श्री राधा

śrī rādhā

श्री राधा ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं — पुराणों में उन्हें श्रीकृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री शक्ति और प्रेम-भक्ति का सर्वोच्च रूप कहा गया है।

परिचय

ब्रह्मवैवर्त पुराण श्री राधा को श्रीकृष्ण की प्राणाधिष्ठात्री देवी कहता है — वह शक्ति जो कृष्ण से अलग नहीं, उन्हीं का आह्लाद-स्वरूप है। गर्गसंहिता के अनुसार वे वृषभानु की पुत्री हैं और उनका प्राकट्य कीर्ति के घर हुआ; इसी से कृष्ण "राधापति" कहलाए। ब्रज की परंपरा उनका प्राकट्य-स्थल बरसाना के निकट रावल ग्राम बताती है।

उनका प्राकट्य-दिवस राधाष्टमी है — भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी, यानी कृष्ण-जन्माष्टमी के लगभग पंद्रह दिन बाद। ब्रज में यह उत्सव जन्माष्टमी से कम नहीं होता।

भक्ति-परंपरा में राधा का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है — "राधे-कृष्ण", "राधे-श्याम" — क्योंकि माना जाता है कि कृष्ण तक पहुँचने का मार्ग उनकी कृपा से खुलता है। यही भाव राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र और राधा चालीसा में बार-बार आता है।

स्वरूप: ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृतिखण्ड 55) के ध्यान में उनका वर्ण श्वेत चंपक जैसा और प्रभा करोड़ों चंद्रमाओं जैसी कही गई है; मुख शरद-पूर्णिमा का चंद्रमा, नेत्र शरद-कमल, अग्नि-शुद्ध वस्त्र, रत्नों के केयूर-कंकण-कुंडल-मुकुट, मालती की माला और वेणी — गोपियाँ श्वेत चँवर से सेवा करती हैं।

श्री राधा भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ

संबंधित पर्व व व्रत

आगामी संग्रह

अष्टकम्

जल्द

सहस्रनाम

जल्द

संक्षिप्त विवरण

अन्य नामराधिका, राधा रानी, वृषभानुसुता, कृष्णप्रिया
संगिनी/संगीश्री कृष्ण
क्षेत्रप्रेम, भक्ति, कृपा, माधुर्य
बीज मंत्रॐ राधायै स्वाहा

श्री राधा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न