श्याम पुष्पांजलि

śyāma puṣpāñjali

Shyam Pushpanjali (Khatu Shyam)

समय
2–3 मिनट
श्लोक
6
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
प्रत्येक एकादशी; फाल्गुन शुक्ल द्वादशी (लक्खी मेला)
उद्देश्य:शरणागत रक्षा (Refuge)मनोकामना पूर्ति (Fulfilment of Wishes)दर्शन-लाभ (Darshan)
✓ संपूर्ण (6/6 श्लोक)

श्याम पुष्पांजलि खाटू श्याम की ढूँढाड़ी (राजस्थानी) बोली में रची विनती है, जिसके कवि आलू सिंह स्वयं पाठ में अपना नाम दर्ज करते हैं। इसमें फाल्गुन शुक्ल द्वादशी का उत्सव और खाटू नगर का नाम आता है। पाठ 2–3 मिनट का है।

परिचय

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

स्रोत: खाटू श्याम की स्तुति में ढूँढाड़ी बोली की पुष्पांजलि-विनती

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्याम पुष्पांजलि
IASTśyāma puṣpāñjali
देवताश्री खाटू श्याम
मूल स्रोतखाटू श्याम की स्तुति में ढूँढाड़ी बोली की पुष्पांजलि-विनती
शुभ दिनप्रत्येक एकादशी; फाल्गुन शुक्ल द्वादशी (लक्खी मेला)
पाठ समय2–3 मिनट
कठिनाईसरल (Beginner)
छंददोहा-चाल (ढूँढाड़ी)

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्याम पुष्पांजलि खाटू श्याम की स्तुति में रची गई एक छोटी विनती है — चार पद, एक समापन-दोहा और अंत में जयकारा। रचना स्वयं को "पुष्पांजलि" कहती है, अर्थात पुष्प-अर्पण के भाव की प्रार्थना।

पहली बात स्पष्ट कर देनी चाहिए: यह संस्कृत स्तोत्रम् नहीं है। यह ढूँढाड़ी बोली में है — राजस्थान के जयपुर-सीकर क्षेत्र की भाषा, जिसे रचना स्वयं "ढूँढारो देश" कहकर पहचानती है। "सुणियों", "आ गयो", "बण्यों", "रखियो", "बैठ्यो" जैसे रूप उसी बोली के हैं। इसीलिए इसे संस्कृत स्तोत्र की तरह नहीं, गाकर पढ़ा जाता है।

इस रचना की सबसे मूल्यवान बात यह है कि इसका कवि ज्ञात है — और वह भी पाठ के भीतर से। चौथे पद की पंक्ति है: *"आलू सिंह तो प्रेम से धरे श्याम को ध्यान"*। यह कवि-छाप है, जिसे भक्ति-काव्य की परंपरा में कवि अपनी रचना के अंत के पास स्वयं रखता है। खाटू श्याम की अधिकांश रचनाओं के रचयिता अज्ञात हैं, इसलिए यह उल्लेखनीय है। (तुलना के लिए — इसी संग्रह में उपलब्ध खाटू श्याम अष्टक तथा चालीसा की सीकर वाचना में छाप "विप्लव" है, अर्थात वे किसी दूसरे कवि की हैं।)

रचना दो ठोस तथ्य भी स्वयं दर्ज कर देती है। पहला — तिथि: *"फाल्गुन शुक्ला द्वादशी उत्सव भारी होए"*, अर्थात खाटू का लक्खी मेला फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को होता है। दूसरा — स्थान: *"धन्य ढूंढारो देश हैं खाटू नगर सुजान"* तथा *"खाटू नगर के बीच में बण्यों आपको धाम"*।

भाव की दृष्टि से इसका केंद्र दूसरे और तीसरे पद में है। दूसरा पद कहता है — *"श्याम श्याम तो मैं रटूं, श्याम है जीवन प्राण"*; और उसके तुरंत बाद वह जो कहता है वह असामान्य है: *"श्याम भक्त जग में बड़े, उनको करूँ प्रणाम"* — अर्थात कवि भक्तों को भी प्रणाम करता है, केवल देवता को नहीं।

