श्री सरस्वती चालीसा

śrī sarasvatī cālīsā

Saraswati Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
43
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
वसंत पंचमी, परीक्षा से पहले व नित्य प्रातः
उद्देश्य:विद्या (Knowledge)बुद्धि (Wisdom)भक्ति (Devotion)
✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)

श्री सरस्वती चालीसा दो दोहों से आरंभ होकर उनतालीस चौपाइयों में चलती है और दो दोहों पर पूर्ण होती है। इसका आरंभ "जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि" से होता है। चौपाइयाँ वाल्मीकि, कालिदास, तुलसी और सूर — सबकी विद्या को माता की कृपा बताती हैं।

परिचय

माँ सरस्वती विद्या, बुद्धि, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं।

स्रोत: परंपरागत सरस्वती चालीसा; रचयिता की छाप "रामसागर"

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री सरस्वती चालीसा
IASTśrī sarasvatī cālīsā
देवतामाँ सरस्वती
मूल स्रोतपरंपरागत सरस्वती चालीसा; रचयिता की छाप "रामसागर"
शुभ दिनवसंत पंचमी, परीक्षा से पहले व नित्य प्रातः
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

इस चालीसा की पहली विशेषता यह है कि यह कवियों की चालीसा है। चौपाई 6–9 कहती हैं कि वाल्मीकि पहले हत्यारे थे, पर माता की कृपा से उन्होंने रामायण रची और "आदि कवि" की पदवी पाई; कालिदास इसी कृपा-दृष्टि से विख्यात हुए; तुलसी, सूर और अन्य ज्ञानी भी — "तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा, केवल कृपा आपकी अम्बा" (10)।

दूसरी विशेषता चौंकाती है: बीच का बड़ा हिस्सा दुर्गा सप्तशती के प्रसंगों का है — मधु-कैटभ (15–18), चंड-मुंड (19), रक्तबीज (20–21), शुंभ-निशुंभ (22), और फिर "दुर्गम काज धरा पर कीन्हा, दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा" (28)। इसका कारण यह है कि सप्तशती की परंपरा में सरस्वती को महासरस्वती कहा गया है, जो उन्हीं चरित्रों की अधिष्ठात्री हैं। इसलिए यह पाठ-भेद नहीं, इसी चालीसा का अपना स्वरूप है।

रचयिता की छाप "रामसागर" तीन जगह आती है — आरंभिक दोहे में, चौपाई 39 में और समापन दोहे में ("राम सागर अधम को")। ध्यान देने योग्य बात: एक प्रकाशक ने आरंभिक दोहे में इस नाम की जगह "दुष्जनों" छाप दिया है, पर बाक़ी दो स्रोत और स्वयं चालीसा का भीतरी प्रमाण "रामसागर" ही कहता है।

संपूर्ण चालीसा

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जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

माता-पिता के चरण-कमलों की रज अपने मस्तक पर धारण कर, मैं माता सरस्वती की वंदना करता हूँ — हे दात्री, बुद्धि और बल दीजिए।

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥

आपकी अपार और अनंत महिमा पूरे जगत में व्याप्त है; हे माता, अब रामसागर (रचयिता) के पापों का नाश कीजिए।

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥

हे समस्त बुद्धि और बल की राशि, आपकी जय हो; हे सर्वज्ञ, अमर और अविनाशी माता, जय हो।

जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥

हे हाथ में वीणा धारण करने वाली, आपकी जय हो; आप सदा सुंदर हंस की सवारी करती हैं।

रूप चतुर्भुजधारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

हे चतुर्भुज रूप धारण करने वाली माता, आप समस्त विश्व में विख्यात हैं।

जग में पाप बुद्धि जब होती। जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥

जब जगत में पाप-बुद्धि बढ़ जाती है और धर्म की ज्योति फीकी पड़ने लगती है।

तबहि मातु ले निज अवतारा। पाप हीन करती महि तारा॥

तभी माता स्वयं अवतार लेती हैं और पृथ्वी को पापरहित करके तार देती हैं।

वाल्मीकिजी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥

वाल्मीकि जी पहले हत्यारे थे — यह आपकी ही कृपा का प्रसाद था, जिसे संसार जानता है।

रामायण जो रचे बनाई। आदि कवी की पदवी पाई॥

उन्होंने रामायण की रचना की और "आदि कवि" की पदवी प्राप्त की।

कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

कालिदास जो विख्यात हुए, हे माता, वह आपकी कृपा-दृष्टि से ही हुआ।

तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥

तुलसीदास, सूरदास आदि विद्वान और जितने भी ज्ञानी हुए —

तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥

उनका और कोई सहारा नहीं था; हे अम्बा, केवल आपकी कृपा ही थी।

करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥

हे माता भवानी, वैसी ही कृपा कीजिए — मुझे अपना दुखी और दीन दास जानकर।

पुत्र करै अपराध बहूता। तेहि न धरइ चित सुन्दर माता॥

पुत्र चाहे कितने ही अपराध करे, सुंदर माता उन्हें चित्त में नहीं रखतीं।

राखु लाज जननी अब मेरी। विनय करूं बहु भांति घनेरी॥

हे जननी, अब मेरी लाज रखिए; मैं अनेक प्रकार से बहुत विनती करता हूँ।

मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥

मैं अनाथ हूँ और आपका ही सहारा है; कृपा कीजिए, हे जगदंबा, आपकी जय हो।

मधु कैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णू ते ठाना॥

मधु और कैटभ जो अत्यंत बलवान थे, उन्होंने विष्णु जी से बाहुयुद्ध ठाना।

समर हजार पांच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥

पाँच हज़ार वर्ष का घोर संग्राम हुआ, फिर भी उन्होंने मुँह नहीं मोड़ा।

मातु सहाय भई तेहि काला। बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥

उस समय माता सहायक हुईं और उन दुष्टों की बुद्धि विपरीत कर दी।

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

उसी से उन दुष्टों की मृत्यु हुई; हे माता, मेरी मनोकामना भी पूर्ण कीजिए।

चंड मुण्ड जो थे विख्याता। छण महुं संहारेउ तेहि माता॥

चंड और मुंड जो विख्यात थे, माता ने क्षण भर में उनका संहार कर दिया।

रक्तबीज से समरथ पापी। सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥

रक्तबीज जैसा समर्थ पापी, जिससे देवताओं और मुनियों के हृदय काँप उठे थे।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा। बार बार बिनवउं जगदंबा॥

आपने उसका सिर केले के तने की तरह काट दिया; हे जगदंबा, मैं बार-बार विनती करता हूँ।

जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा। छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥

जगत में प्रसिद्ध शुंभ और निशुंभ — हे अम्बा, आपने उन्हें क्षण भर में मार डाला।

भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई। रामचन्द्र बनवास कराई॥

आपने ही जाकर भरत की माता (कैकेयी) की बुद्धि फेर दी और रामचंद्र जी को वनवास कराया।

एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा। सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥

इसी प्रकार आपने रावण का वध कराया और देवता, मनुष्य व मुनि — सबको सुख दिया।

को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥

आपका यश और गुण गाने में कौन समर्थ है? वेद भी आपको अनादि और अनंत कहते हैं।

विष्णु रूद्र अज सकहिं न मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

जिनकी आप रक्षा करती हैं, उन्हें विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा भी नहीं मार सकते।

रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥

रक्तदंतिका और शताक्षी — आपके अपार नाम हैं; आप दानवों का भक्षण करने वाली हैं।

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

आपने धरती पर दुर्गम कार्य किए, इसी से सारा जगत आपको "दुर्गा" नाम से पुकारता है।

दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

हे माता, आप दुर्ग (कठिनाइयों) आदि को हरने वाली हैं; हे सुखदात्री, सदा कृपा कीजिए।

नृप कोपित जो मारन चाहै। कानन में घेरे मृग नाहै॥

यदि राजा क्रोधित होकर मारना चाहे, या वन में हिंसक पशु घेर लें —

सागर मध्य पोत के भंगे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

या समुद्र के बीच नाव टूट जाए, भारी तूफ़ान हो और कोई साथ न हो —

भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥

भूत-प्रेत की बाधा हो, दुःख हो, दरिद्रता हो या कोई संकट हो —

नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करइ न कोई॥

आपका नाम जपने से सब मंगल होता है; इसमें कोई संशय न करे।

पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥

जो संतान के लिए व्याकुल हो, वह सब छोड़कर इसी माता की पूजा करे।

करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥

जो नित्य यह चालीसा पढ़े, उसे सुंदर और गुणवान संतान प्राप्त होती है।

धूपादिक नैवेद्य चढावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥

जो धूप आदि और नैवेद्य अर्पित करता है, वह अवश्य संकटों से मुक्त हो जाता है।

भक्ति मातु की करै हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥

जो सदा माता की भक्ति करता है, क्लेश उसके निकट नहीं आते।

बंदी पाठ करें शत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥

बंदी यदि सौ बार पाठ करे, तो उसके सारे बंधन दूर हो जाते हैं।

रामसागर बाँधि हेतु भवानी। कीजै कृपा दास निज जानी॥

हे भवानी, रामसागर आपसे बँधा हुआ है; उसे अपना दास जानकर कृपा कीजिए। (यही रचयिता की छाप है।)

माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप। डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥

हे माता, आपकी कांति सूर्य जैसी है और मेरा रूप अंधकार-सा; मुझे डूबने से बचाइए, मैं भव-कूप में न गिरूँ।

बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु। राम सागर अधम को, आश्रय तू ही देदातु॥

हे माता सरस्वती, सुनिए — मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए। इस अधम रामसागर को आश्रय आप ही दीजिए।

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शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

बलरासीबल की राशि
सुहंससुंदर हंस — सरस्वती का वाहन
महिपृथ्वी
आदि कवीपहले कवि — वाल्मीकि
अवलम्बासहारा
मधु कैटभविष्णु से युद्ध करने वाले दो असुर
खलहालादुष्टों की
कदली खम्बाकेले का तना — सहज कट जाने की उपमा
रक्तदंतिकादेवी का एक नाम — सप्तशती में वर्णित
शताक्षीसौ नेत्रों वाली — देवी का एक नाम
काननवन
पोतनाव, जहाज़
भव-कूपसंसार रूपी कुआँ

अर्थ (हिन्दी)

  1. माता-पिता के चरण-कमलों की रज अपने मस्तक पर धारण कर, मैं माता सरस्वती की वंदना करता हूँ — हे दात्री, बुद्धि और बल दीजिए।
  2. आपकी अपार और अनंत महिमा पूरे जगत में व्याप्त है; हे माता, अब रामसागर (रचयिता) के पापों का नाश कीजिए।
  3. हे समस्त बुद्धि और बल की राशि, आपकी जय हो; हे सर्वज्ञ, अमर और अविनाशी माता, जय हो।
  4. हे हाथ में वीणा धारण करने वाली, आपकी जय हो; आप सदा सुंदर हंस की सवारी करती हैं।
  5. हे चतुर्भुज रूप धारण करने वाली माता, आप समस्त विश्व में विख्यात हैं।
  6. जब जगत में पाप-बुद्धि बढ़ जाती है और धर्म की ज्योति फीकी पड़ने लगती है।
  7. तभी माता स्वयं अवतार लेती हैं और पृथ्वी को पापरहित करके तार देती हैं।
  8. वाल्मीकि जी पहले हत्यारे थे — यह आपकी ही कृपा का प्रसाद था, जिसे संसार जानता है।
  9. उन्होंने रामायण की रचना की और "आदि कवि" की पदवी प्राप्त की।
  10. कालिदास जो विख्यात हुए, हे माता, वह आपकी कृपा-दृष्टि से ही हुआ।
  11. तुलसीदास, सूरदास आदि विद्वान और जितने भी ज्ञानी हुए —
  12. उनका और कोई सहारा नहीं था; हे अम्बा, केवल आपकी कृपा ही थी।
  13. हे माता भवानी, वैसी ही कृपा कीजिए — मुझे अपना दुखी और दीन दास जानकर।
  14. पुत्र चाहे कितने ही अपराध करे, सुंदर माता उन्हें चित्त में नहीं रखतीं।
  15. हे जननी, अब मेरी लाज रखिए; मैं अनेक प्रकार से बहुत विनती करता हूँ।
  16. मैं अनाथ हूँ और आपका ही सहारा है; कृपा कीजिए, हे जगदंबा, आपकी जय हो।
  17. मधु और कैटभ जो अत्यंत बलवान थे, उन्होंने विष्णु जी से बाहुयुद्ध ठाना।
  18. पाँच हज़ार वर्ष का घोर संग्राम हुआ, फिर भी उन्होंने मुँह नहीं मोड़ा।
  19. उस समय माता सहायक हुईं और उन दुष्टों की बुद्धि विपरीत कर दी।
  20. उसी से उन दुष्टों की मृत्यु हुई; हे माता, मेरी मनोकामना भी पूर्ण कीजिए।
  21. चंड और मुंड जो विख्यात थे, माता ने क्षण भर में उनका संहार कर दिया।
  22. रक्तबीज जैसा समर्थ पापी, जिससे देवताओं और मुनियों के हृदय काँप उठे थे।
  23. आपने उसका सिर केले के तने की तरह काट दिया; हे जगदंबा, मैं बार-बार विनती करता हूँ।
  24. जगत में प्रसिद्ध शुंभ और निशुंभ — हे अम्बा, आपने उन्हें क्षण भर में मार डाला।
  25. आपने ही जाकर भरत की माता (कैकेयी) की बुद्धि फेर दी और रामचंद्र जी को वनवास कराया।
  26. इसी प्रकार आपने रावण का वध कराया और देवता, मनुष्य व मुनि — सबको सुख दिया।
  27. आपका यश और गुण गाने में कौन समर्थ है? वेद भी आपको अनादि और अनंत कहते हैं।
  28. जिनकी आप रक्षा करती हैं, उन्हें विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा भी नहीं मार सकते।
  29. रक्तदंतिका और शताक्षी — आपके अपार नाम हैं; आप दानवों का भक्षण करने वाली हैं।
  30. आपने धरती पर दुर्गम कार्य किए, इसी से सारा जगत आपको "दुर्गा" नाम से पुकारता है।
  31. हे माता, आप दुर्ग (कठिनाइयों) आदि को हरने वाली हैं; हे सुखदात्री, सदा कृपा कीजिए।
  32. यदि राजा क्रोधित होकर मारना चाहे, या वन में हिंसक पशु घेर लें —
  33. या समुद्र के बीच नाव टूट जाए, भारी तूफ़ान हो और कोई साथ न हो —
  34. भूत-प्रेत की बाधा हो, दुःख हो, दरिद्रता हो या कोई संकट हो —
  35. आपका नाम जपने से सब मंगल होता है; इसमें कोई संशय न करे।
  36. जो संतान के लिए व्याकुल हो, वह सब छोड़कर इसी माता की पूजा करे।
  37. जो नित्य यह चालीसा पढ़े, उसे सुंदर और गुणवान संतान प्राप्त होती है।
  38. जो धूप आदि और नैवेद्य अर्पित करता है, वह अवश्य संकटों से मुक्त हो जाता है।
  39. जो सदा माता की भक्ति करता है, क्लेश उसके निकट नहीं आते।
  40. बंदी यदि सौ बार पाठ करे, तो उसके सारे बंधन दूर हो जाते हैं।
  41. हे भवानी, रामसागर आपसे बँधा हुआ है; उसे अपना दास जानकर कृपा कीजिए। (यही रचयिता की छाप है।)
  42. हे माता, आपकी कांति सूर्य जैसी है और मेरा रूप अंधकार-सा; मुझे डूबने से बचाइए, मैं भव-कूप में न गिरूँ।
  43. हे माता सरस्वती, सुनिए — मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए। इस अधम रामसागर को आश्रय आप ही दीजिए।

