श्री मनसा देवी चालीसा

śrī manasā devī cālīsā

Mansa Devi Chalisa (Haridwar)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नाग पंचमी; नवरात्रि; मंगलवार व शुक्रवार
उद्देश्य:मनोकामना (Wish fulfilment)रक्षा व सर्प-भय से मुक्ति (Protection)समृद्धि (Prosperity)
✓ संपूर्ण (38/38 श्लोक)

श्री मनसा देवी चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर अड़तीस चौपाइयों में चलती है — नाम चालीसा है, पर चौपाइयाँ चालीस नहीं। पहला दोहा ही देवी का परिचय देता है — "मनसा माँ नागेश्वरी, कष्ट हरन सुखधाम"। यह नागों की देवी और मन की इच्छा पूरी करने वाली मनसा की स्तुति है, और इसकी भाषा आधुनिक खड़ी हिन्दी है।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: मनसा देवी (हरिद्वार) — नागों की देवी; आधुनिक हिन्दी रचना

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री मनसा देवी चालीसा
IASTśrī manasā devī cālīsā
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोतमनसा देवी (हरिद्वार) — नागों की देवी; आधुनिक हिन्दी रचना
शुभ दिननाग पंचमी; नवरात्रि; मंगलवार व शुक्रवार
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा मनसा देवी के दो रूपों को एक साथ रखती है — नागों की देवी और मन की इच्छा पूरी करने वाली देवी — और उनका नाम ही दूसरे रूप की ओर इशारा करता है।

नागेश्वरी (दोहा, चौपाई 6, 17). पहला ही दोहा उन्हें "नागेश्वरी" कहता है, चौपाई 6 "तुम नागों की स्वामिनी माता", और चौपाई 17 में तीन परिचय एक साथ — "विषहरी कन्या, कश्यप बाला": विष हरने वाली, और ऋषि कश्यप की पुत्री। यही वह कथा है जिसमें मनसा को कश्यप की मानस-पुत्री और नागराज वासुकि की बहन कहा जाता है।

मन की इच्छा (चौपाई 2, 36). नाम का अर्थ चालीसा बार-बार खोलती है — "मनशा पूरक अमर अनंता, तुमको हर चिंतक की चिंता" (2) और "पूरी करो हर मन की मंशा" (36)। हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में धागा बाँधकर मन्नत माँगने की परंपरा इसी नाम से जुड़ी है।

आधुनिक स्वर. इस चालीसा की भाषा किसी पुरानी चालीसा जैसी नहीं — "व्यवसाय में उन्नति देना" (5), "कर्म के योगी हमें बनाना" (14), "दुख की दीमक उन्हें ना छांटें" (27), "शांत कर दो समय की हलचल" (32)। यह आज के भक्त की भाषा में लिखी प्रार्थना है — इसे लोकप्रियता मिली है, पर इसे प्राचीन कहना ठीक नहीं होगा।

गिनती. इसमें चालीस नहीं, अड़तीस चौपाइयाँ हैं; अंत में एक चौपाई-छंद का चतुष्पद और एक दोहा है, जिन्हें प्रकाशित प्रतियाँ "दोहा" शीर्षक में रखती हैं।

संपूर्ण चालीसा

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मनसा माँ नागेश्वरी, कष्ट हरन सुखधाम। चिंताग्रस्त हर जीव के, सिद्ध करो सब काम॥

हे मनसा माँ, हे नागेश्वरी, आप कष्ट हरने वाली और सुख का धाम हैं; चिंता से ग्रस्त हर जीव के सब काम सिद्ध कीजिए।

देवी घट-घट वासिनी, ह्रदय तेरा विशाल। निष्ठावान हर भक्त पर, रहियो सदा तैयार॥

हे देवी, आप घट-घट में वास करती हैं और आपका हृदय विशाल है; अपने हर निष्ठावान भक्त के लिए सदा तत्पर रहिए।

पदमावती भयमोचिनी अम्बा। सुख संजीवनी माँ जगदंबा॥

हे पद्मावती, भय से मुक्त करने वाली अम्बा; सुख को जीवन देने वाली माँ जगदम्बा।

मनशा पूरक अमर अनंता। तुमको हर चिंतक की चिंता॥

आप मन की इच्छा पूरी करने वाली, अमर और अनंत हैं; हर चिंता करने वाले की चिंता आपको है।