तीसरे पद में वह पंक्ति है जिस पर खाटू की सारी प्रतिष्ठा टिकी है — *"बाबा के दरबार से खाली जाये न कोय"*। और उसी पद में उमापति (शिव), लक्ष्मीपति (विष्णु) तथा सीतापति (श्रीराम) का स्मरण करते हुए प्रार्थना की गई है कि सबकी लज्जा रखिए।

अंत का जयकारा — *"लीलो घोड़ो लाल लगाम, जिस पर बैठ्यो बाबो श्याम"* — केवल जयकारा नहीं; यही पंक्ति खाटू श्याम के वाहन नीले घोड़े का आधार है, जो उनकी लोक-छवि का सबसे पहचाना अंग है।

संपूर्ण स्तोत्र

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हाथ जोड़ विनती करूं सुणियों चित्त लगाय, दास आ गयो शरण में रखियो इसकी लाज, धन्य ढूंढारो देश हैं खाटू नगर सुजान, अनुपम छवि श्री श्याम की, दर्शन से कल्याण।

हाथ जोड़कर विनती करता हूँ — चित्त लगाकर सुनिए। यह दास आपकी शरण में आ गया है, इसकी लाज रखिए। धन्य है ढूँढार देश और सुजान खाटू नगर; श्री श्याम की छवि अनुपम है और उनके दर्शन से ही कल्याण हो जाता है। ("ढूँढार" जयपुर-सीकर क्षेत्र का पुराना नाम है — रचना स्थानीय ढूँढाड़ी बोली में है।)

श्याम श्याम तो मैं रटूं श्याम है जीवन प्राण, श्याम भक्त जग में बड़े उनको करूँ प्रणाम, खाटू नगर के बीच में बण्यों आपको धाम, फाल्गुन शुक्ला मेला भरे जय जय बाबा श्याम।

मैं तो श्याम-श्याम ही रटता हूँ; श्याम ही जीवन-प्राण हैं। जगत में श्याम-भक्त बड़े हैं, उन्हें भी मैं प्रणाम करता हूँ। खाटू नगर के बीच आपका धाम बना है, जहाँ फाल्गुन शुक्ल में मेला भरता है — जय जय बाबा श्याम।

फाल्गुन शुक्ला द्वादशी उत्सव भारी होए, बाबा के दरबार से खाली जाये न कोय, उमा पति लक्ष्मी पति सीता पति श्री राम, लज्जा सब की रखियो खाटू के बाबा श्याम।

फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भारी उत्सव होता है, और बाबा के दरबार से कोई खाली नहीं जाता। उमापति (शिव), लक्ष्मीपति (विष्णु) तथा सीतापति (श्रीराम) — इन सबका स्मरण करते हुए प्रार्थना है कि हे खाटू के बाबा श्याम, सबकी लज्जा रखिए। यह पद लक्खी मेले की तिथि सीधे दर्ज कर देता है।

पान सुपारी इलायची इत्तर सुगंध भरपूर, सब भक्तों की विनती दर्शन देवो हुजूर, आलू सिंह तो प्रेम से धरे श्याम को ध्यान, श्याम भक्त पावे सदा श्याम कृपा से मान।

पान, सुपारी, इलायची तथा इत्र की सुगंध भरपूर है; सब भक्तों की विनती है कि हे हुज़ूर, दर्शन दीजिए। आलू सिंह प्रेम से श्याम का ध्यान धरते हैं; श्याम-भक्त सदा उनकी कृपा से मान पाता है। यहाँ कवि अपना नाम स्वयं दर्ज करता है — "आलू सिंह" इस रचना की कवि-छाप है।

हाथ जोड़ विनती करूँ सुणियों चित्त लगाय, अनुपम छवि श्री श्याम की दर्शन से कल्याण।

समापन: हाथ जोड़कर विनती करता हूँ — चित्त लगाकर सुनिए; श्री श्याम की छवि अनुपम है और दर्शन से ही कल्याण होता है। रचना उसी पंक्ति पर लौट आती है जिससे आरंभ हुई थी।

जय श्री श्याम बोलो जय श्री श्याम, खाटू वाले बाबा जय श्री श्याम। लीलो घोड़ो लाल लगाम, जिस पर बैठ्यो बाबो श्याम॥

