श्री राधा-कृष्ण आरती

śrī rādhā-kṛṣṇa āratī

Radha-Krishna Aarti (Aarti Yugal Kishor Ki)

समय
3 मिनट
श्लोक/चौपाई
8
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
जन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी व नित्य संध्या
उद्देश्य:प्रेम (Love)भक्ति (Devotion)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण

राधा-कृष्ण की युगल आरती "आरती युगल किशोर की कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै" है। सात पदों की यह आरती वृंदावन के मंदिरों में नित्य संध्या को गाई जाती है, और जन्माष्टमी व राधाष्टमी की पूजा में भी। हर पद के बाद "तन मन धन न्योछावर कीजै" टेक दोहराई जाती है।

परिचय

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

स्रोत: परंपरागत युगल आरती — "आरती युगल किशोर की"; अंतिम पद में "परमानंद स्वामी" की छाप

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री राधा-कृष्ण आरती
IASTśrī rādhā-kṛṣṇa āratī
देवताश्री कृष्ण
मूल स्रोतपरंपरागत युगल आरती — "आरती युगल किशोर की"; अंतिम पद में "परमानंद स्वामी" की छाप
शुभ दिनजन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी व नित्य संध्या
पाठ समय3 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

"युगल किशोर" यानी किशोर-वय की जोड़ी — श्री राधा और श्री कृष्ण। ब्रज की परंपरा में इन्हें अलग-अलग नहीं, एक ही तत्व के दो रूप मानकर पूजा जाता है; इसीलिए आरती भी युगल की होती है, अकेले किसी एक की नहीं।

आरती का हर पद दर्शन का है — मुख की शोभा (पद 2–3), नील-पीत वस्त्र (पद 4), फूलों की सेज और रत्न-सिंहासन (पद 5), कंचन थाल और कपूर की बाती (पद 6)। अंतिम पद में "नंदनंदन बृजभान किशोरी, परमानंद स्वामी अविचल जोरी" — नंद के पुत्र और वृषभानु की किशोरी की यह जोड़ी अविचल है, अटल है।

अंतिम पंक्ति में "परमानंद स्वामी" की छाप (भणिता) है। परंपरा में इसे अष्टछाप कवि परमानंददास की छाप माना जाता है, पर किसी प्रामाणिक पदावली-संग्रह से हम इसकी पुष्टि नहीं कर सके — इसलिए यहाँ रचयिता "अज्ञात" ही लिखा गया है।

पाठ-भेद: कुछ प्रतियों में पद 5 और 6 के बीच एक और पद मिलता है — "मोर मुकुट कर मुरली सोहे, नटवर वेष देखि मन मोहे"। तीन में से दो स्रोतों में यह नहीं है, इसलिए यहाँ मुख्य पाठ में नहीं रखा गया।

आरती (लिरिक्स)

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आरती युगल किशोर की कीजै। तन मन धन न्योछावर कीजै॥

युगल किशोर (राधा-कृष्ण) की आरती कीजिए और उन पर अपना तन, मन व धन न्योछावर कर दीजिए। यही पंक्ति हर पद के बाद टेक की तरह दोहराई जाती है।

गौरश्याम मुख निरखन लीजै। हरि का स्वरूप नयन भरि पीजै॥

गौर (राधा) और श्याम (कृष्ण) — दोनों के मुख का दर्शन कर लीजिए; हरि के इस स्वरूप को नेत्रों में भरकर पी लीजिए।

रवि शशि कोटि बदन की शोभा। ताहि निरखि मेरो मन लोभा॥

उनके मुख की शोभा करोड़ों सूर्य और चंद्रमाओं जैसी है; उसे निरखकर मेरा मन लुभा गया।

ओढ़े नील पीत पट सारी। कुंजबिहारी गिरिवरधारी॥

उन्होंने नीले और पीले वस्त्र ओढ़े हैं — वे कुंजों में विहार करने वाले और गोवर्धन गिरि को धारण करने वाले हैं।

फूलन सेजी फूल की माला। रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला॥

फूलों की सेज सजी है और फूलों की माला है; रत्नजड़ित सिंहासन पर नंदलाल विराजमान हैं।