कामधेनु सम कला तुम्हारी। तुम्ही हो शरणागत रखवाली॥

आपकी कला कामधेनु के समान है; शरण में आए की रखवाली आप ही हैं।

निज छाया में जिनको लेती। उनको रोगमुक्त कर देती॥

जिन्हें आप अपनी छाया में ले लेती हैं, उन्हें रोगमुक्त कर देती हैं।

धनवैभव सुखशांति देना। व्यवसाय में उन्नति देना॥

धन-वैभव और सुख-शांति दीजिए; व्यवसाय में उन्नति दीजिए।

तुम नागों की स्वामिनी माता। सारा जग तेरी महिमा गाता॥

हे माता, आप नागों की स्वामिनी हैं; सारा जगत आपकी महिमा गाता है।

महासिद्धा जगपाल भवानी। कष्ट निवारक माँ कल्याणी॥

आप महासिद्धा हैं, जगत का पालन करने वाली भवानी हैं; कष्टों का निवारण करने वाली कल्याणी माँ हैं।

याचना यही सांझ सवेरे। सुख संपदा मोह ना फेरे॥

सुबह-शाम यही याचना है — सुख-सम्पदा का मोह न घेरे।

परमानंद वरदायनी मैया। सिद्धि ज्योत सुखदायिनी मैया॥

हे मैया, आप परमानंद और वरदान देने वाली हैं; सिद्धि की ज्योति और सुख देने वाली हैं।

