श्री खाटू श्याम

śrī khāṭū śyāma

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

परिचय

खाटू श्याम जी वस्तुतः महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — घटोत्कच तथा कामकटंकटा (मोर्वी) के पुत्र और भीम के पौत्र। उन्होंने महीसागर संगम के गुप्त क्षेत्र में नवदुर्गा की तपस्या कर दिव्य बल तथा तीन अमोघ बाण प्राप्त किए, इसीलिए वे "तीन बाण धारी" कहलाते हैं।

महाभारत युद्ध से पूर्व उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जो पक्ष हारेगा वे उसी की सहायता करेंगे। इस प्रतिज्ञा से युद्ध का अंत असंभव हो जाता, अतः श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में आकर उनसे शीश का दान माँगा। बर्बरीक तनिक भी विचलित नहीं हुए और शीश अर्पित कर दिया। प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में वे उन्हीं के नाम "श्याम" से पूजे जाएँगे। अमृत से सींचा गया वह शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी रहा।

कालांतर में राजस्थान के खाटू (सीकर) में एक गाय के स्वतः दूध बहाने से उस स्थान का पता चला, जहाँ खुदाई में उनका शिला-विग्रह प्राप्त हुआ और विधिवत प्रतिष्ठित किया गया। आज वही खाटू धाम है, जहाँ फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी को लक्खी मेला भरता है और प्रत्येक एकादशी विशेष मानी जाती है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि उनका कोई बीज-मंत्र किसी उपलब्ध स्रोत में प्रमाणित नहीं मिला — परंपरा में उनका आह्वान "जय श्री श्याम" के जयकारे से किया जाता है, इसलिए यहाँ कोई मंत्र गढ़कर नहीं दिया गया।

स्वरूप: शीश-रूप विग्रह; केसरिया बागा, रत्नजड़ित सिंहासन, सिर पर मुकुट व चँवर, गले में पुष्प-माला, हाथ में धनुष व तीन बाण तथा मोरछड़ी; वाहन नीला घोड़ा।

श्री खाटू श्याम भक्ति संग्रह

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मंत्र

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नामावली

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सहस्रनाम

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संक्षिप्त विवरण

अन्य नामश्याम बाबा, बर्बरीक, हारे का सहारा, तीन बाण धारी, शीश के दानी, लखदातार, खाटू नरेश
वाहननीला घोड़ा
क्षेत्रशरणागत रक्षा, त्याग व बलिदान, मनोकामना पूर्ति, हारे का सहारा

श्री खाटू श्याम — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न