जयकारा: बोलो जय श्री श्याम, खाटू वाले बाबा की जय श्री श्याम। नीला घोड़ा और लाल लगाम — जिस पर बाबा श्याम बैठे हैं। यही वह जयकारा है जिससे परंपरा में उनका आह्वान होता है, और यही पंक्ति उनके वाहन नीले घोड़े का आधार भी है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हाथ जोड़कर विनती करता हूँ — चित्त लगाकर सुनिए। यह दास आपकी शरण में आ गया है, इसकी लाज रखिए। धन्य है ढूँढार देश और सुजान खाटू नगर; श्री श्याम की छवि अनुपम है और उनके दर्शन से ही कल्याण हो जाता है। ("ढूँढार" जयपुर-सीकर क्षेत्र का पुराना नाम है — रचना स्थानीय ढूँढाड़ी बोली में है।)
  2. मैं तो श्याम-श्याम ही रटता हूँ; श्याम ही जीवन-प्राण हैं। जगत में श्याम-भक्त बड़े हैं, उन्हें भी मैं प्रणाम करता हूँ। खाटू नगर के बीच आपका धाम बना है, जहाँ फाल्गुन शुक्ल में मेला भरता है — जय जय बाबा श्याम।
  3. फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भारी उत्सव होता है, और बाबा के दरबार से कोई खाली नहीं जाता। उमापति (शिव), लक्ष्मीपति (विष्णु) तथा सीतापति (श्रीराम) — इन सबका स्मरण करते हुए प्रार्थना है कि हे खाटू के बाबा श्याम, सबकी लज्जा रखिए। यह पद लक्खी मेले की तिथि सीधे दर्ज कर देता है।
  4. पान, सुपारी, इलायची तथा इत्र की सुगंध भरपूर है; सब भक्तों की विनती है कि हे हुज़ूर, दर्शन दीजिए। आलू सिंह प्रेम से श्याम का ध्यान धरते हैं; श्याम-भक्त सदा उनकी कृपा से मान पाता है। यहाँ कवि अपना नाम स्वयं दर्ज करता है — "आलू सिंह" इस रचना की कवि-छाप है।
  5. समापन: हाथ जोड़कर विनती करता हूँ — चित्त लगाकर सुनिए; श्री श्याम की छवि अनुपम है और दर्शन से ही कल्याण होता है। रचना उसी पंक्ति पर लौट आती है जिससे आरंभ हुई थी।
  6. जयकारा: बोलो जय श्री श्याम, खाटू वाले बाबा की जय श्री श्याम। नीला घोड़ा और लाल लगाम — जिस पर बाबा श्याम बैठे हैं। यही वह जयकारा है जिससे परंपरा में उनका आह्वान होता है, और यही पंक्ति उनके वाहन नीले घोड़े का आधार भी है।

लाभ

  • तीसरे पद की पंक्ति "बाबा के दरबार से खाली जाये न कोय" — खाटू की सबसे प्रचलित प्रतिष्ठा यही है।
  • पहला पद शरणागति का है — "दास आ गयो शरण में रखियो इसकी लाज"।
  • रचना छोटी है (2–3 मिनट), अतः नित्य पाठ अथवा दर्शन-यात्रा के समय पढ़ने के लिए सुविधाजनक।
  • पाठ में फाल्गुन शुक्ल द्वादशी की तिथि स्वयं दर्ज है, इसलिए लक्खी मेले के संकल्प के साथ पढ़ी जाती है।
  • अंतिम जयकारा "लीलो घोड़ो लाल लगाम" खाटू श्याम की लोक-छवि का सबसे पहचाना अंग है।

कब करें पाठ

प्रत्येक एकादशी कोफाल्गुन शुक्ल द्वादशी (लक्खी मेला) पर — पाठ स्वयं यही तिथि कहता हैखाटू धाम के दर्शन अथवा निशान यात्रा के समयनित्य पूजा में पुष्प व इत्र अर्पित करते समय