कंचन थार कपूर की बाती। हरि आए निर्मल भई छाती॥

सोने के थाल में कपूर की बाती जल रही है; हरि के पधारते ही हृदय निर्मल हो गया।

श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी। आरती करें सकल नर नारी॥

श्री पुरुषोत्तम, गिरिवर को धारण करने वाले — उनकी आरती सब नर-नारी मिलकर करते हैं।

नंदनंदन बृजभान किशोरी। परमानंद स्वामी अविचल जोरी॥

नंद के नंदन (कृष्ण) और वृषभानु की किशोरी (राधा) — परमानंद स्वामी कहते हैं, यह जोड़ी अविचल है, कभी न टूटने वाली।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

युगल किशोरकिशोर-वय की जोड़ी — श्री राधा व श्री कृष्ण
न्योछावरसमर्पित कर देना, वार देना
निरखननिरखना — ध्यान से देखना
रवि शशिसूर्य और चंद्रमा
बदनमुख
नील पीत पटनीला और पीला वस्त्र — राधा व कृष्ण के वस्त्र
कुंजबिहारीकुंजों (लता-गृहों) में विहार करने वाले
गिरिवरधारीगोवर्धन पर्वत को उठाने वाले
कंचन थारसोने का थाल
बृजभान किशोरीवृषभानु की पुत्री — राधा
अविचल जोरीकभी न डिगने वाली जोड़ी

अर्थ (हिन्दी)

  1. युगल किशोर (राधा-कृष्ण) की आरती कीजिए और उन पर अपना तन, मन व धन न्योछावर कर दीजिए। यही पंक्ति हर पद के बाद टेक की तरह दोहराई जाती है।
  2. गौर (राधा) और श्याम (कृष्ण) — दोनों के मुख का दर्शन कर लीजिए; हरि के इस स्वरूप को नेत्रों में भरकर पी लीजिए।
  3. उनके मुख की शोभा करोड़ों सूर्य और चंद्रमाओं जैसी है; उसे निरखकर मेरा मन लुभा गया।
  4. उन्होंने नीले और पीले वस्त्र ओढ़े हैं — वे कुंजों में विहार करने वाले और गोवर्धन गिरि को धारण करने वाले हैं।
  5. फूलों की सेज सजी है और फूलों की माला है; रत्नजड़ित सिंहासन पर नंदलाल विराजमान हैं।
  6. सोने के थाल में कपूर की बाती जल रही है; हरि के पधारते ही हृदय निर्मल हो गया।
  7. श्री पुरुषोत्तम, गिरिवर को धारण करने वाले — उनकी आरती सब नर-नारी मिलकर करते हैं।
  8. नंद के नंदन (कृष्ण) और वृषभानु की किशोरी (राधा) — परमानंद स्वामी कहते हैं, यह जोड़ी अविचल है, कभी न टूटने वाली।

लाभ

  • राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की सबसे प्रचलित आरती — वृंदावन के मंदिरों में नित्य गाई जाती है।
  • जन्माष्टमी व राधाष्टमी दोनों की पूजा में प्रयुक्त होती है।
  • छोटी और सरल है; भाषा ब्रज होने पर भी अर्थ सहज समझ आता है।
  • युगल-भाव की उपासना — राधा और कृष्ण को अलग नहीं, एक साथ पूजने की परंपरा।

कब करें पाठ

नित्य संध्या-आरती मेंजन्माष्टमी परराधाष्टमी परएकादशी व ब्रज-यात्रा में

पाठ विधि

राधा-कृष्ण के युगल विग्रह के समक्ष कंचन (या किसी भी धातु के) थाल में कपूर जलाकर आरती करें। तुलसी-दल, पुष्प तथा माखन-मिश्री का भोग अर्पित करें। हर पद के बाद "तन मन धन न्योछावर कीजै" टेक दोहराएँ और अंत में प्रसाद बाँटें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
स्रोत परंपराbhajanganga.com — आरती युगल किशोर की · yugalsarkar.com — आरती युगल किशोर की (पाठ शब्दशः वही) · dharmsaar.com — Aarti Yugal Kishor Ki Kije (तीसरा स्वतंत्र स्रोत; दो पाठ-भेद यहीं मिले)
रचयिताअज्ञात (छाप: परमानंद स्वामी)
अंतिम अद्यतनजून 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री कृष्ण

Lord Krishna

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं — प्रेम, लीला और गीता-ज्ञान के दाता।

देवता वर्गप्रेम · धर्म · भक्ति · ज्ञान
मुख्य मंत्रॐ क्लीं कृष्णाय नमः
सभी पाठ देखें

श्री राधा-कृष्ण आरती — सामान्य प्रश्न

श्री कृष्ण भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