASTśrī viśvakarmā cālīsā
मूल स्रोतप्रचलित हिन्दी विश्वकर्मा चालीसा
शुभ दिनविश्वकर्मा पूजा (कन्या संक्रांति, 17 सितंबर); कार्य-आरंभ
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा एक बात पर टिकी है — विश्वकर्मा वह हैं जिन्होंने बाक़ी सबके औज़ार बनाए।

परिचय (चौपाई 1–3). वे शिल्पाचार्य हैं, भुवना के पुत्र, आठवें वसु प्रभास के पुत्र। चालीसा कहती है कि शिल्प का ज्ञान जगत में उन्हीं ने उजागर किया।

स्वरूप (4–11). यहाँ एक असामान्य वर्णन है — वे एक मुख से लेकर पाँच मुख तक, और दो से दस भुजाओं तक दिखाए जाते हैं (चौपाई 7)। हाथों में चक्र, कमण्डल, शंख, धनुष-बाण, त्रिशूल और कमल — और उनके बीच एक औज़ार जो किसी और देवता के हाथ में नहीं मिलता: "सोहत सूत्र माप अनुरूपा" (9), यानी नापने की डोरी।

आयुधों का बँटवारा (13–16). यही इस चालीसा का केंद्र है: "विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं, अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं। इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा, तुम सबकी पूरण की आशा" (14–15)। देवताओं के प्रसिद्ध आयुध — सबके निर्माता एक ही।

सृष्टि का शिल्प (17–26). लोहा, काष्ठ, ताम्र, पाषाण और स्वर्ण; विद्युत, अग्नि, पवन, पृथ्वी और जल; बर्तन, भवन, यंत्र, सुगंध, औषधि। और फिर वह पंक्ति जिसे आधुनिक पाठक ध्यान से पढ़ता है — "अद्भुत रचे यान मनहारी, जल-थल-गगन मांहि-समचारी" (26): जल, थल और आकाश तीनों में चलने वाले यान।

फलश्रुति (36–40). "इक सौ आठ जाप कर जोई, छीजै विपत्ति महासुख होई" (37) — एक सौ आठ का जाप-विधान इसी चालीसा की अपनी बात है।

⚠️ एक बात साफ़ कह देनी चाहिए। इस चालीसा की सभी उपलब्ध प्रतियाँ एक ही डिजिटल पाठ से आती जान पड़ती हैं, और उसमें कुछ जगह छपाई बिगड़ी हुई है — "विविध व्सत हित यत्रं अपारा" (21), "भवन विभिषत" (20), और चौपाई 29 का दूसरा आधा जो पहले से तुक नहीं मिलाता। शुद्ध पाठ किसी प्रकाशित प्रति में नहीं मिला, इसलिए यहाँ कुछ भी अनुमान से नहीं बदला गया — जो छपा है, वही दिया गया है।

संपूर्ण चालीसा

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श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं, चरणकमल धरिध्यान। श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण, दीजै दया निधान॥

श्री विश्वकर्मा प्रभु की मैं वंदना करता हूँ और उनके चरण-कमलों में ध्यान धरता हूँ। हे दया के निधान, मुझे श्री (सम्पदा), शुभ, बल और शिल्प का गुण दीजिए।

जय श्री विश्वकर्म भगवाना। जय विश्वेश्वर कृपा निधाना॥

हे श्री विश्वकर्म भगवान, आपकी जय हो; हे विश्वेश्वर, आप कृपा के निधान हैं।

शिल्पाचार्य परम उपकारी। भुवना-पुत्र नाम छविकारी॥

आप शिल्पाचार्य हैं और परम उपकारी; भुवना के पुत्र — यही आपका शोभायमान नाम है।

अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर। शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर॥

आप आठवें वसु प्रभास के कुशल पुत्र हैं; आपने शिल्प का ज्ञान जगत में उजागर किया।

अद्भुत सकल सृष्टि के कर्ता। सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता॥

