श्री दत्तात्रेय चालीसा

śrī dattātreya cālīsā

Dattatreya Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
गुरुवार; दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

स्रोत: पारंपरिक दत्तात्रेय चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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गणपति-गुरु-पद वंदना, करूँ हृदय धरि ध्यान। श्री गुरुदेव दत्त की, वंदना करूँ महान॥

गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं श्री गुरुदेव दत्त की महान वंदना करता हूँ।

जय जय श्री गुरुदेव दत्ता। त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति-कर्ता॥

हे श्री गुरुदेव दत्त, आपकी जय हो; आप त्रिगुणात्मक त्रिमूर्ति (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) कर्ता हैं।

अत्रि-अनसूया के नंदन। तीन शीश छह भुज अभिनंदन॥

आप अत्रि व अनसूया के पुत्र हैं; तीन सिर व छह भुजाओं वाले आपका अभिनंदन।

गौ-श्वान संग शोभा पाते। वेद-रूप श्वान संग आते॥

गौ व श्वान के संग आप शोभा पाते हैं; (चार) श्वान वेदों के रूप में आपके संग रहते हैं।

जटा-भस्म तन शोभा भारी। कमण्डलु-त्रिशूल कर धारी॥

जटा व भस्म से तन की अति शोभा है; हाथों में कमण्डलु व त्रिशूल धारण किए हैं।

चौबीस गुरु तुमने धारे। प्रकृति-जीव से ज्ञान निखारे॥

आपने चौबीस गुरु धारण किए और प्रकृति व जीवों से ज्ञान निखारा।

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। गुरु-कृपा सहज वह पावै॥

जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही गुरु-कृपा पाता है।

भूत-प्रेत बाधा सब टारो। तंत्र-मंत्र दोष संहारो॥

आप भूत-प्रेत बाधा दूर करते हैं और तंत्र-मंत्र दोष का नाश करते हैं।

शत्रु-संकट सब टारन हारे। भक्तन के तुम सदा सहारे॥

आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाले हैं; आप भक्तों के सदा सहारे हैं।

गिरनार-माहुर धाम तुम्हारे। भक्त-गण नित दरस को धारे॥

गिरनार व माहुर में आपके धाम हैं, जहाँ भक्तगण नित्य दर्शन की लालसा रखते हैं।

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।

दत्त जयंती व्रत जो धारे। सकल मनोरथ प्रभु ते सारे॥

जो दत्त जयंती का व्रत धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।

जो जन तुमको शीश नवावै। ज्ञान-भक्ति सहज वह पावै॥

जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही ज्ञान व भक्ति पाता है।

अवधूत रूप जग में सोहै। योग-वैराग्य से मन मोहै॥

अवधूत रूप में आप जगत में सुशोभित हैं; योग व वैराग्य से सबका मन मोह लेते हैं।

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। दत्त-कृपा सहज वह पावै॥

जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही दत्त-कृपा प्राप्त करता है।

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।

जो श्रद्धा से भोग चढ़ावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।

गुरु-परम्परा के तुम स्वामी। आदिगुरु तुम अन्तर्यामी॥

आप गुरु-परम्परा के स्वामी हैं; आप आदिगुरु व सबके अन्तर्यामी हैं।

जो यह दत्त चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

जो यह दत्त चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा दत्त की होई॥

जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर गुरुदेव दत्त की कृपा होती है।

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। ज्ञान-भक्ति-सुख घर लावैं॥

सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में ज्ञान, भक्ति व सुख लाते हैं।

दत्त-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

जिन पर गुरुदेव दत्त की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।

भूत-पिशाच निकट नहिं आवैं। जहँ दत्त-नाम सुनावैं॥

जहाँ दत्त-नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच निकट नहीं आते।

गुरुवार को पूजन कीजै। श्री गुरुदेव-कृपा लीजै॥

गुरुवार को पूजन कीजिए और श्री गुरुदेव की कृपा प्राप्त कीजिए।

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत दत्त गुरु देवा॥

जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर गुरुदेव दत्त तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।

स्मरण-मात्र से दौड़े आते। "दिगम्बरा" कह जो बुलाते॥

जो "दिगम्बरा-दिगम्बरा" कहकर पुकारते हैं, उनके पास आप स्मरण-मात्र से दौड़े आते हैं।

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।

योग-ज्ञान का मार्ग दिखाते। भक्ति-वैराग्य जग को भाते॥

आप योग व ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व वैराग्य जगत को भाते हैं।

