समय
40 सेकंड
जप संख्या
11
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
गुरुवार व गुरु पूर्णिमा
उद्देश्य:ज्ञान (Knowledge)भक्ति (Devotion)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः एक साधना मंत्र है — गुरु गीता / पारंपरिक गुरु वंदना श्लोक। गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही देव महेश्वर हैं; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं — उन श्रीगुरु को नमस्कार है। परंपरा में इसे मुख्यतः ज्ञान, भक्ति, आध्यात्मिक उन्नति के भाव से जपा जाता है, प्रायः 11 बार।
FAQ
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः — सामान्य प्रश्न
यह गुरु को ब्रह्मा-विष्णु-महेश व साक्षात् परब्रह्म मानकर वंदना करता है; यह गुरु-शिष्य परंपरा का प्रमुख श्लोक है।
गुरु पूर्णिमा, गुरुवार व नित्य साधना/अध्ययन से पूर्व गुरु-स्मरण हेतु इसका पाठ किया जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप प्रायः 11 बार किया जाता है; इसके लिए माला आवश्यक नहीं (वंदना श्लोक)। जप का सुझाया गया समय प्रातः व गुरुवार है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है।
मंत्र के पदों का अर्थ इस प्रकार है — गुरुर्ब्रह्मा — गुरु ही ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) हैं; गुरुर्विष्णुः — गुरु ही विष्णु (पालक) हैं; गुरुर्देवो महेश्वरः — गुरु ही महेश्वर (संहारक) हैं; साक्षात् परब्रह्म — गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं; तस्मै श्रीगुरवे नमः — उन श्रीगुरु को नमस्कार। पूरे मंत्र का भाव यह है: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही देव महेश्वर हैं; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं — उन श्रीगुरु को नमस्कार है।
"गुरुर्-ब्रह्मा", "गुरुर्-विष्णुः", "गुरुर्-देवो महेश्वरः", "साक्षात् परब्रह्म", "तस्मै श्रीगुरवे नमः" को स्पष्ट व भक्तिभाव से पढ़ें। परंपरा में मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व कहा जाता है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
परंपरा में इसके जप से ये फल कहे जाते हैं — गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण बढ़ता है। ज्ञान, विवेक व आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है। मन में विनम्रता व कृतज्ञता का भाव जागता है। मुख्य भाव ज्ञान, भक्ति, आध्यात्मिक उन्नति का माना जाता है। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं।
यह साधना मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के लिए गुरु-दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इनमें उच्चारण, संख्या तथा नियम का विशेष विधान बताया जाता है। जिन्हें दीक्षा प्राप्त न हो, उनके लिए परंपरा इष्ट के नाम-जप, स्तुति व आरती का मार्ग सुझाती है — वह सर्वथा खुला कहा गया है।
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