आप समस्त सृष्टि के अद्भुत रचयिता हैं; सत्य, ज्ञान और श्रुति को जगत के हित में धारण करने वाले।

अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं। कोई विश्व मंह जानत नाही॥

जगत में आपका तेज अतुल है; विश्व में उसे कोई जान नहीं पाता।

विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा। अद्भुत वरण विराज सुवेशा॥

आप विश्व-सृष्टि के कर्ता और विश्वेश हैं; आपका वर्ण अद्भुत है और सुंदर वेश में आप विराजते हैं।

एकानन पंचानन राजे। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे॥

आप कभी एक मुख वाले और कभी पाँच मुख वाले विराजते हैं; दो, चार और दस भुजाओं में भी सजते हैं।

चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे। वारि कमण्डल वर कर लीन्हे॥

आपने सुदर्शन चक्र धारण किया है; एक हाथ में जल का श्रेष्ठ कमण्डल लिया है।

शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा। सोहत सूत्र माप अनुरूपा॥

अनुपम शिल्पशास्त्र और शंख भी हैं; माप का सूत्र (नापने की डोरी) आप पर शोभा देता है।

धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे। नौवें हाथ कमल मन मोहे॥

धनुष, बाण और त्रिशूल सुशोभित हैं; नौवें हाथ का कमल मन मोह लेता है।

दसवां हस्त बरद जग हेतु। अति भव सिंधु मांहि वर सेतु॥

दसवाँ हाथ जगत के लिए वरद है — यह भव-सागर को पार कराने वाला श्रेष्ठ सेतु है।

सूरज तेज हरण तुम कियऊ। अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ॥

आपने सूर्य का तेज हर लिया, और उसी से अस्त्र-शस्त्र गढ़ दिए।

चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका। दण्ड पालकी शस्त्र अनेका॥

चक्र, शक्ति, त्रिशूल, दण्ड और पालकी — ऐसे अनेक शस्त्र आपने बनाए।

विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं। अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं॥

विष्णु को चक्र, शंकर को शूल, ब्रह्मा को शक्ति और यमराज को दण्ड —

इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा। तुम सबकी पूरण की आशा॥

इन्द्र को वज्र और वरुण को पाश दिया; आपने सबकी आशा पूरी की।

भांति-भांति के अस्त्र रचाए। सतपथ को प्रभु सदा बचाए॥

आपने भाँति-भाँति के अस्त्र रचे, ताकि प्रभु सत्य के मार्ग की सदा रक्षा करें।

अमृत घट के तुम निर्माता। साधु संत भक्तन सुर त्राता॥

अमृत के घट के निर्माता भी आप ही हैं; साधु, संत, भक्त और देवताओं की रक्षा करने वाले।

लौह काष्ट ताम्र पाषाणा। स्वर्ण शिल्प के परम सजाना॥

लोहा, काष्ठ, ताम्र और पाषाण — तथा स्वर्ण के शिल्प के आप परम जानकार हैं।

विद्युत अग्नि पवन भू वारी। इनसे अद्भुत काज सवारी॥

विद्युत, अग्नि, पवन, पृथ्वी और जल — इनसे आपने अद्भुत कार्य सँवारे।

खान-पान हित भाजन नाना। भवन विभिषत विविध विधाना॥

खान-पान के लिए अनेक प्रकार के बर्तन और विविध विधि के सुसज्जित भवन —

विविध व्सत हित यत्रं अपारा। विरचेहु तुम समस्त संसारा॥

तथा भाँति-भाँति की वस्तुओं के लिए अपार यंत्र; यह समस्त संसार आपने ही रचा है।

द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका। विविध महा औषधि सविवेका॥

सुगंधित द्रव्य और अनेक पुष्प, तथा विवेक से चुनी अनेक महा औषधियाँ भी आपकी रचना हैं।

शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला। वरुण कुबेर अग्नि यमकाला॥

