समय
7–9 मिनट
श्लोक
21
कठिनाई
मध्यम (Intermediate)
शुभ दिन
बसंत पंचमी; प्रतिदिन प्रातः व सायं; विद्यारंभ
उद्देश्य:विद्या (Knowledge)वाणी-सिद्धि (Eloquence)बुद्धि (Wisdom)
✓ संपूर्ण (21/21 श्लोक)
श्री सरस्वती स्तोत्र अगस्त्य मुनि द्वारा कहे गए 21 श्लोकों का पाठ है। इसका पहला श्लोक "या कुन्देन्दुतुषारहारधवला" है — वही जो विद्यालयों की प्रार्थना-सभा में प्रतिदिन गाया जाता है। श्लोक 20 के अनुसार प्रातः-सायं छह मास पाठ करने से सिद्धि कही गई है।
FAQ
श्री सरस्वती स्तोत्रम् — सामान्य प्रश्न
हाँ — और यह जान लेना उपयोगी है। वह इस स्तोत्र का पहला श्लोक है। भारत के असंख्य विद्यालयों की प्रार्थना-सभा में वह प्रतिदिन गाया जाता है और पीढ़ियों से कंठस्थ है, किंतु अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि वह कोई स्वतंत्र श्लोक नहीं, बल्कि अगस्त्य मुनि के इस 21-श्लोकी स्तोत्र का आरंभ है। जो श्लोक बचपन से याद है, उसका पूरा स्तोत्र यही है।
अगस्त्य मुनि ने — और यह अनुमान से नहीं, स्तोत्र के भीतर से ज्ञात होता है। श्लोक 21 स्वयं कहता है: *"इत्थं सरस्वतीस्तोत्रम् अगस्त्यमुनिवाचकम्"*, अर्थात इस प्रकार यह सरस्वती-स्तोत्र अगस्त्य मुनि द्वारा कहा गया। यही स्थिति रामरक्षा स्तोत्र (बुधकौशिक) तथा रामाष्टकम् की भी है — रचयिता पाठ से ही मिलता है।
श्लोक 20 फल के साथ अवधि भी बता देता है, जो विरल है — *"सायं प्रातः पठेन्नित्यं षण्मासात्सिद्धिरुच्यते"*, अर्थात सायं व प्रातः नित्य पाठ करने से छह मास में सिद्धि कही गई है। और उसी श्लोक में यह भी है कि फल पढ़ने वालों को ही नहीं, सुनने वालों को भी मिलता है — इसीलिए सामूहिक पाठ की परंपरा है। श्लोक 21 इसे "सर्वसिद्धिकर तथा सर्वपापप्रणाशन" कहता है।
यह पंक्ति आज अजीब लगती है, और उसे वैसा ही रहने देना चाहिए। श्लोक कहता है *"चोरव्याघ्रभयं नास्ति"* — चोर तथा व्याघ्र का भय नहीं रहता। एक विद्या-स्तोत्र में यह असामान्य है, पर यह बताती है कि रचना किस युग की है: जब यात्रा में यही दो सबसे बड़े भय थे। यहाँ इसका अर्थ "आधुनिक" बनाकर नहीं लिखा गया — जो पाठ कहता है, वही दर्ज है।
नहीं, और इसीलिए बीच में लय बदलती है। श्लोक 1–2 शार्दूलविक्रीडित व स्रग्धरा जैसे दीर्घ छंदों में हैं — इसीलिए वे गाने में भारी व भव्य लगते हैं। श्लोक 3–4 वंशस्थ में हैं। और श्लोक 5 से 21 तक सरल अनुष्टुप् में, जहाँ लगभग हर पंक्ति "नमो नमः" पर समाप्त होती है। यानी स्तोत्र वर्णन से आरंभ होकर नमस्कार में बदल जाता है।
श्लोक 2 उन्हें गिनकर बता देता है — एक हाथ में अक्षमाला (स्फटिक-मणि के समान), एक में श्वेत कमल, एक में शुक तथा दूसरे में पुस्तक। यह वही रूप है जो प्रतिमाओं व चित्रों में दिखता है; स्तोत्र उसे शब्दों में पूरा खींच देता है। इसीलिए यह श्लोक ध्यान के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
क्योंकि यह स्तोत्र उन्हें विद्या की देवी भर नहीं, आदिशक्ति मानता है। श्लोक 18 सीधे कहता है — महादेवी, महाकाली, महालक्ष्मी तथा ब्रह्मविष्णुशिवा; और श्लोक 13 उन्हें उमादेवी व त्रिनेत्रा कहता है। यही भाव इसी संग्रह की लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली के अंत में भी मिलता है, जहाँ लक्ष्मी को नवदुर्गा व महाकाली कहा गया है।
श्लोक 5 — *"सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि। विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥"*, अर्थात "मैं विद्या का आरंभ करने जा रहा हूँ; मुझे सदा सिद्धि मिले।" यही पंक्ति विद्यारंभ-संस्कार, नए शैक्षणिक सत्र के आरंभ तथा किसी भी नए अध्ययन के प्रारंभ में पढ़ी जाती है, और स्वतंत्र रूप से भी अत्यंत प्रचलित है।
पर्व
