मनसा माँ नागेश्वरी,
कष्ट हरन सुखधाम।
चिंताग्रस्त हर जीव के,
सिद्ध करो सब काम॥
हे मनसा माँ, हे नागेश्वरी, आप कष्ट हरने वाली और सुख का धाम हैं; चिंता से ग्रस्त हर जीव के सब काम सिद्ध कीजिए।
देवी घट-घट वासिनी,
ह्रदय तेरा विशाल।
निष्ठावान हर भक्त पर,
रहियो सदा तैयार॥
हे देवी, आप घट-घट में वास करती हैं और आपका हृदय विशाल है; अपने हर निष्ठावान भक्त के लिए सदा तत्पर रहिए।
1पदमावती भयमोचिनी अम्बा।
सुख संजीवनी माँ जगदंबा॥
हे पद्मावती, भय से मुक्त करने वाली अम्बा; सुख को जीवन देने वाली माँ जगदम्बा।
2मनशा पूरक अमर अनंता।
तुमको हर चिंतक की चिंता॥
आप मन की इच्छा पूरी करने वाली, अमर और अनंत हैं; हर चिंता करने वाले की चिंता आपको है।
3कामधेनु सम कला तुम्हारी।
तुम्ही हो शरणागत रखवाली॥
आपकी कला कामधेनु के समान है; शरण में आए की रखवाली आप ही हैं।
4निज छाया में जिनको लेती।
उनको रोगमुक्त कर देती॥
जिन्हें आप अपनी छाया में ले लेती हैं, उन्हें रोगमुक्त कर देती हैं।
5धनवैभव सुखशांति देना।
व्यवसाय में उन्नति देना॥
धन-वैभव और सुख-शांति दीजिए; व्यवसाय में उन्नति दीजिए।
6तुम नागों की स्वामिनी माता।
सारा जग तेरी महिमा गाता॥
हे माता, आप नागों की स्वामिनी हैं; सारा जगत आपकी महिमा गाता है।
7महासिद्धा जगपाल भवानी।
कष्ट निवारक माँ कल्याणी॥
आप महासिद्धा हैं, जगत का पालन करने वाली भवानी हैं; कष्टों का निवारण करने वाली कल्याणी माँ हैं।
8याचना यही सांझ सवेरे।
सुख संपदा मोह ना फेरे॥
सुबह-शाम यही याचना है — सुख-सम्पदा का मोह न घेरे।
9परमानंद वरदायनी मैया।
सिद्धि ज्योत सुखदायिनी मैया॥
हे मैया, आप परमानंद और वरदान देने वाली हैं; सिद्धि की ज्योति और सुख देने वाली हैं।
10दिव्य अनंत रत्नों की मालिक।
आवागमन की महासंचालक॥
आप अनंत दिव्य रत्नों की स्वामिनी हैं; आवागमन (जन्म-मरण) की महा-संचालिका हैं।
11भाग्य रवि कर उदय हमारा।
आस्तिक माता अपरंपारा॥
हमारे भाग्य के सूर्य का उदय कीजिए; हे आस्तिकों की माता, आपकी महिमा अपरम्पार है।
12विद्यमान हो कण कण भीतर।
बस जा साधक के मन भीतर॥
आप कण-कण के भीतर विद्यमान हैं; साधक के मन के भीतर भी बस जाइए।
13पापभक्षिणी शक्तिशाला।
हरियो दुख का तिमिर ये काला॥
हे पापों का भक्षण करने वाली शक्ति-शाला, दुख का यह काला अँधेरा हर लीजिए।
14पथ के सब अवरोध हटाना।
कर्म के योगी हमें बनाना॥
राह की सब बाधाएँ हटाइए और हमें कर्मयोगी बनाइए।
15आत्मिक शांति दीजो मैया।
ग्रह का भय हर लीजो मैया॥
हे मैया, आत्मिक शांति दीजिए और ग्रहों का भय हर लीजिए।
16दिव्य ज्ञान से युक्त भवानी।
करो संकट से मुक्त भवानी॥
हे दिव्य ज्ञान से युक्त भवानी, हमें संकट से मुक्त कीजिए।
17विषहरी कन्या, कश्यप बाला।
अर्चन चिंतन की दो माला॥
हे विषहरी, हे कन्या, हे कश्यप की बाला — अर्चना और चिंतन की माला दीजिए।
18कृपा भगीरथ का जल दे दो।
दुर्बल काया को बल दे दो॥
कृपा रूपी भागीरथी का जल दीजिए; दुर्बल काया को बल दीजिए।
19अमृत कुंभ है पास तुम्हारे।
सकल देवता दास तुम्हारे॥
