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FAQ
श्री खाटू श्याम कथा — सामान्य प्रश्न
खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — घटोत्कच तथा कामकटंकटा (मोर्वी) के पुत्र, अर्थात भीम के पौत्र। उन्होंने श्रीकृष्ण के माँगने पर अपना शीश दान कर दिया था, और प्रसन्न होकर कृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में वे उन्हीं के नाम "श्याम" से पूजे जाएँगे। वे स्वयं कृष्ण नहीं हैं — कृष्ण ने उन्हें अपना *नाम* दिया, अपनी पहचान नहीं।
नहीं — और यह भूल बहुत जगह छपी मिलती है। बर्बरीक घटोत्कच के पुत्र हैं, स्वयं घटोत्कच नहीं। एक प्रचलित लेख में यही ग़लती है ("बाबा श्याम भीम और हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच थे"), जबकि उसी लेख में आगे सही भी लिखा है — "भीम पौत्र बर्बरीक"। इस संग्रह में उपलब्ध खाटू श्याम अष्टक स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि करता है: चौपाई 5 — *"जय घटोत्कच मुद वर्धमाना, बर्बरीक प्रसिद्ध अविधाना"*, और चौपाई 12 — *"जयति भैमिसुत…"*।
कारण बाण नहीं, एक प्रतिज्ञा थी। बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया था कि वे युद्ध में सदा हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे। इससे युद्ध कभी समाप्त ही नहीं होता — जिस क्षण वे किसी पक्ष से लड़ते, दूसरा कमज़ोर पड़ जाता और प्रतिज्ञा के अनुसार उन्हें तुरंत पाला बदलना पड़ता। इस अदला-बदली में दोनों सेनाएँ समाप्त हो जातीं और अंत में केवल वे ही बचते — धर्म-रक्षा का मूल उद्देश्य ही मिट जाता। इसीलिए कृष्ण ने ब्राह्मण वेश में उनसे शीश माँगा।
बर्बरीक ने गुप्त क्षेत्र में देवी की तपस्या कर तीन अमोघ बाण प्राप्त किए थे। स्रोत के अनुसार — पहला बाण लक्ष्यों को चिह्नित करता, दूसरा चिह्नित लक्ष्यों का नाश करता, और तीसरा लौट आता। इन्हीं तीन बाणों से वे पूरी सेनाओं को क्षण भर में समाप्त कर सकते थे, और इसीलिए वे "तीन बाण धारी" कहलाते हैं। पत्ते वाली परीक्षा में उन्होंने एक ही बाण से पेड़ के सारे पत्ते भेद दिए थे।
यहाँ स्रोत आपस में भिन्न हैं, और यह छिपाया नहीं गया। आधार कथा तथा खाटू श्याम अष्टक दोनों कहते हैं कि तपस्या नवदुर्गा / नवचण्डी की थी और स्थान महीसागर संगम का गुप्त क्षेत्र था (अष्टक की चौपाई 6–7: *"गुप्त क्षेत्र देवी आराधक"*, *"जय नव चण्डी शक्ति स्वरूपा"*)। किंतु एक तीसरा लेख देवी कामाख्या की तपस्या बताता है। दो स्रोत एक ओर हैं, इसलिए मुख्य पाठ में नवदुर्गा रखा गया — पर भेद यहाँ दर्ज है।
कथा बहुत सादी है। एक गाय प्रतिदिन एक ही स्थान पर खड़ी होकर अपने चारों थनों से दूध बहा देती थी। ग्वाले ने यह देखकर राजा को बताया। तब स्वप्न में श्री श्यामदेव ने कहा — *"मैं श्यामदेव हूँ; जहाँ गाय के थन से दूध निकलता है वहाँ मेरा शालिग्राम शिला-विग्रह है, खुदाई कराकर प्रतिष्ठित करा दो।"* खुदाई से प्राप्त विग्रह विधिवत प्रतिष्ठित किया गया। स्थापना पर स्रोत भिन्न हैं — एक "खंडेला के राजा" कहता है, दूसरा विक्रम संवत 1027 में राजा रूपसिंह चौहान का नाम देता है।
यह ईमानदारी से कहना चाहिए — कोई निश्चित उपवास-व्रत किसी उपलब्ध स्रोत में प्रमाणित नहीं मिला। न संकल्प के नियम, न उद्यापन की विधि — जैसी शनिवार अथवा साईं व्रत की हैं। जो वास्तव में परंपरा है वह यह है: प्रत्येक एकादशी का दर्शन, निशान यात्रा (पैदल चलकर ध्वजा चढ़ाना), ज्योत जलाना, और मंदिर की पाँच आरतियाँ। उपवास लेना या न लेना व्यक्तिगत संकल्प है। इसीलिए इस पृष्ठ पर कोई व्रत-विधि गढ़कर नहीं दी गई।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी, जब खाटू में लक्खी मेला भरता है — वर्ष का सबसे बड़ा अवसर। इसके अतिरिक्त प्रत्येक एकादशी खाटू परंपरा में विशेष मानी जाती है। मंदिर में प्रतिदिन पाँच आरतियाँ होती हैं — मंगला, श्रृंगार, राज-भोग, संध्या तथा शयन — जिनका समय गर्मी और सर्दी में अलग-अलग रहता है।
भोग में चूरमा सबसे प्रचलित है; साथ ही पंजीरी, खीर, मोदक तथा मिश्री। खाटू श्याम आरती की पंक्ति स्वयं कहती है — *"मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे"*। अर्पण में केसरिया या लाल वस्त्र, पुष्प-माला, मोरछड़ी तथा इत्र विशेष माने जाते हैं। यदि खाटू यात्रा का संकल्प हो तो परंपरा में निशान (ध्वजा) पैदल चलकर चढ़ाया जाता है।
विग्रह की प्रतिष्ठा के बाद इतिहास संघर्ष का रहा। चौहान वंश की नर्बदा कंवर ने विग्रह को आक्रमणकारियों से बचाने हेतु झोपड़े में रखकर सेवा-पूजा की। औरंगज़ेब के शासनकाल में पुराना मंदिर ध्वस्त हो गया; उसके बाद जहाँ विग्रह प्रतिष्ठित किया गया वह स्थान आज भी विद्यमान है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज भी नर्बदा कंवर के ही खानदान के चौहान राजपूत वहाँ पुजारी हैं — एक परिवार की सेवा-परंपरा सदियों से अटूट है।
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