समय
5–6 मिनट
श्लोक
18
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
एकादशी; फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी (लक्खी मेला); रविवार
उद्देश्य:शरणागत रक्षा (Refuge)मनोकामना पूर्ति (Fulfilment of Wishes)संकट मोचन (Relief from Crisis)
✓ संपूर्ण (18/18 श्लोक)
श्री खाटू श्याम अष्टक दोहा-चौपाई छंद की स्तुति है जिसमें बर्बरीक का पूरा वंश-क्रम आता है — पूर्वजन्म में सूर्यवर्चा यक्ष, माता कामकटंकटा (मोर्वी), पिता घटोत्कच और भीम के पौत्र। इसमें 2 दोहे, 16 चौपाइयाँ तथा फलश्रुति के 2 दोहे हैं; पाठ 5–6 मिनट का है।
FAQ
श्री खाटू श्याम अष्टक — सामान्य प्रश्न
यह खाटू श्याम — अर्थात महाभारत के वीर बर्बरीक — की स्तुति में रची गई दोहा-चौपाई की रचना है। इसका ढाँचा है: दो मंगल-दोहे, सोलह चौपाइयाँ, और अंत में फलश्रुति के दो दोहे। पाठ 5–6 मिनट का है, और फलश्रुति स्वयं इसे "नित्य" पढ़ने को कहती है।
नहीं — और यह जान लेना चाहिए। संस्कृत परंपरा में "अष्टक" आठ श्लोकों की रचना होती है (जैसे शनैश्चराष्टकम् या दुर्गाष्टकम्)। यह रचना ब्रज-राजस्थानी हिंदी में है और इसमें आठ श्लोक नहीं, सोलह चौपाइयाँ हैं। परंपरा इसे "अष्टक" कहती है, इसलिए वही नाम रखा गया है — पर रूप संस्कृत अष्टकम् से भिन्न है।
यह उनका पूरा परिचय-पत्र है, और वह भी क्रम से। चौपाई 1: पूर्वजन्म में सूर्यवर्चा नामक यक्ष। चौपाई 3: एक अल्प शाप के कारण नैर्ऋत (राक्षस) योनि में जन्म। चौपाई 4: माता कामकटंकटा, जिन्हें मोर्वी भी कहते हैं। चौपाई 5: पिता घटोत्कच, और वहीं बर्बरीक नाम। चौपाई 12: भैमिसुत — भीम के पौत्र। अधिकांश खाटू श्याम रचनाएँ केवल "हारे का सहारा" तक रहती हैं; यह जन्म से आरंभ करती है।
अष्टक की चौपाई 6 और 7 यही प्रसंग देती हैं — "गुप्त क्षेत्र देवी आराधक" तथा "नव चण्डी शक्ति स्वरूपा, अर्जित अतुलित वीर्य अनूपा"। अर्थात उन्होंने गुप्त क्षेत्र (महीसागर संगम) में नवदुर्गा की तपस्या की और उसी से अतुलित पराक्रम तथा तीन अमोघ बाण अर्जित किए। इसीलिए वे "तीन बाण धारी" कहलाते हैं।
चौपाई 8 कहती है — *"चण्डिल नाम वीर वर पायक"*, अर्थात उन्होंने "चण्डिल" नाम का वर पाया। यह बर्बरीक का एक बहुत कम ज्ञात नाम है जो देवी-आराधना के फलस्वरूप मिला। इसी चौपाई में उन्हें विप्रों को विजय व सिद्धि देने वाला भी कहा गया है।
चौपाई 11 दो ऐसे प्रसंग छूती है जो प्रचलित कथाओं में प्रायः नहीं आते — "बली भीम मान विदारक", अर्थात अपने ही प्रपितामह भीम का गर्व-भंग करना; और "नाग कन्या वरण परिहारक", अर्थात नाग-कन्या के विवाह-प्रस्ताव को अस्वीकार करना। खाटू श्याम को अविवाहित माने जाने का एक आधार यही पंक्ति है।
पूरा नाम कहीं नहीं मिला — पर कवि-छाप मिल गई। शब्द "विप्लव" इस अष्टक में तीन बार आता है (मंगल-दोहे में *"विप्लव वन्दक प्रभु चरण"*, चौपाई 15 में *"मोहन मनोज विप्लव याचत"*)। यह सामान्य शब्द नहीं, कवि की छाप जान पड़ता है। और वही छाप खाटू श्याम चालीसा की सीकर वाचना में भी है — *"चरण शरण विप्लव पड़े"*। इससे संकेत मिलता है कि दोनों रचनाएँ एक ही कवि की हैं। यह अनुमान है, प्रमाण नहीं, और यहाँ वैसा ही कहा गया है।
फलश्रुति के दो दोहे कहते हैं कि जो नित्य श्याम अष्टक पढ़ता है, उसके हृदय में सदा आनंद रहता है, सकल सुख व आरोग्य बढ़ते हैं, और मोर्वेय (मोर्वी-पुत्र, अर्थात बर्बरीक) उसके क्लेश हर लेते हैं। आगे कहा गया है कि वे अपने भक्त पर दया से द्रवित हो जाते हैं, दीन-दुःखियों के हितैषी हैं, तथा अष्ट सिद्धि व नव निधि प्रदान करते हैं।
हाँ, एक स्थान पर — और वह छिपाया नहीं गया। चौपाई 10 में "पिंगल" तथा "रेपलेन्द्र" नामक जिन दैत्यों के वध का उल्लेख है, उनका स्वतंत्र संदर्भ किसी उपलब्ध स्रोत में नहीं मिला। वहाँ अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है और यह बात उसी चौपाई पर दर्ज है। इसके अतिरिक्त स्रोत में समापन-दोहे की पंक्ति-तोड़ ग़लत जगह थी; उसे दोहे की सही चाल में जोड़ा गया है — शब्द एक भी नहीं बदला गया।
फलश्रुति स्वयं "नित्य" कहती है, अतः इसे प्रतिदिन पढ़ा जा सकता है। विशेष रूप से प्रत्येक एकादशी को — खाटू परंपरा में एकादशी सबसे विशेष दिन है — तथा फाल्गुन शुक्ल एकादशी-द्वादशी पर, जब खाटू में लक्खी मेला भरता है। खाटू धाम की यात्रा अथवा निशान चढ़ाने से पूर्व भी इसका पाठ किया जाता है। पहले "जय श्री श्याम" का जयकारा तीन बार कहने की परंपरा है।
और अष्टकम्
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पर्व
