FAQ
श्री राधा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री राधा ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं — पुराणों में उन्हें श्रीकृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री शक्ति और प्रेम-भक्ति का सर्वोच्च रूप कहा गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण श्री राधा को श्रीकृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री देवी कहता है — वह शक्ति जो कृष्ण से अलग नहीं, उन्हीं का आह्लाद-स्वरूप है। गर्गसंहिता के अनुसार वे वृषभानु की पुत्री हैं और उनका प्राकट्य कीर्ति के घर हुआ; इसी से कृष्ण "राधापति" कहलाए। ब्रज की परंपरा उनका प्राकट्य-स्थल बरसाना के निकट रावल ग्राम बताती है।
परंपरा के अनुसार श्री राधा का वाहन — है। उनकी शक्ति/संगिनी श्री कृष्ण मानी जाती हैं।
श्री राधा का बीज मंत्र "ॐ राधायै स्वाहा" है। रोमन में इसे "Om Radhayai Svaha" लिखा जाता है। मंत्र-जप श्रद्धा व नियमितता पर आधारित परंपरा है।
श्री राधा को राधिका, राधा रानी, वृषभानुसुता, कृष्णप्रिया आदि नामों से भी जाना जाता है। हर नाम उनके किसी एक स्वरूप या गुण की ओर संकेत करता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड 55) के ध्यान में उनका वर्ण श्वेत चंपक जैसा और प्रभा करोड़ों चंद्रमाओं जैसी कही गई है; मुख शरद-पूर्णिमा का चंद्रमा, नेत्र शरद-कमल, अग्नि-शुद्ध वस्त्र, रत्नों के केयूर-कंकण-कुंडल-मुकुट, मालती की माला और वेणी — गोपियाँ श्वेत चँवर से सेवा करती हैं। परंपरा में उन्हें प्रेम, भक्ति, कृपा, माधुर्य का अधिष्ठाता माना जाता है।
इस पृष्ठ पर श्री राधा से जुड़े 10 भक्ति पाठ उपलब्ध हैं — आरती, चालीसा, मंत्र व स्तोत्र सहित। हर पाठ हिन्दी, IAST और रोमन तीनों लिपियों में पढ़ा जा सकता है।