दिव्य अनंत रत्नों की मालिक। आवागमन की महासंचालक॥

आप अनंत दिव्य रत्नों की स्वामिनी हैं; आवागमन (जन्म-मरण) की महा-संचालिका हैं।

भाग्य रवि कर उदय हमारा। आस्तिक माता अपरंपारा॥

हमारे भाग्य के सूर्य का उदय कीजिए; हे आस्तिकों की माता, आपकी महिमा अपरम्पार है।

विद्यमान हो कण कण भीतर। बस जा साधक के मन भीतर॥

आप कण-कण के भीतर विद्यमान हैं; साधक के मन के भीतर भी बस जाइए।

पापभक्षिणी शक्तिशाला। हरियो दुख का तिमिर ये काला॥

हे पापों का भक्षण करने वाली शक्ति-शाला, दुख का यह काला अँधेरा हर लीजिए।

पथ के सब अवरोध हटाना। कर्म के योगी हमें बनाना॥

राह की सब बाधाएँ हटाइए और हमें कर्मयोगी बनाइए।

आत्मिक शांति दीजो मैया। ग्रह का भय हर लीजो मैया॥

हे मैया, आत्मिक शांति दीजिए और ग्रहों का भय हर लीजिए।

दिव्य ज्ञान से युक्त भवानी। करो संकट से मुक्त भवानी॥

हे दिव्य ज्ञान से युक्त भवानी, हमें संकट से मुक्त कीजिए।

विषहरी कन्या, कश्यप बाला। अर्चन चिंतन की दो माला॥

हे विषहरी, हे कन्या, हे कश्यप की बाला — अर्चना और चिंतन की माला दीजिए।

कृपा भगीरथ का जल दे दो। दुर्बल काया को बल दे दो॥

कृपा रूपी भागीरथी का जल दीजिए; दुर्बल काया को बल दीजिए।

अमृत कुंभ है पास तुम्हारे। सकल देवता दास तुम्हारे॥

अमृत का कुंभ आपके पास है; सब देवता आपके दास हैं।

अमर तुम्हारी दिव्य कलाएँ। वांछित फल दे कल्प लताएँ॥

आपकी दिव्य कलाएँ अमर हैं; आपकी कल्प-लताएँ मनचाहा फल देती हैं।

परम श्रेष्ठ अनुकंपा वाली। शरणागत की कर रखवाली॥

हे परम श्रेष्ठ अनुकंपा वाली, शरणागत की रखवाली कीजिए।

भूत पिशाचर टोना टंट। दूर रहे माँ कलह भयंकर॥

भूत, पिशाच, टोना-टोटका और भयंकर कलह — हे माँ, ये सब दूर रहें।

सच के पथ से हम ना भटके। धर्म की दृष्टि में ना खटके॥

हम सत्य के पथ से न भटकें और धर्म की दृष्टि में न खटकें।

क्षमा देवी, तुम दया की ज्योति। शुभ कर मन की हमें तुम होती॥

हे क्षमा देवी, आप दया की ज्योति हैं; हमारे मन को शुभ करने वाली आप ही हैं।

जो भीगे तेरे भक्ति रस में। नवग्रह हो जाए उनके वश में॥

जो आपके भक्ति-रस में भीग जाते हैं, नवग्रह उनके वश में हो जाते हैं।

करुणा तेरी जब हो महारानी। अनपढ़ बनते हैं महाज्ञानी॥

हे महारानी, जब आपकी करुणा होती है, तब अनपढ़ भी महाज्ञानी बन जाते हैं।

सुख जिन्हें हो तुमने बांटें। दुख की दीमक उन्हें ना छांटें॥

जिन्हें आपने सुख बाँटे हैं, दुख की दीमक उन्हें नहीं चाटती।

कल्पवृक्ष तेरी शक्ति वाला। वैभव हमको दे निराला॥

आपकी शक्ति वाला कल्पवृक्ष हमें निराला वैभव दे।

दीनदयाला नागेश्वरी माता। जो तुम कहती लिखे विधाता॥

हे दीनदयाला नागेश्वरी माता, जो आप कहती हैं वही विधाता लिखता है।

देखते हम जो आशा निराशा। माया तुम्हारी का है तमाशा॥

हम जो आशा-निराशा देखते हैं, वह आपकी माया का ही तमाशा है।

आपद विपद हरो हर जन की। तुम्हें खबर हर एक के मन की॥

हर जन की आपदा और विपदा हर लीजिए; आपको हर एक के मन की खबर है।

डाल के हम पर ममता आँचल। शांत कर दो समय की हलचल॥

हम पर ममता का आँचल डालकर समय की हलचल को शांत कर दीजिए।

मनसा माँ जग सृजनहारी। सदा सहायक रहो हमारी॥

हे जगत की सृजनहारी मनसा माँ, सदा हमारी सहायक रहिए।

कष्ट क्लेश ना हमें सतावे। विकट बला ना कोई भी आवे॥

कष्ट और क्लेश हमें न सताएँ; कोई विकट बला न आए।

कृपा सुधा की वृष्टि करना। हर चिंतक की चिंता हरना॥

कृपा रूपी अमृत की वर्षा कीजिए और हर चिंता करने वाले की चिंता हर लीजिए।

पूरी करो हर मन की मंशा। हमें बना दो ज्ञान की हंसा॥

हर मन की मंशा पूरी कीजिए; हमें ज्ञान का हंस बना दीजिए।

पारसमणियाँ चरण तुम्हारे। उज्वल करदे भाग्य हमारे॥

आपके चरण पारसमणि हैं — हमारे भाग्य उज्ज्वल कर दीजिए।

त्रिभुवन पूजित मनसा माई। तेरा सुमिरन हो फलदाई॥

हे तीनों भुवनों में पूजित मनसा माई, आपका स्मरण फल देने वाला हो।

इस गृह अनुग्रह रस बरसा दे। हर जीवन निर्दोष बना दे॥ भूलेंगे उपकार ना तेरे। पूजेंगे माँ सांझ सवेरे॥

इस घर पर अनुग्रह का रस बरसा दीजिए और हर जीवन को निर्दोष बना दीजिए; हम आपका उपकार नहीं भूलेंगे, हे माँ, सुबह-शाम आपको पूजेंगे।