शंभु, विरंचि (ब्रह्मा), विष्णु, इन्द्र, वरुण, कुबेर, अग्नि और यमराज —

तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ। करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ॥

सब मिलकर आपके पास गए, प्रणाम किया और फिर स्तुति आरंभ की।

भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका। कियउ काज सब भये अशोका॥

देवताओं का शोक देखकर प्रभु तुरंत तत्पर हो गए; काम कर दिया और सब शोकरहित हो गए।

अद्भुत रचे यान मनहारी। जल-थल-गगन मांहि-समचारी॥

आपने मन हरने वाले अद्भुत यान रचे, जो जल, थल और आकाश — तीनों में चलते हैं।

शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही। विज्ञान कह अंतर नाही॥

शिव और विश्वकर्मा प्रभु में विज्ञान कोई अंतर नहीं बताता।

बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा। सकल सृष्टि है तव विस्तारा॥

आपका स्वरूप कौन वर्णन कर सकता है — यह समस्त सृष्टि ही आपका विस्तार है।

रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा। तुम बिन हरै कौन भव हारी॥

आपने विश्व के हित के लिए तीन प्रकार के शरीर रचे; आपके बिना भव का हरण और कौन करे?

मंगल-मूल भगत भय हारी। शोक रहित त्रैलोक विहारी॥

आप मंगल के मूल और भक्तों का भय हरने वाले हैं; शोक से रहित होकर तीनों लोकों में विचरते हैं।

चारो युग परताप तुम्हारा। अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा॥

चारों युगों में आपका प्रताप रहा है; आपसे विश्व में उजाला हुआ — यह प्रसिद्ध है।

ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता। वर विज्ञान वेद के ज्ञाता॥

आप ऋद्धि और सिद्धि के वरदाता हैं; श्रेष्ठ विज्ञान और वेद के ज्ञाता हैं।

मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा। सबकी नित करतें हैं रक्षा॥

मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और तक्षा — ये सब नित्य रक्षा करते हैं।

पंच पुत्र नित जग हित धर्मा। हवै निष्काम करै निज कर्मा॥

आपके पाँचों पुत्र जगत के हित का धर्म निभाते हैं और निष्काम भाव से अपना कर्म करते हैं।

प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई। विपदा हरै जगत मंह जोई॥

हे प्रभु, आपके समान कृपालु कोई नहीं; जगत में जो भी विपदा हो, आप हर लेते हैं।

जै जै जै भौवन विश्वकर्मा। करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा॥

हे भुवन के विश्वकर्मा, आपकी जय हो, जय हो; हे सुधर्मा गुरुदेव, कृपा कीजिए।

इक सौ आठ जाप कर जोई। छीजै विपत्ति महासुख होई॥

जो एक सौ आठ बार जाप करे, उसकी विपत्ति क्षीण होती है और महासुख मिलता है।

पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा। होय सिद्ध साक्षी गौरीशा॥

जो यह विश्वकर्म-चालीसा पढ़ता है, गौरीश (शिव) की साक्षी में वह सिद्ध हो जाता है।

विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे। हो प्रसन्न हम बालक तेरे॥

हे विश्व के विश्वकर्मा, आप मेरे प्रभु हैं; प्रसन्न होइए — हम आपके बालक हैं।

मैं हूं सदा उमापति चेरा। सदा करो प्रभु मन मंह डेरा॥

मैं सदा उमापति (शिव) का सेवक हूँ; हे प्रभु, सदा मेरे मन में डेरा कीजिए।

करहु कृपा शंकर सरिस, विश्वकर्मा शिवरूप। श्री शुभदा रचना सहित, ह्रदय बसहु सूर भूप॥