लाभ

  • विद्या और बुद्धि की कामना से पढ़ी जाने वाली चालीसा — वाल्मीकि, कालिदास, तुलसी व सूर, सबका उदाहरण इसी में है।
  • वसंत पंचमी की पूजा का प्रमुख पाठ; विद्यार्थी परीक्षा से पहले भी पढ़ते हैं।
  • सप्तशती के प्रसंग (मधु-कैटभ, रक्तबीज, शुंभ-निशुंभ) इसी पाठ में आ जाते हैं।
  • भाषा सरल और चाल हनुमान चालीसा जैसी — कंठस्थ करना आसान।

कब करें पाठ

वसंत पंचमी परपरीक्षा या किसी विद्या-आरंभ से पहलेनित्य प्रातः अध्ययन से पूर्वनवरात्रि में — महासरस्वती के रूप में

पाठ विधि

माता सरस्वती के चित्र या विग्रह के समक्ष सफ़ेद या पीले पुष्प, अक्षत और मिश्री अर्पित करें; दीप जलाएँ। पहले दोनों दोहे पढ़ें, फिर उनतालीस चौपाइयाँ, और अंत में दोनों समापन दोहे। वसंत पंचमी पर पुस्तक और वाद्य-यंत्र भी माता के समक्ष रखकर पूजे जाते हैं।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)
स्रोत परंपराdharmsaar.com — माँ सरस्वती चालीसा (आधार-पाठ) · bhaktvatsal.com — श्री सरस्वती चालीसा (चौपाइयाँ अंकित; गिनती 39 पर पूर्ण) · hindunidhi.com — श्री सरस्वती चालीसा (तीसरा साक्ष्य; बहुमत के लिए) · रचयिता की छाप — "रामसागर" (आरंभिक दोहा, चौपाई 39, समापन दोहा)
रचयिताअज्ञात (छाप: रामसागर)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ सरस्वती

Goddess Saraswati

माँ सरस्वती विद्या, बुद्धि, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं।

देवता वर्गविद्या · ज्ञान · संगीत · कला · वाणी
वाहनहंस
मुख्य मंत्रॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
माँ सरस्वती के पाठ
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श्री सरस्वती चालीसा — सामान्य प्रश्न

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