दुःख-दरिद्र जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

जो जन दुःख-दरिद्रता से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।

दत्त-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

जो जन दत्त-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।

गुरु-चरण की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

आपके गुरु-चरणों की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।

जो जन दत्त गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

जो जन गुरुदेव दत्त के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।

दत्त-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

जो जन दत्त-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।

ज्ञान-भक्ति-सुख घर में आवै। गुरु-कृपा-संतोष बढ़ावै॥

घर में ज्ञान, भक्ति व सुख आता है और गुरु-कृपा व संतोष बढ़ता है।

भय-संकट सब दूर हटावै। दत्त-नाम जो जन ध्यावै॥

जो जन दत्त-नाम का ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।

गुरु-मार्ग वह सहज वह पावै। दत्त-नाम जो जन गावै॥

जो जन दत्त-नाम गाता है, वह सहज ही गुरु-मार्ग पा लेता है।

सुख-शान्ति-ज्ञान घर में लावै। भक्ति-वैराग्य सब बढ़ावै॥

घर में सुख, शांति व ज्ञान आता है और भक्ति व वैराग्य बढ़ता है।

जय जय जय श्री गुरुदेव दत्ता। ज्ञान-भक्ति-सुख के तुम कर्ता॥

हे श्री गुरुदेव दत्त, आपकी जय हो; आप ज्ञान, भक्ति व सुख के कर्ता हैं।

दत्त चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। ज्ञान-भक्ति-गुरु-कृपा सब, सहज मिलैं सदाय॥

जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल दत्त चालीसा पढ़ता है, उसे ज्ञान, भक्ति व गुरु-कृपा सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं श्री गुरुदेव दत्त की महान वंदना करता हूँ।
  2. हे श्री गुरुदेव दत्त, आपकी जय हो; आप त्रिगुणात्मक त्रिमूर्ति (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) कर्ता हैं।
  3. आप अत्रि व अनसूया के पुत्र हैं; तीन सिर व छह भुजाओं वाले आपका अभिनंदन।
  4. गौ व श्वान के संग आप शोभा पाते हैं; (चार) श्वान वेदों के रूप में आपके संग रहते हैं।
  5. जटा व भस्म से तन की अति शोभा है; हाथों में कमण्डलु व त्रिशूल धारण किए हैं।
  6. आपने चौबीस गुरु धारण किए और प्रकृति व जीवों से ज्ञान निखारा।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही गुरु-कृपा पाता है।
  8. आप भूत-प्रेत बाधा दूर करते हैं और तंत्र-मंत्र दोष का नाश करते हैं।
  9. आप शत्रु व संकट सब दूर करने वाले हैं; आप भक्तों के सदा सहारे हैं।
  10. गिरनार व माहुर में आपके धाम हैं, जहाँ भक्तगण नित्य दर्शन की लालसा रखते हैं।
  11. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  12. जो दत्त जयंती का व्रत धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।
  13. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  14. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही ज्ञान व भक्ति पाता है।
  15. अवधूत रूप में आप जगत में सुशोभित हैं; योग व वैराग्य से सबका मन मोह लेते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही दत्त-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. जो श्रद्धा से भोग चढ़ाता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  19. आप गुरु-परम्परा के स्वामी हैं; आप आदिगुरु व सबके अन्तर्यामी हैं।
  20. जो यह दत्त चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर गुरुदेव दत्त की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में ज्ञान, भक्ति व सुख लाते हैं।
  23. जिन पर गुरुदेव दत्त की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. जहाँ दत्त-नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच निकट नहीं आते।
  25. गुरुवार को पूजन कीजिए और श्री गुरुदेव की कृपा प्राप्त कीजिए।
  26. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर गुरुदेव दत्त तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  27. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  28. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  29. जो "दिगम्बरा-दिगम्बरा" कहकर पुकारते हैं, उनके पास आप स्मरण-मात्र से दौड़े आते हैं।
  30. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  31. आप योग व ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं; भक्ति व वैराग्य जगत को भाते हैं।
  32. जो जन दुःख-दरिद्रता से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  33. जो जन दत्त-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  34. आपके गुरु-चरणों की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  35. जो जन गुरुदेव दत्त के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन दत्त-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में ज्ञान, भक्ति व सुख आता है और गुरु-कृपा व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन दत्त-नाम का ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन दत्त-नाम गाता है, वह सहज ही गुरु-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में सुख, शांति व ज्ञान आता है और भक्ति व वैराग्य बढ़ता है।
  41. हे श्री गुरुदेव दत्त, आपकी जय हो; आप ज्ञान, भक्ति व सुख के कर्ता हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल दत्त चालीसा पढ़ता है, उसे ज्ञान, भक्ति व गुरु-कृपा सब सहज ही सदा प्राप्त होते हैं।

लाभ

  • गुरु-कृपा, ज्ञान व आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
  • भय, संकट व नकारात्मकता दूर होती है।
  • भूत-प्रेत व तंत्र-बाधा का नाश होता है।
  • मन को शांति, भक्ति व विवेक की प्राप्ति होती है।

कब करें पाठ

दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) परगुरुवार कोप्रातः व संध्या पूजा में

पाठ विधि

भगवान दत्तात्रेय के समक्ष धूप-दीप जलाकर पुष्प अर्पित करें, "श्री गुरुदेव दत्त" का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। दत्त जयंती व गुरुवार को इसका विशेष महत्व है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक दत्तात्रेय चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

श्री दत्तात्रेय चालीसा — सामान्य प्रश्न