हे विश्वकर्मा, आप शिव-रूप हैं — शंकर के समान कृपा कीजिए; श्री और शुभ देने वाली अपनी रचना सहित हृदय में बसिए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. श्री विश्वकर्मा प्रभु की मैं वंदना करता हूँ और उनके चरण-कमलों में ध्यान धरता हूँ। हे दया के निधान, मुझे श्री (सम्पदा), शुभ, बल और शिल्प का गुण दीजिए।
  2. हे श्री विश्वकर्म भगवान, आपकी जय हो; हे विश्वेश्वर, आप कृपा के निधान हैं।
  3. आप शिल्पाचार्य हैं और परम उपकारी; भुवना के पुत्र — यही आपका शोभायमान नाम है।
  4. आप आठवें वसु प्रभास के कुशल पुत्र हैं; आपने शिल्प का ज्ञान जगत में उजागर किया।
  5. आप समस्त सृष्टि के अद्भुत रचयिता हैं; सत्य, ज्ञान और श्रुति को जगत के हित में धारण करने वाले।
  6. जगत में आपका तेज अतुल है; विश्व में उसे कोई जान नहीं पाता।
  7. आप विश्व-सृष्टि के कर्ता और विश्वेश हैं; आपका वर्ण अद्भुत है और सुंदर वेश में आप विराजते हैं।
  8. आप कभी एक मुख वाले और कभी पाँच मुख वाले विराजते हैं; दो, चार और दस भुजाओं में भी सजते हैं।
  9. आपने सुदर्शन चक्र धारण किया है; एक हाथ में जल का श्रेष्ठ कमण्डल लिया है।
  10. अनुपम शिल्पशास्त्र और शंख भी हैं; माप का सूत्र (नापने की डोरी) आप पर शोभा देता है।
  11. धनुष, बाण और त्रिशूल सुशोभित हैं; नौवें हाथ का कमल मन मोह लेता है।
  12. दसवाँ हाथ जगत के लिए वरद है — यह भव-सागर को पार कराने वाला श्रेष्ठ सेतु है।
  13. आपने सूर्य का तेज हर लिया, और उसी से अस्त्र-शस्त्र गढ़ दिए।
  14. चक्र, शक्ति, त्रिशूल, दण्ड और पालकी — ऐसे अनेक शस्त्र आपने बनाए।
  15. विष्णु को चक्र, शंकर को शूल, ब्रह्मा को शक्ति और यमराज को दण्ड —
  16. इन्द्र को वज्र और वरुण को पाश दिया; आपने सबकी आशा पूरी की।
  17. आपने भाँति-भाँति के अस्त्र रचे, ताकि प्रभु सत्य के मार्ग की सदा रक्षा करें।
  18. अमृत के घट के निर्माता भी आप ही हैं; साधु, संत, भक्त और देवताओं की रक्षा करने वाले।
  19. लोहा, काष्ठ, ताम्र और पाषाण — तथा स्वर्ण के शिल्प के आप परम जानकार हैं।
  20. विद्युत, अग्नि, पवन, पृथ्वी और जल — इनसे आपने अद्भुत कार्य सँवारे।
  21. खान-पान के लिए अनेक प्रकार के बर्तन और विविध विधि के सुसज्जित भवन —
  22. तथा भाँति-भाँति की वस्तुओं के लिए अपार यंत्र; यह समस्त संसार आपने ही रचा है।
  23. सुगंधित द्रव्य और अनेक पुष्प, तथा विवेक से चुनी अनेक महा औषधियाँ भी आपकी रचना हैं।
  24. शंभु, विरंचि (ब्रह्मा), विष्णु, इन्द्र, वरुण, कुबेर, अग्नि और यमराज —
  25. सब मिलकर आपके पास गए, प्रणाम किया और फिर स्तुति आरंभ की।
  26. देवताओं का शोक देखकर प्रभु तुरंत तत्पर हो गए; काम कर दिया और सब शोकरहित हो गए।
  27. आपने मन हरने वाले अद्भुत यान रचे, जो जल, थल और आकाश — तीनों में चलते हैं।
  28. शिव और विश्वकर्मा प्रभु में विज्ञान कोई अंतर नहीं बताता।
  29. आपका स्वरूप कौन वर्णन कर सकता है — यह समस्त सृष्टि ही आपका विस्तार है।
  30. आपने विश्व के हित के लिए तीन प्रकार के शरीर रचे; आपके बिना भव का हरण और कौन करे?
  31. आप मंगल के मूल और भक्तों का भय हरने वाले हैं; शोक से रहित होकर तीनों लोकों में विचरते हैं।
  32. चारों युगों में आपका प्रताप रहा है; आपसे विश्व में उजाला हुआ — यह प्रसिद्ध है।
  33. आप ऋद्धि और सिद्धि के वरदाता हैं; श्रेष्ठ विज्ञान और वेद के ज्ञाता हैं।
  34. मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और तक्षा — ये सब नित्य रक्षा करते हैं।
  35. आपके पाँचों पुत्र जगत के हित का धर्म निभाते हैं और निष्काम भाव से अपना कर्म करते हैं।
  36. हे प्रभु, आपके समान कृपालु कोई नहीं; जगत में जो भी विपदा हो, आप हर लेते हैं।
  37. हे भुवन के विश्वकर्मा, आपकी जय हो, जय हो; हे सुधर्मा गुरुदेव, कृपा कीजिए।
  38. जो एक सौ आठ बार जाप करे, उसकी विपत्ति क्षीण होती है और महासुख मिलता है।
  39. जो यह विश्वकर्म-चालीसा पढ़ता है, गौरीश (शिव) की साक्षी में वह सिद्ध हो जाता है।
  40. हे विश्व के विश्वकर्मा, आप मेरे प्रभु हैं; प्रसन्न होइए — हम आपके बालक हैं।
  41. मैं सदा उमापति (शिव) का सेवक हूँ; हे प्रभु, सदा मेरे मन में डेरा कीजिए।
  42. हे विश्वकर्मा, आप शिव-रूप हैं — शंकर के समान कृपा कीजिए; श्री और शुभ देने वाली अपनी रचना सहित हृदय में बसिए।