पाठ विधि

यह पुष्पांजलि है, अर्थात पुष्प-अर्पण के भाव की विनती — इसलिए परंपरा में इसे पुष्प हाथ में लेकर अथवा अर्पित करते हुए पढ़ा जाता है। श्याम बाबा के चित्र के समक्ष ज्योत जलाकर बैठें, "जय श्री श्याम" कहें, फिर चारों पद क्रम से पढ़ें और समापन-दोहे के बाद अंत का जयकारा ऊँचे स्वर में बोलें। चौथे पद में पाठ स्वयं जो वस्तुएँ गिनाता है — पान, सुपारी, इलायची तथा इत्र — परंपरा में वही अर्पित की जाती हैं। ध्यान रहे कि यह ढूँढाड़ी बोली की रचना है, संस्कृत श्लोक नहीं; इसे ठहर-ठहरकर, गाकर पढ़ने की परंपरा है — शब्द जैसे छपे हैं वैसे ही पढ़ें ("सुणियों", "बण्यों", "बैठ्यो" आदि बोली के रूप हैं, त्रुटि नहीं)। पाठ 2–3 मिनट का है और प्रायः खाटू श्याम अष्टक या आरती के साथ पढ़ा जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (6/6 श्लोक)
मूल ग्रंथढूँढाड़ी विनती परंपरा — कवि-छाप "आलू सिंह"
स्रोत परंपराhindunidhi.com — श्याम पुष्पांजलि श्री खाटू श्याम; पूर्ण पाठ (4 पद + समापन-दोहा + जयकारा)। · ⚠️ यह पृष्ठ इस संग्रह के दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता, और यह छिपाया नहीं गया — यह रचना केवल एक स्रोत पर मिली। · ⚠️ यह संस्कृत स्तोत्रम् नहीं है — ढूँढाड़ी (राजस्थानी) बोली में दोहा-चाल की विनती/पुष्पांजलि है। बोली के रूप ("सुणियों", "बण्यों", "बैठ्यो") त्रुटि नहीं हैं और बदले नहीं गए। · ℹ️ कवि का नाम पाठ के भीतर दर्ज है — "आलू सिंह तो प्रेम से धरे श्याम को ध्यान" (चौथा पद) कवि-छाप है। · ℹ️ खाटू श्याम अष्टक तथा चालीसा की सीकर वाचना में छाप "विप्लव" है — अर्थात वे भिन्न कवि की रचनाएँ हैं। · ℹ️ पाठ स्वयं दो तथ्य दर्ज करता है — फाल्गुन शुक्ल द्वादशी का उत्सव तथा ढूँढार देश / खाटू नगर का स्थान; और जयकारे की पंक्ति "लीलो घोड़ो लाल लगाम" उनके वाहन नीले घोड़े का आधार है। · हिंदी अर्थ मूल पाठ से अनूदित (6/6)।
रचयिताआलू सिंह (पाठ में स्वयं दर्ज कवि-छाप)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह संस्कृत स्तोत्रम् नहीं है — यह ढूँढाड़ी (राजस्थानी) बोली में दोहा-चाल की विनती/पुष्पांजलि है; रचना स्वयं को "पुष्पांजलि" कहती है और "ढूंढारो देश" कहकर अपना क्षेत्र भी पहचानती है। `stotram` वर्ग में इसे इसलिए रखा गया कि यह स्तुति-पाठ है, पर रूप संस्कृत स्तोत्र से भिन्न है। कवि का नाम पाठ के भीतर ही है — चौथे पद की पंक्ति *"आलू सिंह तो प्रेम से धरे श्याम को ध्यान"* कवि-छाप है; खाटू श्याम की अधिकांश रचनाओं के रचयिता अज्ञात हैं, इसलिए यह उल्लेखनीय है। ध्यान दें कि खाटू श्याम अष्टक तथा चालीसा की सीकर वाचना में छाप "विप्लव" है — अर्थात वे भिन्न कवि की रचनाएँ हैं। यह पृष्ठ दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता: यह रचना केवल एक स्रोत पर मिली।

देव परिचय

श्री खाटू श्याम

Khatu Shyam Ji (Barbarik)

खाटू श्याम महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — शीश दान देने वाले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना "श्याम" नाम दिया; कलियुग में "हारे का सहारा" कहे जाते हैं।

देवता वर्गशरणागत रक्षा · त्याग व बलिदान · मनोकामना पूर्ति · हारे का सहारा
वाहननीला घोड़ा
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श्याम पुष्पांजलि — सामान्य प्रश्न

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