अमृत का कुंभ आपके पास है; सब देवता आपके दास हैं।
20अमर तुम्हारी दिव्य कलाएँ।
वांछित फल दे कल्प लताएँ॥
आपकी दिव्य कलाएँ अमर हैं; आपकी कल्प-लताएँ मनचाहा फल देती हैं।
21परम श्रेष्ठ अनुकंपा वाली।
शरणागत की कर रखवाली॥
हे परम श्रेष्ठ अनुकंपा वाली, शरणागत की रखवाली कीजिए।
22भूत पिशाचर टोना टंट।
दूर रहे माँ कलह भयंकर॥
भूत, पिशाच, टोना-टोटका और भयंकर कलह — हे माँ, ये सब दूर रहें।
23सच के पथ से हम ना भटके।
धर्म की दृष्टि में ना खटके॥
हम सत्य के पथ से न भटकें और धर्म की दृष्टि में न खटकें।
24क्षमा देवी, तुम दया की ज्योति।
शुभ कर मन की हमें तुम होती॥
हे क्षमा देवी, आप दया की ज्योति हैं; हमारे मन को शुभ करने वाली आप ही हैं।
25जो भीगे तेरे भक्ति रस में।
नवग्रह हो जाए उनके वश में॥
जो आपके भक्ति-रस में भीग जाते हैं, नवग्रह उनके वश में हो जाते हैं।
26करुणा तेरी जब हो महारानी।
अनपढ़ बनते हैं महाज्ञानी॥
हे महारानी, जब आपकी करुणा होती है, तब अनपढ़ भी महाज्ञानी बन जाते हैं।
27सुख जिन्हें हो तुमने बांटें।
दुख की दीमक उन्हें ना छांटें॥
जिन्हें आपने सुख बाँटे हैं, दुख की दीमक उन्हें नहीं चाटती।
28कल्पवृक्ष तेरी शक्ति वाला।
वैभव हमको दे निराला॥
आपकी शक्ति वाला कल्पवृक्ष हमें निराला वैभव दे।
29दीनदयाला नागेश्वरी माता।
जो तुम कहती लिखे विधाता॥
हे दीनदयाला नागेश्वरी माता, जो आप कहती हैं वही विधाता लिखता है।
30देखते हम जो आशा निराशा।
माया तुम्हारी का है तमाशा॥
हम जो आशा-निराशा देखते हैं, वह आपकी माया का ही तमाशा है।
31आपद विपद हरो हर जन की।
तुम्हें खबर हर एक के मन की॥
हर जन की आपदा और विपदा हर लीजिए; आपको हर एक के मन की खबर है।
32डाल के हम पर ममता आँचल।
शांत कर दो समय की हलचल॥
हम पर ममता का आँचल डालकर समय की हलचल को शांत कर दीजिए।
33मनसा माँ जग सृजनहारी।
सदा सहायक रहो हमारी॥
हे जगत की सृजनहारी मनसा माँ, सदा हमारी सहायक रहिए।
34कष्ट क्लेश ना हमें सतावे।
विकट बला ना कोई भी आवे॥
कष्ट और क्लेश हमें न सताएँ; कोई विकट बला न आए।
35कृपा सुधा की वृष्टि करना।
हर चिंतक की चिंता हरना॥
कृपा रूपी अमृत की वर्षा कीजिए और हर चिंता करने वाले की चिंता हर लीजिए।
36पूरी करो हर मन की मंशा।
हमें बना दो ज्ञान की हंसा॥
हर मन की मंशा पूरी कीजिए; हमें ज्ञान का हंस बना दीजिए।
37पारसमणियाँ चरण तुम्हारे।
उज्वल करदे भाग्य हमारे॥
आपके चरण पारसमणि हैं — हमारे भाग्य उज्ज्वल कर दीजिए।
38त्रिभुवन पूजित मनसा माई।
तेरा सुमिरन हो फलदाई॥
हे तीनों भुवनों में पूजित मनसा माई, आपका स्मरण फल देने वाला हो।
इस गृह अनुग्रह रस बरसा दे।
हर जीवन निर्दोष बना दे॥
भूलेंगे उपकार ना तेरे।
पूजेंगे माँ सांझ सवेरे॥
इस घर पर अनुग्रह का रस बरसा दीजिए और हर जीवन को निर्दोष बना दीजिए; हम आपका उपकार नहीं भूलेंगे, हे माँ, सुबह-शाम आपको पूजेंगे।
सिद्ध मनसा सिद्धेश्वरी,
सिद्ध मनोरथ कर।
भक्तवत्सला दो हमें,
सुख संतोष का वर॥
हे सिद्ध मनसा, हे सिद्धेश्वरी, हमारे मनोरथ सिद्ध कीजिए; हे भक्तवत्सला, हमें सुख और संतोष का वर दीजिए।