लाभ

  • देवताओं के आयुध किसने गढ़े — चौपाई 13–16 में पूरा बँटवारा एक जगह।
  • विश्वकर्मा पूजा (कन्या संक्रांति) और यंत्र-पूजन का प्रमुख पाठ।
  • नए कार्य, निर्माण या कारखाने के आरंभ पर पढ़ी जाती है।
  • चौपाई 37 में एक सौ आठ जाप का अपना विधान दिया है।

कब करें पाठ

विश्वकर्मा पूजा (कन्या संक्रांति, प्रायः 17 सितंबर) परकारखाने, दुकान या यंत्र-पूजन के समयनए निर्माण या गृह-आरंभ परनया वाहन या औज़ार लेते समय

पाठ विधि

भगवान विश्वकर्मा के चित्र के समक्ष अपने औज़ार, यंत्र और वाहन रखकर उन्हें साफ़ करें — परंपरा में पूजा से पहले औज़ारों की सफ़ाई ही पहला चरण है। पुष्प, अक्षत, रोली और दीप अर्पित कर पहले दोहा, फिर चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहा पढ़ें। चौपाई 38 के अनुसार एक सौ आठ बार जाप का भी विधान है। पाठ के बाद आरती कर प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराaartichalisa.com — विश्वकर्मा चालीसा (आधार-पाठ) · dharmsaar.com — भगवान श्री विश्वकर्मा चालीसा · hindi.webdunia.com — श्री विश्वकर्मा चालीसा · srimandir.com — विश्वकर्मा चालीसा · chalisasangrah.in — श्री विश्वकर्मा चालीसा · hamarivirasat.com — विश्वकर्मा चालीसा · ⚠️ छहों प्रतियों में एक जैसे बिगाड़ हैं (व्सत, यत्रं, विभिषत); शुद्ध पाठ किसी में नहीं मिला।
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री विश्वकर्मा चालीसा — सामान्य प्रश्न