सिद्ध मनसा सिद्धेश्वरी, सिद्ध मनोरथ कर। भक्तवत्सला दो हमें, सुख संतोष का वर॥

हे सिद्ध मनसा, हे सिद्धेश्वरी, हमारे मनोरथ सिद्ध कीजिए; हे भक्तवत्सला, हमें सुख और संतोष का वर दीजिए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे मनसा माँ, हे नागेश्वरी, आप कष्ट हरने वाली और सुख का धाम हैं; चिंता से ग्रस्त हर जीव के सब काम सिद्ध कीजिए।
  2. हे देवी, आप घट-घट में वास करती हैं और आपका हृदय विशाल है; अपने हर निष्ठावान भक्त के लिए सदा तत्पर रहिए।
  3. हे पद्मावती, भय से मुक्त करने वाली अम्बा; सुख को जीवन देने वाली माँ जगदम्बा।
  4. आप मन की इच्छा पूरी करने वाली, अमर और अनंत हैं; हर चिंता करने वाले की चिंता आपको है।
  5. आपकी कला कामधेनु के समान है; शरण में आए की रखवाली आप ही हैं।
  6. जिन्हें आप अपनी छाया में ले लेती हैं, उन्हें रोगमुक्त कर देती हैं।
  7. धन-वैभव और सुख-शांति दीजिए; व्यवसाय में उन्नति दीजिए।
  8. हे माता, आप नागों की स्वामिनी हैं; सारा जगत आपकी महिमा गाता है।
  9. आप महासिद्धा हैं, जगत का पालन करने वाली भवानी हैं; कष्टों का निवारण करने वाली कल्याणी माँ हैं।
  10. सुबह-शाम यही याचना है — सुख-सम्पदा का मोह न घेरे।
  11. हे मैया, आप परमानंद और वरदान देने वाली हैं; सिद्धि की ज्योति और सुख देने वाली हैं।
  12. आप अनंत दिव्य रत्नों की स्वामिनी हैं; आवागमन (जन्म-मरण) की महा-संचालिका हैं।
  13. हमारे भाग्य के सूर्य का उदय कीजिए; हे आस्तिकों की माता, आपकी महिमा अपरम्पार है।
  14. आप कण-कण के भीतर विद्यमान हैं; साधक के मन के भीतर भी बस जाइए।
  15. हे पापों का भक्षण करने वाली शक्ति-शाला, दुख का यह काला अँधेरा हर लीजिए।
  16. राह की सब बाधाएँ हटाइए और हमें कर्मयोगी बनाइए।
  17. हे मैया, आत्मिक शांति दीजिए और ग्रहों का भय हर लीजिए।
  18. हे दिव्य ज्ञान से युक्त भवानी, हमें संकट से मुक्त कीजिए।
  19. हे विषहरी, हे कन्या, हे कश्यप की बाला — अर्चना और चिंतन की माला दीजिए।
  20. कृपा रूपी भागीरथी का जल दीजिए; दुर्बल काया को बल दीजिए।
  21. अमृत का कुंभ आपके पास है; सब देवता आपके दास हैं।
  22. आपकी दिव्य कलाएँ अमर हैं; आपकी कल्प-लताएँ मनचाहा फल देती हैं।
  23. हे परम श्रेष्ठ अनुकंपा वाली, शरणागत की रखवाली कीजिए।
  24. भूत, पिशाच, टोना-टोटका और भयंकर कलह — हे माँ, ये सब दूर रहें।
  25. हम सत्य के पथ से न भटकें और धर्म की दृष्टि में न खटकें।
  26. हे क्षमा देवी, आप दया की ज्योति हैं; हमारे मन को शुभ करने वाली आप ही हैं।
  27. जो आपके भक्ति-रस में भीग जाते हैं, नवग्रह उनके वश में हो जाते हैं।
  28. हे महारानी, जब आपकी करुणा होती है, तब अनपढ़ भी महाज्ञानी बन जाते हैं।
  29. जिन्हें आपने सुख बाँटे हैं, दुख की दीमक उन्हें नहीं चाटती।
  30. आपकी शक्ति वाला कल्पवृक्ष हमें निराला वैभव दे।
  31. हे दीनदयाला नागेश्वरी माता, जो आप कहती हैं वही विधाता लिखता है।
  32. हम जो आशा-निराशा देखते हैं, वह आपकी माया का ही तमाशा है।
  33. हर जन की आपदा और विपदा हर लीजिए; आपको हर एक के मन की खबर है।
  34. हम पर ममता का आँचल डालकर समय की हलचल को शांत कर दीजिए।
  35. हे जगत की सृजनहारी मनसा माँ, सदा हमारी सहायक रहिए।
  36. कष्ट और क्लेश हमें न सताएँ; कोई विकट बला न आए।
  37. कृपा रूपी अमृत की वर्षा कीजिए और हर चिंता करने वाले की चिंता हर लीजिए।
  38. हर मन की मंशा पूरी कीजिए; हमें ज्ञान का हंस बना दीजिए।
  39. आपके चरण पारसमणि हैं — हमारे भाग्य उज्ज्वल कर दीजिए।
  40. हे तीनों भुवनों में पूजित मनसा माई, आपका स्मरण फल देने वाला हो।
  41. इस घर पर अनुग्रह का रस बरसा दीजिए और हर जीवन को निर्दोष बना दीजिए; हम आपका उपकार नहीं भूलेंगे, हे माँ, सुबह-शाम आपको पूजेंगे।
  42. हे सिद्ध मनसा, हे सिद्धेश्वरी, हमारे मनोरथ सिद्ध कीजिए; हे भक्तवत्सला, हमें सुख और संतोष का वर दीजिए।

लाभ

  • नागों की देवी के रूप में — सर्प-भय और विष-बाधा से रक्षा की कामना का पाठ।
  • मन की इच्छा पूरी करने वाली — नाम का यही अर्थ चालीसा बार-बार खोलती है।
  • नाग पंचमी और नवरात्रि का पाठ।
  • भाषा सरल आधुनिक हिन्दी — अर्थ समझते हुए पढ़ना आसान।

कब करें पाठ

नाग पंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) परनवरात्रि मेंमंगलवार व शुक्रवार कोमन्नत माँगते समय या पूरी होने पर

पाठ विधि

मनसा देवी के चित्र के समक्ष दीप जलाएँ; लाल पुष्प, सिंदूर और दूध अर्पित करें — नाग-देवी की पूजा में दूध का भोग परंपरा है। हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में मन्नत का धागा बाँधा जाता है; घर में पाठ करते समय मन में वही मनोकामना रखें। पहले दोनों दोहे, फिर अड़तीस चौपाइयाँ, और अंत में चतुष्पद तथा समापन दोहा पढ़ें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (38/38 श्लोक)
स्रोत परंपराhindunidhi.com — श्री मनसा देवी चालीसा (आधार-पाठ) · thebhajan.com — मनसा देवी चालीसा · ⚠️ केवल दो प्रतियाँ मिलीं; भाषा आधुनिक है और कोई कवि-छाप नहीं।
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
सभी पाठ देखें

श्री मनसा देवी चालीसा — सामान्य प्रश्न

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